बांग्लादेश की नई सरकार और भारत की उम्मीदें

-सुभाष मिश्र
1947 में उपमहाद्वीप के विभाजन के साथ जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि उसी पाकिस्तान के भीतर उपेक्षा, भाषाई अस्मिता और राजनीतिक असंतोष की आग एक नए राष्ट्र को जन्म देगी। 1971 में भारत के निर्णायक हस्तक्षेप और स्थानीय जनांदोलन के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ। यह केवल भू-राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन का पुनर्निर्माण भी था।
तब से लेकर लंबे समय तक भारत और बांग्लादेश के संबंध सहयोग, सांस्कृतिक निकटता और पारस्परिक निर्भरता पर आधारित रहे। साझा इतिहास, भाषा, साहित्य, सीमा और आर्थिक रिश्तों ने दोनों देशों को एक स्वाभाविक साझेदार बनाया लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बदलती बिसात, चीन का बढ़ता प्रभाव, पाकिस्तान की सक्रियता और आंतरिक राजनीतिक उतार-चढ़ाव ने इस संबंध में समय-समय पर तनाव भी पैदा किया। हाल के वर्षों में बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में जो अस्थिरता दिखी, उसने द्विपक्षीय रिश्तों को भी प्रभावित किया। सत्ता परिवर्तन, राजनीतिक उथल-पुथल और भारत को लेकर उभरी आलोचनात्मक भावनाओं ने एक ऐसा वातावरण बनाया जिसमें भारत के प्रति अविश्वास का स्वर सुनाई देने लगा। अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरों और कट्टरपंथी तत्वों की सक्रियता ने इस चिंता को और गहरा किया। इस पृष्ठभूमि में जब बांग्लादेश में स्वतंत्र चुनाव संपन्न हुए और नई सरकार का गठन हुआ, तो नई संभावनाओं और आशंकाओं—दोनों का द्वार खुला।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नवनिर्वाचित नेतृत्व को बधाई देना एक औपचारिक कूटनीतिक कदम भर नहीं है, यह संकेत है कि भारत संबंधों को पुन: संतुलित और सकारात्मक दिशा में ले जाने का इच्छुक है। दक्षिण एशिया में पड़ोसी प्रथम नीति की कसौटी पर बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
क्या संबंध सुधरेंगे?
भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि गहरे आर्थिक और सामरिक हितों से जुड़े हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी, व्यापार मार्ग, ऊर्जा सहयोग, जल बंटवारा, सीमा प्रबंधन और आतंकवाद-रोधी सहयोग—इन सबमें बांग्लादेश की भूमिका निर्णायक है। बांग्लादेश भी वस्त्र उद्योग, ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए भारत से जुड़ा हुआ है।
नई सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि वह घरेलू राजनीतिक दबाव और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के बीच संतुलन साधे। यदि वह राष्ट्रहित को प्राथमिकता देती है, तो भारत के साथ संबंधों को स्थिर और सहयोगपूर्ण रखना उसके लिए व्यावहारिक विकल्प होगा।
पाकिस्तान और चीन की भूमिका
पाकिस्तान की भूमिका ऐतिहासिक संदर्भों से परे आज भी प्रासंगिक है। 1971 की स्मृति अभी भी बांग्लादेश की राष्ट्रीय चेतना में गहराई से मौजूद है, किंतु कूटनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते। पाकिस्तान यदि बांग्लादेश के साथ अपने संबंध सुधारने की कोशिश करता है, तो उसका उद्देश्य भारत के प्रभाव को संतुलित करना हो सकता है।
दूसरी ओर चीन ने बांग्लादेश में निवेश, बंदरगाह निर्माण और बुनियादी ढांचे के माध्यम से अपनी उपस्थिति मजबूत की है। बेल्ट एंड रोड जैसी परियोजनाओं ने ढाका को आर्थिक विकल्प दिए हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह प्रतिस्पर्धा को टकराव में बदले बिना अपनी विश्वसनीयता और सहभागिता बनाए रखे।
अल्पसंख्यक प्रश्न और संवेदनशीलता
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का प्रश्न भारत के भीतर भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करता है। नई सरकार यदि विधि-व्यवस्था और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता देती है, तो यह विश्वास बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। भारत को भी इस विषय को संवेदनशीलता और संयम के साथ उठाना होगा ताकि द्विपक्षीय संबंध अनावश्यक बयानबाज़ी के शिकार न हों।
वैश्विक प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय संतुलन
दुनिया की बड़ी शक्तियां दक्षिण एशिया को अब केवल क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक रणनीति के संदर्भ में देखती हैं। बांग्लादेश की स्थिरता और उसकी विदेश नीति की दिशा पर अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ—सभी की नजर है। भारत के लिए यह अवसर भी है और परीक्षा भी, कि वह अपने पड़ोसी के साथ संबंधों को समानता, सम्मान और पारस्परिक लाभ के आधार पर आगे बढ़ाए।
उम्मीद और यथार्थ
नई सरकार के गठन के साथ उम्मीदों का स्वाभाविक उभार है। परंतु दक्षिण एशियाई राजनीति का इतिहास बताता है कि संबंध केवल चुनाव परिणामों से नहीं बदलते; वे सतत संवाद, विश्वास और साझा हितों के विस्तार से परिपक्व होते हैं।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते इतिहास की देन हैं, भूगोल की मजबूरी हैं और भविष्य की आवश्यकता भी। नई परिस्थिति में यह देखना होगा कि क्या दोनों देश अतीत की आशंकाओं से ऊपर उठकर सहयोग के नए अध्याय की शुरुआत कर पाते हैं, या फिर क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और घरेलू राजनीति उन्हें पुन: दूरी की ओर ले जाती है।
फिलहाल, कूटनीति के दरवाज़े खुले हैं, संवाद की संभावना जीवित है और उम्मीदों की जमीन तैयार है। अब यह नेतृत्व की दूरदर्शिता पर निर्भर करेगा कि इस अवसर को स्थायी साझेदारी में बदला जाए या इसे भी इतिहास के एक और मोड़ के रूप में दर्ज कर लिया जाए।

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