-सुभाष मिश्र
कर्नाटक के डीजीपी रामचंद्र राव का मामला जहाँ उन्हें महिलाओं को किस करने, ब्रेस्ट चूमने जैसे गंभीर आरोपों में निलंबित किया गया, देश की सिस्टम दुर्गति का केवल सबसे नया संकेत है। यही वही तंत्र है, जिसके संरक्षण और नैतिकता की शपथ जनता ने वर्षों से उम्मीद की है, लेकिन बार-बार विश्वास का संकट पैदा होता दिख रहा है।
डेटा कहता है यह कोई एकल घटना नहीं सरकार और उपलब्ध आरोपों के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि सिर्फ इस मामले में नहीं, बल्कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी वर्ग में निरंतर शिकायतें और आरोप दर्ज होते रहे हैं। 2016 तक प्राप्त सरकारी आंकड़ों के अनुसार सरकारी रिपोर्ट में एक वर्ष में 446 शिकायतें आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज हुईं, जिनमें 331 शिकायतें आईएएस और 115 शिकायतें आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ थीं।
इसी तरह के पेशेवर अनुशासनहीनता और दुराचार के कारण 166 आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। 2010 से 2018 के बीच सरकार से आरटीआई के ज़रिये पता चला।
सरकार की लोकसभा जवाबी प्रतिक्रिया से यह भी पता चला है कि 2015-21 के पाँच वर्ष के बीच आईएएस अधिकारियों के खिलाफ लगभग 3,464 शिकायतें प्राप्त हुईं, जबकि आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज शिकायतों की संख्या स्पष्ट रूप से केंद्रीकृत रूप से उपलब्ध नहीं है। लेकिन अदालतों/प्रधान सचिवालय की रिपोर्ट के अनुसार आईपीएस पर भी चार्जशीट दर्ज हुई हैं। ये केवल ‘शिकायतें’ हैं, जिनमें से कितने मामलों में एफआईआर, जांच, आरोप-प्रमाण और सजा तक का सफर पूरा हुआ, इसकी पारदर्शी संख्या उपलब्ध नहीं है। जो स्वयं में व्यवस्था की अनुत्तरदायित्वता का बड़ा संकेत है।
इन बड़े आंकड़ों के भीतर ऐसे उदाहरण भी उभरते रहे हैं जहाँ आईएएस-आईपीएस पद पर बैठे अधिकारी पर महिला कर्मचारियों या उनके सहयोगियों द्वारा यौन उत्पीडऩ, धमकाने, नौकरी से हटाने और प्रताडऩा के आरोप दर्ज हुए हैं। उत्तर प्रदेश, नगालैंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से।
ये सुनने में छोटे-छोटे मामले प्रतीत हो सकते हैं लेकिन एक पैटर्न स्पष्ट होता है जब शक्ति और पद के साथ नैतिक सुरक्षा कम और असमंजस अधिक हो, तो कार्यस्थल पर महिलाएँ सबसे अधिक असुरक्षित होती हैं।
क्या यही है ‘रक्षक’ का असली रूप? अगर वर्दी पहनकर या उच्च पद की कुर्सी पर बैठे अधिकारी ही ऐसे आरोपों में पड़ते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमानजनक व्यवहार नहीं है। यह उस संस्थागत असंतुलन का प्रमाण है, जहाँ पद और सत्ता का प्रयोग शारीरिक/मानसिक दबाव के लिए किया जाता है। शिकायत करने वाली महिला अधिकारी या कर्मचारी रूढि़वादी संस्थागत बाधाओं से घिरी रहती है। सिस्टम में पारदर्शिता, साझा डेटा और सार्वजनिक जवाबदेही की कमी स्पष्ट रूप से दिखती है।
यह पठनीय तथ्य है कि देश में कुल लगभग 4,737 आईएएस अधिकारी और 3,637 आईपीएस अधिकारी कार्यरत हैं और उनमें से शिकायतें सिर्फ मीडिया या लोकसभा/राज्यसभा में उठी हैं, लेकिन सरकार के पास केंद्र स्तर पर इस पर विस्तृत और प्रकाशित डेटाबेस नहीं है।
यह भयावह है कि इतने गंभीर आरोपों के मध्य भी डेटा नहीं मिलता है कि कितने मामलों में एफआईआर दर्ज हुई। कितने मामलों में आरोप सिद्ध हुए, या कितने अधिकारियों को निलंबित/निष्कासित किया गया। इन सवालों के जवाब किसी सरकारी आंकड़े में उपलब्ध नहीं हैं। यह हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे से कम नहीं कि सत्ता पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ पारदर्शी और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा तक एक सामान्य नागरिक आसानी से नहीं खोज सकता।
जब आईएएस-आईपीएस जैसे उच्च पदाधिकारी पर ऐसे आरोप सामने आते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं, यह संस्थागत विफलता का संकेत है। भ्रष्ट आचरण और यौन उत्पीडऩ के खिलाफ नियम और कानून हैं, लेकिन अनुपालन और परिणामों का पारदर्शी खुलासा लगभग नामुमकिन जैसा प्रतीत होता है।
हमारी सरकार, लोक सेवक और प्रशासनिक व्यवस्था को यह स्पष्ट करना होगा, पद केवल शक्ति नहीं—जिम्मेदारी है। दुर्व्यवहार के आरोपों की पारदर्शी जांच होनी चाहिए। शिकायतकर्ताओं को संस्थागत सुरक्षा मिले—प्रमोशन या नौकरी की कीमत पर नहीं। डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिए, न कि धाँधली या गुमराह करने के लिए अस्थायी ‘नापतौलÓ रिपोर्टों में दबा दिया जाए।
कर्नाटक का यह मामला, चाहे उसकी जांच में आरोप सही सिद्ध हों या नहीं, हमें एक बड़ा सवाल पूछने के लिए मजबूर करता है। क्या हम तब तक विश्वास करेंगे जब तक कि सत्ता की वर्दी नैतिकता का प्रतीक नहीं बन जाती?