विरोध का सबसे शक्तिशाली अहिंसक हथियार—अनशन

-सुभाष मिश्र

सत्ता के पास पुलिस होती है, प्रशासन होता है, कानून होता है, जेल होती है और आदेश देने की ताकत होती है, लेकिन एक निहत्थे आदमी के पास क्या होता है? उसके पास उसका शरीर होता है, उसकी आत्मा होती है और उसका नैतिक साहस होता है। जब वह आदमी अपने ही शरीर को संघर्ष का मैदान बना लेता है, अन्न छोड़ देता है और सत्ता से कहता है कि मैं तुम्हारे खिलाफ कोई हथियार नहीं उठाऊंगा, कोई पत्थर नहीं फेंकूंगा, किसी सार्वजनिक संपत्ति को आग नहीं लगाऊंगा, लेकिन जब तक तुम मेरी बात नहीं सुनोगे, मैं खाना नहीं खाऊंगा—तब सत्ता के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी होती है जिसका जवाब लाठी और बंदूक से देना आसान नहीं होता। शायद इसीलिए अनशन विरोध का सबसे शक्तिशाली अहिंसक हथियार माना गया है।
इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का अनशन फिर देश को इसी पुरानी परंपरा की याद दिला रहा है। शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में लंबे समय से काम करने वाले वांगचुक परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं, नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़े सवालों को लेकर आंदोलन के समर्थन में अनशन पर बैठे हैं। उनका वजन लगातार घट रहा है, स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ रही है और बड़ी संख्या में लोग उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि सोनम वांगचुक कब अपना अनशन समाप्त करेंगे। बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को अपनी बात सुनाने के लिए आखिर अपने शरीर को दांव पर क्यों लगाना पड़ता है?
हमारे देश में उपवास कोई नई बात नहीं है। भारतीय समाज में उपवास धर्म, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की हजारों वर्ष पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है। लेकिन जब यही उपवास अन्याय के प्रतिरोध में किया जाता है तो वह अनशन बन जाता है। भूख तब केवल भूख नहीं रहती, वह एक राजनीतिक भाषा बन जाती है। एक ऐसी भाषा जिसमें कोई शोर नहीं होता, लेकिन जिसकी आवाज बहुत दूर तक जाती है।
भारत में प्राचीन काल में भी न्याय पाने के लिए किसी व्यक्ति के दरवाजे पर बैठकर उपवास करने की परंपरा रही है। आयरलैंड में भी लगभग ऐसी ही प्रथा मिलती है, जिसमें अन्याय करने वाले व्यक्ति के घर के सामने उपवास करके उस पर सामाजिक और नैतिक दबाव बनाया जाता था। यानी अनशन की मूल ताकत हमेशा यही रही है कि वह विरोधी के शरीर पर नहीं, उसकी अंतरात्मा पर चोट करता है, लेकिन इस हथियार को दुनिया में सबसे अधिक राजनीतिक और नैतिक शक्ति महात्मा गांधी ने दी।
गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े स्वतंत्रता आंदोलनों में से एक का नेतृत्व बिना किसी सेना के किया। उनके पास बंदूकें नहीं थीं, लेकिन सत्याग्रह था। उनके पास तोप नहीं थी, लेकिन असहयोग था। उनके पास हिंसा नहीं थी, लेकिन सविनय अवज्ञा थी और जब ये सारे रास्ते भी पर्याप्त नहीं लगते थे, तब उनके पास अपना शरीर था—अनशन के लिए।
गांधी के अनशन का अर्थ केवल सरकार पर दबाव बनाना नहीं था। कई बार वे अपने ही लोगों को जगाने के लिए अनशन करते थे। उनका मानना था कि अनशन अंतिम हथियार होना चाहिए। उसकी मांग नैतिक रूप से उचित होनी चाहिए और उसके पीछे निजी स्वार्थ नहीं होना चाहिए। क्योंकि अनशन की ताकत भूखे रहने में नहीं है, उसकी ताकत उस नैतिक प्रश्न में है जिसके लिए कोई व्यक्ति भूखा रहने को तैयार है।
यही कारण है कि गांधी की अहिंसा भारत की सीमाओं में कैद नहीं रही। दुनिया के अनेक आंदोलनों ने उससे प्रेरणा ली। मार्टिन लूथर किंग जूनियर से लेकर नेल्सन मंडेला तक प्रतिरोध की राजनीति में गांधी की छाया दिखाई देती है। हालांकि, इतिहास यह भी बताता है कि हर सत्ता अहिंसा से नहीं पिघलती। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी शासन के खिलाफ संघर्ष ने एक समय सशस्त्र प्रतिरोध का रास्ता भी अपनाया। नेल्सन मंडेला का संघर्ष इस जटिलता का उदाहरण है कि जब सत्ता संवाद के सारे रास्ते बंद कर देती है तो आंदोलन भी अपना स्वरूप बदल सकते हैं। इसीलिए किसी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि अहिंसक आंदोलन को कभी उस सीमा तक न पहुंचने दे जहां निराशा हिंसा में बदल जाए। अनशन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है। अनशन लोकतंत्र को चेताने वाली घंटी है।
सोनम वांगचुक के मौजूदा अनशन को भी इसी नजर से देखने की जरूरत है। उनकी हर मांग से सहमत होना आवश्यक नहीं है। सरकार को उनकी सभी मांगें स्वीकार करनी चाहिए, यह भी जरूरी नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ हर मांग मान लेना नहीं होता। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ यह जरूर है कि सवाल पूछने वाले से बातचीत की जाए। किसी आंदोलन को नजरअंदाज कर देना उसका समाधान नहीं है।
एक आदमी भूखा बैठा है। उसके आसपास धीरे-धीरे लोग जुड़ रहे हैं। फिल्म जगत से आवाजें उठ रही हैं, राजनीतिक दल समर्थन दे रहे हैं, सामाजिक कार्यकर्ता चिंता व्यक्त कर रहे हैं और उसकी गिरती सेहत राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन रही है। ऐसे समय सरकार की जिम्मेदारी केवल यह देखना नहीं हो सकती कि आंदोलन कितना बड़ा है। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि आंदोलन के पीछे सवाल कितना बड़ा है।
यहां सवाल किसी एक परीक्षा का नहीं है। सवाल उन लाखों बच्चों का है जिनके माता-पिता अपनी जिंदगी की कमाई उनकी पढ़ाई में लगा देते हैं। सवाल उन छात्रों का है जो वर्षों तक तैयारी करते हैं और फिर किसी पेपर लीक या कथित अनियमितता की खबर उनके पूरे परिश्रम पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है। एक परीक्षा रद्द होती है तो सरकार के लिए वह एक प्रशासनिक फैसला हो सकता है, लेकिन किसी विद्यार्थी के लिए वह उसकी जिंदगी का एक साल हो सकता है। यही वह जगह है जहां सोनम वांगचुक का अनशन एक व्यक्ति के उपवास से आगे बढ़कर व्यवस्था से सवाल बन जाता है।
सवाल यह भी है कि क्या हमारे लोकतंत्र में संवाद की जगह लगातार कम होती जा रही है? हमने विरोध को राजनीतिक चश्मे से देखना शुरू कर दिया है। यदि आंदोलन हमारे पक्ष का है तो वह जनांदोलन है और यदि हमारे खिलाफ है तो वह साजिश है। यदि सवाल हमारा समर्थक पूछे तो लोकतंत्र है और विरोधी पूछे तो राजनीति है। यह प्रवृत्ति किसी एक सरकार या एक दल की नहीं है। सत्ता का चरित्र अक्सर ऐसा ही हो जाता है। जो कुर्सी पर बैठता है, उसे सड़क पर बैठा आदमी असुविधाजनक लगने लगता है, लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि सड़क पर बैठे आदमी की आवाज भी संसद तक पहुंचनी चाहिए।
सोनम वांगचुक पहले भी आंदोलनों, हिरासत और जेल का सामना कर चुके हैं। आज वे फिर अनशन पर हैं। उनकी सेहत गिर रही है। उनसे अनशन तोडऩे की अपील जरूर होनी चाहिए, क्योंकि किसी आंदोलन को अपने नेतृत्व की जिंदगी की कीमत नहीं चुकानी चाहिए। उससे भी पहले सरकार से यह अपील होनी चाहिए कि वह संवाद शुरू करे। बातचीत करना हारना नहीं होता। किसी आंदोलनकारी से मिल लेना सरकार का झुकना नहीं होता और किसी सवाल को सुन लेना सत्ता की कमजोरी नहीं होती, बल्कि मजबूत लोकतंत्र वही है जहां सरकार अपने सबसे तीखे आलोचक की बात भी सुन सके।
अनशन की पूरी परंपरा हमें यही बताती है कि जब आदमी के पास सत्ता नहीं होती तो वह अपने शरीर को ही प्रतिरोध में बदल देता है। लेकिन किसी सभ्य लोकतंत्र की सफलता इस बात में नहीं है कि कितने लोग भूख हड़ताल पर बैठे। उसकी सफलता इस बात में है कि किसी नागरिक को अपनी बात सुनाने के लिए भूखा बैठना ही न पड़े। सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त होना चाहिए। केवल उनका खाना शुरू कर देना इस आंदोलन की समाप्ति नहीं होनी चाहिए। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच सार्थक संवाद शुरू होना चाहिए। परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब आना चाहिए। जवाबदेही तय होनी चाहिए और देश के करोड़ों विद्यार्थियों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी मेहनत किसी भ्रष्ट व्यवस्था, किसी लापरवाही या किसी पेपर लीक के सामने बेकार नहीं जाएगी।

आखिर एक लोकतंत्र में इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक आदमी देश के बच्चों के भविष्य की चिंता में खाना छोड़ दे और सत्ता उसके भूखे रहने का इंतजार करती रहे? गांधी ने दुनिया को बताया था कि कभी-कभी बिना हथियार का आदमी भी सबसे शक्तिशाली सत्ता को चुनौती दे सकता है। अनशन उसी चुनौती का नाम है, लेकिन हर अनशन अंतत: सत्ता से एक ही सवाल पूछता है—मैंने अन्न छोड़ दिया है, क्या अब आप अपनी चुप्पी छोड़ेंगे?

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