-सुभाष मिश्र
राजनीति में कई बार जो सामने दिखाई देता है, कहानी केवल उतनी नहीं होती। असली कहानी उसके पीछे चल रही रणनीति में छिपी होती है। समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर देश में इन दिनों कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। देश लंबे समय से सुनता आया है कि भाजपा समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है। यह उसके पुराने वैचारिक एजेंडे का हिस्सा भी रहा है, लेकिन सवाल यह है कि यदि केंद्र सरकार की मंशा पूरे देश में यूसीसी लागू करने की है तो फिर कानून सीधे संसद से क्यों नहीं आ रहा? राज्यों को एक-एक करके आगे क्यों किया जा रहा है? उत्तराखंड से शुरू हुई यह यात्रा अलग-अलग भाजपा शासित राज्यों की तरफ बढ़ रही है और अब मध्य प्रदेश भी इसी रास्ते पर है। यानी इस बार गंगा दिल्ली से राज्यों की तरफ नहीं, बल्कि राज्यों से दिल्ली की तरफ बहती दिखाई दे रही है।
हमारे देश में आमतौर पर होता यह रहा है कि केंद्र कोई बड़ा कानून बनाता है और फिर राज्य उसे लागू करते हैं, लेकिन समान नागरिक संहिता के मामले में कहानी उलटी है। पहले एक राज्य प्रयोग करता है, फिर दूसरा आगे बढ़ता है, तीसरे में चर्चा शुरू होती है और धीरे-धीरे ऐसा वातावरण बनाया जाता है कि जो मुद्दा कल तक राष्ट्रीय स्तर पर बेहद विवादास्पद माना जाता था, वह राज्यों में लागू होते-होते सामान्य राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा दिखाई देने लगे। संभव है कि यही यूसीसी को लेकर भाजपा की सबसे बड़ी रणनीति हो। पहले राज्यों में जमीन तैयार करो, कानून को आजमाओ, विरोध और प्रतिक्रिया को समझो और फिर जब पर्याप्त राज्य इस रास्ते पर आ जाएं तो दिल्ली की संसद में राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता के लिए वातावरण तैयार हो चुका हो। वैसे समान नागरिक संहिता का विचार कोई आज की राजनीति की खोज नहीं है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 साफ तौर पर कहता है कि राज्य देश के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यानी संविधान निर्माताओं ने भी इसकी कल्पना की थी, लेकिन उन्होंने शायद भारत की सामाजिक संरचना और उसकी विविधता को भी समझा था, इसलिए इसे तत्काल लागू किए जाने वाले मौलिक अधिकार की जगह नीति-निर्देशक सिद्धांतों में रखा गया। सात दशक से ज्यादा समय गुजर गया, सरकारें आईं और गईं, लेकिन कोई भी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर इस सवाल को अंतिम मुकाम तक नहीं ले जा सकी।
अब भाजपा इसे पूरा करना चाहती है। इसके पीछे उसका वैचारिक आग्रह भी है और राजनीतिक गणित भी। भाजपा पहले ही अपने कई पुराने एजेंडों को पूरा कर चुकी है, इसलिए समान नागरिक संहिता की तरफ उसका बढऩा कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। सवाल केवल इतना है कि इसे लागू करने का रास्ता क्या होगा और उस रास्ते पर देश को साथ लेकर चला जाएगा या राजनीति आगे चलेगी और समाज पीछे छूट जाएगा।
यूसीसी के पक्ष में तर्क कमजोर नहीं हैं। आखिर देश में नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग क्यों होने चाहिए? विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना, भरण-पोषण और संपत्ति का बंटवारा ऐसे विषय हैं जिनका सीधा संबंध नागरिक अधिकारों से है। यदि देश का संविधान सबको बराबर मानता है तो इन मामलों में भी बराबरी क्यों नहीं होनी चाहिए? विशेषकर महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर यह बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी धर्म की परंपरा हो, यदि उसमें महिला को पुरुष के बराबर अधिकार नहीं मिलता तो केवल धार्मिक परंपरा के नाम पर उस असमानता को हमेशा के लिए बचाकर नहीं रखा जा सकता। समाज बदलता है तो कानून भी बदलते हैं। हिंदू समाज के व्यक्तिगत कानूनों में भी समय-समय पर बड़े बदलाव हुए हैं और उनका विरोध भी हुआ था। आज वही बदलाव सामान्य व्यवस्था का हिस्सा हैं, इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि व्यक्तिगत कानूनों में कोई सुधार ही नहीं होना चाहिए। सुधार होना चाहिए और बराबरी भी आनी चाहिए। असली सवाल यह है कि बराबरी का अर्थ क्या होगा और उस बराबरी का कानून कौन तय करेगा?
भारत केवल धर्मों का देश नहीं है, यह परंपराओं का भी देश है। यहां एक ही धर्म के भीतर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग सामाजिक रीति-रिवाज मिलते हैं। आदिवासी समुदायों की अपनी परंपराएं और सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। पूर्वोत्तर की अपनी सांस्कृतिक संरचना है। देश के अलग-अलग हिस्सों में विवाह और उत्तराधिकार से जुड़ी परंपराएं अलग हैं, इसलिए यूसीसी बनाना केवल चार-पांच धार्मिक कानूनों को हटाकर एक नई किताब लिख देने जितना आसान नहीं है। यदि कानून वास्तव में समान होना है तो उसमें भारत की विविधता को समझना भी उतना ही जरूरी होगा।
यहीं से विरोध की आवाजें पैदा होती हैं। अल्पसंख्यक समुदायों को आशंका है कि समान नागरिक संहिता के नाम पर कहीं बहुसंख्यक समाज की परंपराओं को ही राष्ट्रीय कानून का रूप न दे दिया जाए। सरकार कहती है कि ऐसा नहीं होगा। यदि ऐसा नहीं होगा तो फिर सरकार को कानून के स्वरूप पर ज्यादा खुली बहस करनी चाहिए, क्योंकि कानून केवल अच्छा होना पर्याप्त नहीं है, उसके प्रति विश्वास होना भी जरूरी है। खासकर ऐसे देश में जहां धर्म और पहचान के सवाल बहुत जल्दी राजनीतिक रंग ले लेते हैं।
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात राज्यों की भूमिका है। उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद दूसरे भाजपा शासित राज्यों में भी इसकी दिशा में हलचल बढ़ी है। यह संभवत: संयोग नहीं बल्कि एक राजनीतिक रोडमैप है। एक साथ पूरे देश में कानून लाने से जितना बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विरोध पैदा हो सकता था, राज्यों के रास्ते आगे बढऩे से वह विरोध अलग-अलग हिस्सों में बंट जाता है। कानून का प्रयोग भी हो जाता है और समाज को उसके साथ जीने का अनुभव भी मिलता है। इसके बाद केंद्र यह कह सकता है कि जब इतने राज्यों में व्यवस्था चल रही है तो पूरे देश में एक समान व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?
यानी यूसीसी की राजनीति में राज्यों को प्रयोगशाला बनाया जा रहा है और दिल्ली अंतिम मंजिल दिखाई देती है। पहले राज्यों में कानून, फिर राज्यों के अनुभव और उसके बाद राष्ट्रीय कानून। यह राजनीति की उलटी गंगा जरूर है, लेकिन रणनीति के लिहाज से बेहद सोची-समझी गंगा दिखाई देती है। इसका दूसरा पहलू भी है। यदि अलग-अलग राज्य अपने-अपने हिसाब से समान नागरिक संहिता बनाएंगे तो सवाल उठेगा कि समानता आखिर कहां है? क्या उत्तराखंड का यूसीसी मध्य प्रदेश से अलग होगा और मध्य प्रदेश का किसी दूसरे राज्य से? यदि विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक अधिकार राज्य की सीमा बदलते ही बदल जाएंगे तो जिस समानता के लिए यह पूरी कवायद हो रही है, वही सवालों में घिर सकती है। इसलिए राज्यों का रास्ता राष्ट्रीय कानून की तैयारी तो हो सकता है, उसका स्थायी विकल्प नहीं।
विपक्ष की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। केवल इसलिए यूसीसी का विरोध करना कि भाजपा इसे ला रही है, पर्याप्त राजनीति नहीं है। विपक्ष को बताना होगा कि वह समान नागरिक अधिकारों के सवाल पर कहां खड़ा है। यदि मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के साथ असमानता है तो उसका समाधान क्या है? केवल धार्मिक स्वतंत्रता का तर्क देकर सामाजिक असमानता को अनंतकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता। उसी तरह सरकार भी राष्ट्रीय एकता के नाम पर भारत की सांस्कृतिक विविधता को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
समान नागरिक संहिता पर असली बहस हिंदू बनाम मुस्लिम नहीं होनी चाहिए। असली बहस नागरिक बनाम असमानता की होनी चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि क्या भारत का प्रत्येक नागरिक, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, समुदाय या क्षेत्र से आता हो, विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के मामले में समान अधिकार पाएगा? यदि जवाब हां है तो फिर उस कानून को बनाने में हर समुदाय की आवाज भी सुनाई देनी चाहिए।
आज जिस तरह राज्यों से यूसीसी की यात्रा आगे बढ़ रही है, उससे इतना तो साफ दिखाई देता है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को छोडऩे वाली नहीं है। राज्यों में एक-एक करके जमीन तैयार की जा रही है और संभव है कि किसी समय यही रास्ता दिल्ली की संसद तक पहुंचे। तब सरकार के पास यह कहने का आधार होगा कि देश का बड़ा हिस्सा पहले ही इस व्यवस्था को स्वीकार कर चुका है। कानून केवल बहुमत से पारित होते हैं, स्वीकार्यता बहुमत से पैदा नहीं होती। स्वीकार्यता संवाद से आती है, भरोसे से आती है और इस विश्वास से आती है कि कानून किसी को हराने के लिए नहीं बल्कि सबको बराबर करने के लिए बनाया गया है।
यूसीसी की यह उलटी गंगा राज्यों से निकलकर दिल्ली तक पहुंचे, इसमें कोई संवैधानिक आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन जब यह दिल्ली पहुंचे तो अपने साथ राजनीति का शोर नहीं, समानता का विश्वास लेकर पहुंचे। क्योंकि समान नागरिक संहिता की असली परीक्षा इस बात में नहीं होगी कि कितने राज्यों ने इसे लागू किया
और संसद में कितने वोटों से यह पास हुआ। उसकी असली परीक्षा इस बात में होगी कि देश का आखिरी नागरिक भी यह महसूस करे कि उससे उसकी पहचान छीनी नहीं गई, बल्कि उसके अधिकार को दूसरे नागरिक के बराबर किया गया है। यदि ऐसा हुआ तो यूसीसी ऐतिहासिक सुधार होगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो समान कानून की यह यात्रा देश में एक नई सियासी जंग का रास्ता खोल सकती है।