भारत के मैदानी इलाकों में बारिश का इंतजार लंबा होता जा रहा है। मानसून के बीच में आए लंबे ब्रेक ने किसानों और मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। इसे सामान्य ब्रेक मानने की गलती नहीं की जा सकती क्योंकि इसके पीछे अलनीनो का बड़ा हाथ है। जानकारों का कहना है कि इस बार अलनीनो का असर पिछले सालों की तुलना में कहीं ज्यादा ताकतवर है।
जुलाई से मार्च 2027 तक बने रहेंगे हालात
मौसम एजेंसी के ताज़ा अनुमान के अनुसार, जुलाई 2026 से लेकर मार्च 2027 तक अलनीनो की स्थिति बने रहने की संभावना 85 से 98 प्रतिशत तक है। इसका मतलब यह है कि सिर्फ खरीफ की फसलें ही नहीं, बल्कि आने वाली रबी की फसलों पर भी सूखे का असर पड़ सकता है। प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म होने के कारण भारत में मानसून को ताकत देने वाली समुद्री प्रणालियां कमजोर पड़ जाती हैं। इससे वायुमंडलीय चक्र बिगड़ जाता है और बारिश कम होती है।

क्या कोई उम्मीद बाकी है?
हालांकि, स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि हिंद महासागर में इंडियन ओशन डायपोल विकसित हो रहा है। इसके जुलाई के अंत या अगस्त के पहले सप्ताह तक सक्रिय होने की संभावना है। यह समुद्री बदलाव कुछ हद तक मानसून को सहारा दे सकता है और देश के कुछ हिस्सों में राहत भरी बारिश की उम्मीद जगा सकता है।
फिलहाल, अलनीनो का प्रभाव इतना व्यापक है कि आने वाले कई महीनों तक मौसम में बदलाव दिखाई दे सकते हैं। खेती-किसानी और जल प्रबंधन के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय हो सकता है। सरकार और किसानों को बदलते मौसम के मिजाज को देखते हुए पहले से ही तैयारी रखने की जरूरत है। देश की नजरें अब अगस्त की बारिश पर टिकी हैं।