युद्ध का मौसम और मुनाफे की फसल

– सुभाष मिश्र

‘मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ़ है, क्या मेरे हक़ में फैसला देगा?
यह शेर आज की वैश्विक राजनीति पर विचित्र रूप से सटीक बैठता है। दुनिया को बार-बार बताया जाता है कि युद्ध समाप्त होने वाला है, शांति स्थापित होने वाली है। फिर कुछ ही दिनों बाद मिसाइलें फिर चलने लगती हैं, बम फिर गिरने लगते हैं और बाजार फिर करवट बदल लेते हैं। सवाल यह है कि आखिर यह खेल किसके लिए खेला जा रहा है?
आज अमेरिका, इजऱायल और ईरान के बीच का तनाव केवल सीमाओं का संघर्ष नहीं रह गया है। यह युद्ध जितना रणभूमि में दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक वित्तीय बाजारों, ऊर्जा कारोबार, हथियार उद्योग और वैश्विक पूंजी के गलियारों में लड़ा जा रहा है। युद्ध शुरू होते ही शेयर बाजार गिरते हैं, तेल महंगा हो जाता है, सोना चमकने लगता है और अनिश्चितता बढ़ते ही बड़ी पूंजी नए अवसर तलाशने लगती है। फिर युद्धविराम की घोषणा होती है, बाजार उछल पड़ते हैं, निवेश लौट आता है और कुछ ही समय बाद यदि फिर तनाव बढ़े तो वही चक्र दोबारा शुरू हो जाता है।
युद्ध जब शुरू होता है तो सबसे पहले इंसान मरता है और सबसे अंत में इंसानियत। लेकिन इन दोनों के बीच एक तीसरी चीज जन्म लेती है—मुनाफा। यही आधुनिक युद्धों की सबसे बड़ी विडंबना है। एक तरफ शहर खंडहर बनते हैं, अस्पताल घायल लोगों से भर जाते हैं, लाखों लोग शरणार्थी बन जाते हैं और दूसरी ओर कुछ उद्योगों की बैलेंस शीट चमकने लगती है। कहीं हथियारों के नए ऑर्डर मिलते हैं, कहीं तेल की कीमतों से कमाई होती है, कहीं शेयरों और कमोडिटी के उतार-चढ़ाव से अरबों डॉलर का खेल खेला जाता है।
पहले कहा जाता था कि युद्ध इसलिए होते हैं ताकि हथियार बिकें। यह बात आज भी पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन अब तस्वीर कहीं अधिक जटिल हो चुकी है। आज युद्ध केवल हथियारों का बाजार नहीं चलाता, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों को भी प्रभावित करता है। शेयर, बॉन्ड, कमोडिटी, ऊर्जा, यहां तक कि क्रिप्टोकरेंसी तक युद्ध की हर खबर पर प्रतिक्रिया देती हैं। दुनिया के बड़े निवेशक और फंड कुछ ही मिनटों में अरबों डॉलर इधर से उधर कर देते हैं। जिनके पास विशाल पूंजी, तेज सूचना तंत्र और जोखिम उठाने की क्षमता है, वे इस अस्थिरता को अवसर में बदल लेते हैं।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। क्या हर युद्ध केवल विचारधारा, सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के लिए लड़ा जा रहा है, या उसके पीछे संसाधनों, बाजारों और पूंजी के नियंत्रण की भी एक अदृश्य लड़ाई चल रही है? इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारे युद्ध केवल मुनाफे के लिए होते हैं। राष्ट्रों के सामने सुरक्षा, सीमाओं और रणनीतिक हितों की वास्तविक चुनौतियां भी होती हैं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हर युद्ध के आसपास एक ऐसी अर्थव्यवस्था खड़ी हो जाती है, जो संकट को कारोबार में बदलने की कला जानती है।
आज का युद्ध केवल बारूद से नहीं लड़ा जाता। वह तेल के कुओं, समुद्री व्यापार मार्गों, साइबर नेटवर्क, वित्तीय संस्थानों और निवेश के गलियारों में भी चलता है। तेल की एक-एक बूंद भू-राजनीति का हथियार बन जाती है। समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ते ही कीमतें चढ़ जाती हैं। तेल महंगा होता है तो माल ढुलाई महंगी होती है, फिर हर वस्तु की कीमत बढ़ती है और अंतत: महंगाई का बोझ उस आम आदमी पर पड़ता है, जिसने न युद्ध शुरू किया, न युद्धविराम कराया और न ही किसी रणनीतिक बैठक में हिस्सा लिया।
सबसे दिलचस्प दृश्य तब होता है जब युद्ध के बीच अचानक शांति की घोषणा होती है। दुनिया राहत की सांस लेती है, बाजार चढ़ जाते हैं। फिर यदि कुछ दिनों बाद फिर बम गिरने लगें तो वही बाजार नीचे आ जाते हैं। ऐसा लगता है मानो युद्ध और युद्धविराम भी बाजार की भाषा में लिखे जा रहे हों। यह जरूरी नहीं कि हर उतार-चढ़ाव किसी साजिश का परिणाम हो, लेकिन यह निर्विवाद है कि हर उतार-चढ़ाव से कुछ लोग लाभ कमाते हैं और उसकी कीमत करोड़ों सामान्य नागरिक चुकाते हैं।
दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के नेतृत्व की शैली भी बदल रही है। राजनीति और कॉर्पोरेट पूंजी के रिश्ते पहले से कहीं अधिक गहरे हो चुके हैं। इसलिए हर बड़े भू-राजनीतिक फैसले के साथ यह सवाल भी उठता है कि उसका लाभ किसे मिलेगा। आम नागरिक इन चेहरों को पहचान भी नहीं पाता, क्योंकि वे अक्सर सत्ता के मंच पर नहीं, बल्कि वैश्विक निवेश, वित्त और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नेटवर्क में मौजूद होते हैं।
इतिहास गवाह है कि युद्ध के बाद विजेता और पराजित दोनों बदलते रहे हैं, लेकिन एक वर्ग हमेशा बचा रहा—वह वर्ग जिसने संकट में भी अवसर खोज लिया। युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि इसमें मरने वाला कभी बाजार नहीं होता। मरता है किसान का बेटा, मजदूर का बेटा, किसी मां का लाल और किसी बच्चे का पिता। लेकिन मुनाफे की बैलेंस शीट में इन नामों के लिए कोई कॉलम नहीं होता। वहां केवल उत्पादन, मांग, आपूर्ति, निवेश और लाभांश दर्ज होता है।
आज वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी परस्पर जुड़ चुकी है कि कहीं भी बारूद फूटे, उसकी गूंज पूरी दुनिया की जेब में सुनाई देती है। इसलिए युद्ध अब केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते, वे अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, तकनीक और पूंजी के मोर्चों पर भी जारी रहते हैं।
दुनिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अगला युद्ध कहां होगा। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कभी ऐसी व्यवस्था बन पाएगी, जहां शांति का मूल्य युद्ध से अधिक हो? जहां हथियारों की मांग विकास से कम हो, जहां बाजार मानव जीवन से ऊपर न हों और जहां किसी भी मानवीय त्रासदी को कारोबारी अवसर में बदलने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सके, क्योंकि इतिहास बार-बार यही सिखाता है—युद्ध की राख से कुछ लोगों के महल जरूर बन जाते हैं, लेकिन मानवता का घर हमेशा जलता है।

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