आहट फफूंद जनित रोग की

जरुरत अब मौसम आधारित कृषि प्रबंधन की

राजकुमार मल

भाटापारा- लंबा शुष्क अंतराल। कम समय में अत्यधिक बारिश। मौसम आधारित कृषि प्रबंधन अब आवश्यक हो चला है क्योंकि मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है।

पिछले 3 दिवस से हो रही बारिश ने प्रमाणित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में मानसून का पारंपरिक रूप तेजी से बदल रहा है। मानसूनी गतिविधियों पर नजर रख रहे कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से परंपरागत खेती की जगह जलवायु और मौसम आधारित कृषि प्रणाली अपनाने की सलाह दी है ताकि जोखिम की आशंका कम से कम की जा सके।


इसलिए मौसम आधारित खेती

लंबा शुष्क अंतराल। कम समय में अत्यधिक वर्षा। मानसून का यह नया स्वरूप प्रमाणित करता है कि मानसून का स्वरूप बदलाव के दौर में है। इसलिए किसानों को मौसम आधारित कृषि प्रबंधन करना होगा। प्रतिकूल स्थितियों से निपटने के लिए जोखिम प्रबंधन के उपायों की भी पक्की व्यवस्था करनी होगी। मौसम और जलवायु परिवर्तन के दौर में कृषि वानिकी की ओर कदम बढ़ाना होगा क्योंकि इसे अब तक का सबसे सुरक्षित उपाय माना जा रहा है।


सुझाए यह उपाय

अतिरिक्त जल निकासी के लिए निकास प्रणाली चुस्त बनानी होगी ताकि जल- जमाव से बचा जा सके। मृदा संरक्षण के लिए जरूरी उपायों का किया जाना भी आवश्यक होगा। खेतों में जैविक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करनी होगी। संतुलित पोषक प्रबंधन के साथ सही समय पर रोग-कीट नियंत्रण के बचाव उपाय करने होंगे लेकिन इन सभी के लिए फसलों की निगरानी आवश्यक रूप से करनी होगी। बदलते मौसम के अनुसार अब वैज्ञानिक खेती ही भविष्य की सुरक्षित और टिकाऊ कृषि का आधार बनेगी।


रखें यह सावधानी

जल भराव जैसी स्थितियों के दौरान जल निकास नालियां मजबूत रखें। वर्षा के दौरान यूरिया का छिड़काव नहीं करें क्योंकि बह जाने या नष्ट होने की आशंका रहती है। लगातार बारिश लंबी अवधि तक पौधों में नमी बनाए रखती है। यह स्थिति झुलसा, पत्ती धब्बा और फफूंद जनित रोग को आमंत्रित कर सकती है। नियमित निरीक्षण की सलाह के साथ अनुशंसित रोगनाशकों का मानक मात्रा में छिड़काव करें।

मौसम आधारित कृषि प्रबंधन आवश्यक

छत्तीसगढ़ में मानसून का बदलता स्वरूप कृषि के लिए नई चुनौती है। अब किसानों को परंपरागत अनुभव के साथ मौसम पूर्वानुमान आधारित निर्णय लेने होंगे। जल निकास, मृदा संरक्षण, संतुलित पोषक प्रबंधन और कृषि वानिकी जैसी जलवायु-अनुकूल तकनीकों को अपनाकर ही फसल जोखिम कम किया जा सकता है। आने वाले समय में मौसम आधारित कृषि प्रबंधन ही सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी खेती की आधारशिला बनेगा।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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