-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ विधानसभा का वर्षाकालीन सत्र संक्षिप्त रहा, लेकिन अपने अंतिम पड़ाव पर कांग्रेस द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव ने इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया। यह पहले से स्पष्ट था कि विधानसभा में संख्या बल सरकार के पक्ष में है और अविश्वास प्रस्ताव से विष्णुदेव साय सरकार को कोई खतरा नहीं है। अंतत: प्रस्ताव खारिज भी हो गया, लेकिन लोकतंत्र में अविश्वास प्रस्ताव का अर्थ केवल सरकार गिराना नहीं होता। कई बार विपक्ष इसका उपयोग सरकार के कामकाज की समीक्षा करने, उसकी कमजोरियों को सामने लाने और उन सवालों को सदन के केंद्र में रखने के लिए करता है, जिनका जवाब वह सरकार से चाहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रस्ताव का गिरना जितना स्वाभाविक था, उस पर हुई लंबी बहस उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
लगभग साढ़े चौदह घंटे चली चर्चा में सरकार और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया। विपक्ष ने सरकार की कथित नाकामियों को गिनाया तो सरकार ने अपनी उपलब्धियों के साथ कांग्रेस के पिछले शासनकाल का हिसाब सामने रख दिया। यही लोकतंत्र की विशेषता भी है। सदन में सरकार के पास बहुमत होता है, लेकिन विपक्ष के पास सवाल होते हैं। सरकार संख्या के बल पर अविश्वास प्रस्ताव को पराजित कर सकती है, लेकिन उठाए गए सवालों को केवल संख्या के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
विष्णुदेव साय सरकार अपने कार्यकाल के लगभग ढाई वर्ष पूरे कर चुकी है। सरकार ने सुशासन को अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान बनाने की कोशिश की है और इसी भावना के साथ सुशासन तिहार जैसे कार्यक्रम भी चलाए गए। सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता को निश्चित रूप से प्रमुख स्थान दिया जाएगा। दशकों तक छत्तीसगढ़ की पहचान के साथ जुड़ी नक्सली हिंसा के कमजोर पडऩे और बस्तर के बड़े हिस्से में बदलते सुरक्षा परिदृश्य को नकारना संभव नहीं है। यह उपलब्धि केवल किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि वर्षों से इस लड़ाई में लगे सुरक्षा बलों, प्रशासन और स्थानीय समाज के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में इस दिशा में निर्णायक प्रगति हुई है तो उसका श्रेय सरकार को मिलना भी चाहिए।
लेकिन किसी एक बड़ी उपलब्धि से सरकार के सामने मौजूद दूसरे सवाल समाप्त नहीं हो जाते। विपक्ष ने बिजली की बढ़ती दरों, महंगाई, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, किसानों, युवाओं, कर्मचारियों और जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों को सदन में उठाया। ये ऐसे विषय हैं जिनका सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन से है। बिजली का बिल बढ़ता है तो उसका असर घर के बजट से लेकर छोटे उद्योग और व्यापार तक पड़ता है। महंगाई बढ़ती है तो सरकारी आंकड़ों से अलग उसकी वास्तविक अनुभूति रसोई और बाजार में होती है। इसी तरह यदि प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती है तो जीरो टॉलरेंस और सुशासन के दावों की कसौटी भी वहीं तय होती है।
सरकार को इस तथ्य को भी गंभीरता से देखना चाहिए कि उसके मंत्रियों के कामकाज को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं और मंत्रिमंडल में बदलाव की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में चलती रही हैं। चर्चाएं अपने आप में प्रमाण नहीं होतीं, लेकिन जब किसी सरकार की पहचान सुशासन और भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस के दावे से जुड़ी हो, तब जनता की अपेक्षाएं भी अधिक होती हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह केवल यह न बताए कि पिछली सरकार में क्या गलत हुआ, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि वर्तमान व्यवस्था में गलत होने की गुंजाइश लगातार कम हो।
दूसरी तरफ कांग्रेस भी अपने राजनीतिक अतीत से पूरी तरह मुक्त होकर सरकार पर सवाल नहीं उठा सकती। उसके पिछले शासनकाल से जुड़े कथित शराब घोटाले सहित विभिन्न मामलों की जांच और अदालती प्रक्रियाएं लगातार राजनीतिक चर्चा में बनी हुई हैं। इन मामलों में कानून को अपना काम करना चाहिए और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलना चाहिए, लेकिन इतना जरूर है कि जब कांग्रेस भ्रष्टाचार को लेकर वर्तमान सरकार को घेरती है तो सत्ता पक्ष उसके पिछले पांच वर्षों का हिसाब सामने रख देता है। इस प्रकार सदन में वर्तमान की नाकामियों के जवाब में अतीत के आरोप खड़े हो जाते हैं और जनता के वास्तविक सवाल कई बार इसी राजनीतिक शोर में पीछे छूट जाते हैं।
यही इस अविश्वास प्रस्ताव की बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भी है। लोकतंत्र में यह पर्याप्त नहीं है कि सरकार विपक्ष से पूछे कि उसने अपने शासनकाल में क्या किया था और विपक्ष सरकार से पूछता रहे कि उसने अब तक क्या नहीं किया। जनता दोनों से आगे का रास्ता जानना चाहती है। कांग्रेस यदि प्रमुख विपक्षी दल है तो सरकार की कमजोरियों को सामने लाना उसका संवैधानिक और राजनीतिक दायित्व है। लेकिन विपक्ष की विश्वसनीयता केवल आरोप लगाने से नहीं बनती। उसे यह भी बताना होगा कि जिन समस्याओं को वह उठा रहा है, उनका उसका अपना समाधान क्या है। उसी प्रकार सरकार के पास बहुमत होने का अर्थ यह नहीं कि आलोचना को राजनीतिक दुर्भावना बताकर खारिज कर दिया जाए।
अविश्वास प्रस्ताव लोकतंत्र का एक ऐसा संसदीय हथियार है जिसका प्रभाव केवल मतदान के परिणाम से नहीं मापा जाना चाहिए। कई बार सरकार को गिराने की संभावना न होने के बावजूद विपक्ष इसे इसलिए लाता है ताकि सरकार के पूरे कामकाज को एक साथ बहस के दायरे में लाया जा सके। इस बार भी कांग्रेस जानती थी कि उसके पास सरकार गिराने लायक संख्या नहीं है। इसलिए प्रस्ताव का वास्तविक उद्देश्य सरकार को सदन के भीतर राजनीतिक और प्रशासनिक सवालों के कठघरे में खड़ा करना था। इस उद्देश्य में वह कितना सफल रही और सरकार अपने जवाबों से जनता को कितना संतुष्ट कर पाई, इसका फैसला विधानसभा के भीतर की संख्या नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता करेगी।
हालांकि इस पूरी बहस के दौरान आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत टिप्पणियों और तीखी नोकझोंक ने एक बार फिर संसदीय बहस की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए। विधानसभा राजनीतिक संघर्ष का मंच अवश्य है, लेकिन उसे राजनीतिक अखाड़ा नहीं बनना चाहिए। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर नहीं भेजती कि वे केवल एक-दूसरे के राजनीतिक अतीत की परतें खोलें। वह चाहती है कि सदन में बिजली, रोजगार, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, भ्रष्टाचार, आदिवासी विकास और प्रदेश के भविष्य पर गंभीर चर्चा हो।
छत्तीसगढ़ एक महत्वपूर्ण संक्रमण के दौर में खड़ा है। नक्सलवाद के कमजोर होने के बाद बस्तर सहित प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में विकास की नई संभावनाएं खुल रही हैं। अब चुनौती यह है कि सुरक्षा की उपलब्धि को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, उद्योग और सामाजिक विश्वास की स्थायी व्यवस्था में बदला जाए। इसी तरह सुशासन केवल एक नारा, अभियान या उत्सव नहीं हो सकता। उसकी असली परीक्षा सरकारी कार्यालय में खड़े अंतिम व्यक्ति के अनुभव से होती है। यदि उसका काम बिना रिश्वत, बिना सिफारिश और बिना अनावश्यक देरी के होता है, तभी सुशासन का दावा जमीन पर प्रमाणित होता है।
अविश्वास प्रस्ताव गिर गया, सरकार सुरक्षित है और संख्या बल ने अपना फैसला दे दिया, लेकिन लोकतंत्र में संख्या अंतिम सत्य नहीं होती। संख्या सरकार बनाती और बचाती है, जबकि जनता का विश्वास सरकार की वास्तविक ताकत बनता है। यह विश्वास उपलब्धियों से मिलता है, लेकिन साथ ही आलोचना सुनने, गलतियों को स्वीकार करने और व्यवस्था को सुधारने की क्षमता से भी बनता है।
इस अविश्वास प्रस्ताव से सरकार के लिए संदेश है कि बहुमत को जनविश्वास मान लेने की भूल न करे और विपक्ष के लिए संदेश है कि विरोध को केवल आरोपों तक सीमित न रखे। कांग्रेस को अपने अतीत के सवालों का सामना करते हुए एक विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना होगा और सरकार को पिछली सरकार की विफलताओं की चर्चा से आगे बढ़कर अपने वर्तमान कार्यकाल की कसौटी पर स्वयं को साबित करना होगा। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि सरकार के पास बहुमत हो तो भी विपक्ष सवाल पूछ सके और विपक्ष के आरोप कितने भी तीखे हों, सरकार को उनका जवाब देना पड़े। अविश्वास प्रस्ताव ध्वस्त हो सकता है, लेकिन उसके जरिए उठे जनहित के सवाल ध्वस्त नहीं होने चाहिए। क्योंकि सदन में असली जीत न सरकार की होती है, न विपक्ष की—असली जीत तब होती है जब बहस से शासन बेहतर हो और उसका लाभ जनता तक पहुंचे।