पुरी में गूंजा ‘जय जगन्नाथ’, मौसी के घर रवाना हुए भगवान; जानें क्यों खास है इस बार की रथयात्रा

ओडिशा (पुरी):
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर आज से विश्व प्रसिद्ध ‘जगन्नाथ रथयात्रा’ का शंखनाद हो चुका है। आस्था के इस महाकुंभ में पुरी की सड़कें ‘जय जगन्नाथ’ के जयकारों से गूंज उठी हैं। आज भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन छोड़कर नगर भ्रमण पर निकल पड़े हैं। अगले कुछ दिनों तक भगवान अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर में विश्राम करेंगे।

प्रशासनिक शेड्यूल के मुताबिक, आज शाम 4 बजे से भक्तों द्वारा रथ खींचने का मुख्य अनुष्ठान शुरू हो जाएगा। यह भव्य उत्सव 24 जुलाई को ‘बहुदा यात्रा’ (भगवान की वापसी) और 27 जुलाई को ‘नीलाद्री बीजे’ की रस्म के साथ संपन्न होगा।

रवि योग ने बढ़ाया इस बार की यात्रा का महत्व
ज्योतिषीय दृष्टि से इस साल की रथयात्रा बेहद खास मानी जा रही है। आज के दिन ‘रवि योग’ का निर्माण हो रहा है, जो इस धार्मिक उत्सव की शुभता को कई गुना बढ़ा रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस शुभ संयोग में भगवान के रथ की रस्सी छूने या खींचने मात्र से इंसान के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

जानिए रथों का क्रम और उनकी अनोखी पहचान
नीम की पवित्र लकड़ियों से तैयार किए गए तीनों भव्य रथों का अपना एक अलग महत्व और रंग-रूप होता है। इस यात्रा में रथों के चलने का क्रम इस प्रकार रहता है:

सबसे आगे (तालध्वज): सबसे आगे बड़े भाई बलभद्र जी का रथ चलता है, जिसे ‘तालध्वज’ कहा जाता है। यह रथ लाल और हरे रंग के कपड़ों से सजाया जाता है।

बीच में (दर्पदलन): मध्य में बहन सुभद्रा जी का रथ होता है, जिसे ‘दर्पदलन’ या ‘पद्मरथ’ कहते हैं। यह नीले और काले रंग की आभा से चमकता है।

सबसे पीछे (नंदिघोष): सबसे आखिर में स्वयं जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ जी का रथ चलता है, जिसे ‘नंदिघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहा जाता है। यह रथ लाल और पीले रंग का होता है।

जात-पात के भेद से परे, अटूट भक्ति का संदेश
जगन्नाथ रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहाँ अमीर-गरीब, जाति-पाति या ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता। राजा से लेकर रंक तक, हर वर्ग का श्रद्धालु एक समान होकर भगवान के रथ को खींचता है। मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देने की भगवान की यह लीला बताती है कि ईश्वर सिर्फ प्रेम और भक्ति के भूखे हैं।

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