खिलौनों के बाजार में वयस्कों की भीड़

आस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र

सिडनी के व्यावसायिक इलाके में स्थित Pop Mart की चमचमाती दुकान के भीतर खड़े होकर मुझे लगा जैसे मैं किसी खिलौनों की साधारण दुकान में नहीं, बल्कि बाज़ार की किसी नई मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला में खड़ा हूं। बाहर कतार में खड़े लोगों को देखकर सहज अनुमान यही होता कि भीतर बच्चों की भीड़ होगी, पर दृश्य उलटा था। बच्चों से अधिक वयस्क थे, युवा थे, कामकाजी लोग थे, हाथों में कॉफी के कप और आंखों में एक अजीब सी उत्सुक चमक। वे किसी साधारण वस्तु को खरीदने नहीं आए थे, वे आए थे एक रहस्य को खोलने, एक डिब्बे में बंद आश्चर्य को पाने, एक क्षणिक रोमांच को खरीदने।


खिलौनों का संसार कभी लकड़ी की गाडिय़ों, मिट्टी की गुडिय़ों और टीन की सीटी तक सीमित था। उस समय खिलौने का अर्थ था बच्चे की हंसी, उसका चाव, उसकी कल्पना का विस्तार। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता खिलौने वाला में जो उल्लास झलकता है वह आज भी स्मृति में तरंगित हो उठता है। जब वह लिखती हैं कि देखो मां आज खिलौने वाला फिर से आया है, तो लगता है मानो गली के मोड़ पर खड़ी वह ठेली केवल खिलौने नहीं, बल्कि बचपन की धूप बेच रही हो। पर आज का खिलौना संसार बदल चुका है। अब ठेली की जगह बहुराष्ट्रीय ब्रांडों की रोशनी है, एक पैसे की गेंद की जगह हजारों और लाखों रुपये की सीमित संस्करण के खिलौने हैं और मासूम चाहत की जगह सुनियोजित बाजार रणनीति।


इस नई दुनिया में ब्लाइंड बॉक्स का जादू सबसे प्रभावशाली है। डिब्बा बंद है, भीतर कौन सा चरित्र है यह ज्ञात नहीं। खरीदने वाला अनुमान लगाता है, डिब्बे को हल्का सा हिलाता है, वजन तौलता है, कल्पना करता है कि शायद इस बार वही मनपसंद आकृति निकलेगी। परंतु जैसे ही डिब्बा खुलता है, आशा और निराशा का खेल शुरू हो जाता है। यदि मनचाहा चरित्र नहीं निकला तो अगला डिब्बा लेने की इच्छा और प्रबल हो जाती है। यह केवल खरीद नहीं, यह संभावना का जुआ है, जिसमें हार भी अगली बाजी के लिए उकसाती है। दरअसल, इस तरह के डिब्बे बाजार ने बहुत सुनियोजित षड्यंत्र के तहत इस तरह से डिजाइन किए गए हैं कि यह बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी आकर्षित करते हैं। उनकी मानसिक उत्तेजना को मनोवैज्ञानिक ढंग से इस तरह बढ़ाते हैं कि वे उसमें फँसते जाते हैं। डिब्बा बंद रहता है, उसमें कौन सा खिलौना है , मालूम नहीं रहता है। खरीदने के बाद डब्बा खोलने पर पता चलता है कि यह मनपसंद खिलौना नहीं है। व्यक्ति अगला डिब्बा खरीदता है और इस खरीदने की उत्सुक उत्तेजना में वह भूल जाता है कि जेब लगातार खाली होती जा रही है। यही बाजार का खेल है।


बाजार ने बच्चों की मासूम उत्सुकता को बड़ों के जुए में बदल दिया है। विश्व का खिलौना बाजार अब केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहा। वर्ष दो हजार चौबीस में वैश्विक खिलौना बाजार का आकार लगभग नौ लाख तीस हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इसमें संग्रहणीय और लाइसेंस प्राप्त खिलौनों का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। केवल ब्लाइंड बॉक्स खिलौनों का बाजार वर्ष दो हजार इक्कीस में लगभग चौरानवे हजार करोड़ रुपये का था और अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह दो लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा। यह वृद्धि केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलती उपभोक्ता मानसिकता का संकेत है। अब एक नया वर्ग उभरा है जिसे किडल्ट कहा जा रहा है, वे वयस्क जो अपने बचपन को वस्तुओं के रूप में संजोना चाहते हैं।
इस परिवर्तन के केंद्र में लैबूबू नाम का एक छोटा सा पात्र है, जिसने पूरी दुनिया को सम्मोहित कर लिया है। लैबूबू का आकर्षण केवल उसकी आकृति में नहीं, बल्कि उसकी दुर्लभता में है। कंपनी इस प्रोडक्ट को जानबूझकर बहुत सीमित संख्या में बनाती है । खिलौने की कम संख्या होने से लोगों में खरीदने की होढ़ बढ़ जाती है । सीमित संस्करण, सीमित आपूर्ति और अनिश्चित प्राप्ति ने उसे एक साधारण खिलौने से संग्रहणीय वस्तु बना दिया है। प्रसिद्ध हस्तियों ने भी उसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है। अमेरिकी ओपन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर जापानी टेनिस खिलाड़ी Naomi Osaka ने उसे अपने बैग में रखा तो उसकी लोकप्रियता और बढ़ गई। कुछ दुर्लभ संस्करण पुनर्विक्रय बाजार में लगभग पच्चीस लाख रुपये तक में बिके। बीजिंग में चार फीट ऊंचे विशेष संस्करण की नीलामी लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख रुपये में हुई। यह राशि किसी खिलौने के लिए चौंकाने वाली है, परंतु संग्रहणीय वस्तुओं की दुनिया में यह नयापन सामान्य बनता जा रहा है।
लबूबू के कारण पॉप मार्ट ने अप्रत्याशित आर्थिक सफलता अर्जित की है। कंपनी को कुछ ही वर्षों में इतना लाभ हुआ कि उसकी बाजार पूंजी लगभग एक लाख साठ हजार करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही है। दो हजार चौबीस में उसके शेयरों में तीव्र उछाल दर्ज किया गया। कंपनी को एक ही वर्ष की पहली छमाही में मुनाफे में तीन सौ पचास प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद जताई गई। यह केवल उत्पाद की सफलता नहीं, बल्कि उपभोक्ता मनोविज्ञान की सटीक और कुटिल समझ का परिणाम है।
यदि हम अन्य ब्रांडों की ओर देखें तो खिलौनों की यह दुनिया और विस्तृत हो जाती है। डेनमार्क की कंपनी Mattel अब केवल बच्चों की रंगीन ईंटों तक सीमित नहीं है। उसके सीमित संस्करण सेट्स लाखों रुपये में बिकते हैं और वयस्क संग्रहकर्ता उन्हें कलाकृति की तरह संजोते हैं। अमेरिकी कंपनी Hasbro की प्रसिद्ध गुडिय़ा बार्बी दशकों से फैशन और सांस्कृतिक प्रतीक रही है। वहींFunko जैसे दिग्गज भी वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। पॉप संस्कृति पर आधारित छोटे विनाइल पात्रों के लिए स्नह्वठ्ठद्मश का नाम लिया जाता है, जिनके दुर्लभ संस्करण हजारों और कभी कभी लाखों रुपये में बिकते हैं। इन सभी के बीच पॉप मार्ट ने एक अलग पहचान बनाई है, जिसने रहस्य और दुर्लभता को अपनी सबसे बड़ी पूंजी बना लिया।
यह क्रेज केवल खरीद तक सीमित नहीं है। सामाजिक माध्यमों पर अनबॉक्सिंग वीडियो लाखों बार देखे जाते हैं। लोग अपने संग्रह की तस्वीरें साझा करते हैं, अदला बदली करते हैं, पुनर्विक्रय करते हैं। खिलौना अब खेल का साधन नहीं, हैसियत की पहचान का हिस्सा बन गया है। किसी के पास कौन सा दुर्लभ संस्करण है, यह उसकी सामाजिक स्थिति का सूक्ष्म संकेत बनता जा रहा है। सीमित आपूर्ति के कारण कृत्रिम अभाव रचा जाता है और वही अभाव मूल्य को ऊंचा करता है।
सिडनी की उस दुकान में खड़े होकर मुझे बार बार सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता याद आती रही। उस कविता में एक पैसे की गेंद भी खुशी दे सकती थी। आज हजारों रुपये का डिब्बा भी अगली खरीद की ललक जगाता है। अंतर केवल वस्तु का नहीं, दृष्टि का है। पहले खिलौना बच्चे की कल्पना को पंख देता था, अब वह वयस्क की अधूरी इच्छाओं को सहलाता है। पहले ठेली पर रखा खिलौना सहज उपलब्ध था, अब सीमित संस्करण की प्रतीक्षा सूची है।
बाजार की यह यात्रा ठेली से वैश्विक ब्रांड तक केवल आर्थिक विकास की कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य की मनोवैज्ञानिक संरचना का दर्पण है। हम अनिश्चितता में आनंद खोजते हैं, दुर्लभता में मूल्य देखते हैं और संग्रह में स्थायित्व का भ्रम पालते हैं। एक डिब्बा खोलते समय जो क्षणिक धड़कन बढ़ती है, वही इस पूरे उद्योग की असली पूंजी है। बाजार उसी धड़कन को बेच रहा है।
खिलौनों का यह नया संसार चमकीला है, आकर्षक है, रहस्य से भरा है। पर इसके भीतर एक प्रश्न भी छिपा है कि क्या हम बचपन को बचा रहे हैं या उसे पैकेज कर रहे हैं। शायद उत्तर दोनों के बीच कहीं है। ठेली वाले की सादगी और पॉप मार्ट की रणनीति के बीच जो दूरी है, वही हमारे समय की दूरी है और इसी दूरी में खिलौनों का बाजार अपनी नई तकदीर लिख रहा है।

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