संगीत की दुनिया में सरहदें नहीं होतीं, यह बात कराची के मशहूर कव्वाल उस्ताद फरीद अयाज और अबू मोहम्मद ने सच साबित कर दी है। श्रीकृष्ण को समर्पित उनकी एक कव्वाली आज भी लोगों के दिलों को गहराई से छू लेती है। जब वे इस कव्वाली को गाते हैं, तो सुनने वाला हर व्यक्ति सिर्फ प्रेम के अहसास में डूब जाता है।
कृष्ण के लिए प्रेम भरी शिकायत
यह प्रसिद्ध कव्वाली हे कन्हैया याद है कुछ भी हमारी के बोलों से शुरू होती है। इसमें भक्त अपने आराध्य कृष्ण से बड़े ही प्यारे अंदाज में शिकायत करता है। कव्वाली के बोल हैं, कहूं क्या तेरे भूलने पे मैं वारी। इस रचना में एक प्रेमी की मासूम नाराजगी और तड़प साफ झलकती है। इसे पहली बार साल 2009 में बैंगलोर में रिकॉर्ड किया गया था। सुनने में यह किसी भजन जैसा लगता है, लेकिन असल में यह एक सूफी नज्म है।
सूफी शायर की अनूठी रचना
इस खूबसूरत कव्वाली को दकन के सूफी शायर नवाब सादिक जंग बहादुर हिल्म ने लिखा था। उन्होंने श्रीकृष्ण को सिर्फ भगवान ही नहीं, बल्कि अपना महबूब मानकर उन्हें पुकारा है। सूफी परंपरा की यही सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें ईश्वर को अपने प्रियतम के रूप में देखा जाता है। नवाब सादिक ने इसमें आत्मा और परमात्मा के मिलन की तड़प को बड़ी खूबसूरती से पिरोया है।
फरीद अयाज और अबू मोहम्मद की आवाज में जब यह कव्वाली गूंजती है, तो माहौल पूरी तरह बदल जाता है। उस समय सुनने वालों की नजर में न तो कोई हिंदू होता है और न ही कोई मुस्लिम। वहां सिर्फ एक सच्चा प्रेमी होता है जो अपने आराध्य को याद कर रहा है। 800 साल पुरानी सूफी रिवायत से जुड़ा यह नगमा आज भी प्रेम और एकता का बड़ा संदेश देता है।
