पाठ्यक्रम का रंग नहीं, ज्ञान का स्तर बदलना चाहिए

सुभाष मिश्र

भारत की शिक्षा व्यवस्था का इतिहास केवल स्कूलों और किताबों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह देश की वैचारिक यात्रा का भी इतिहास है। अंग्रेज जब भारत आए तो वे ऐसी शिक्षा व्यवस्था लेकर आए जिसका उद्देश्य स्वतंत्र विचार वाले नागरिक बनाना नहीं, बल्कि अपने शासन के लिए बाबू और कर्मचारी तैयार करना था। स्वतंत्रता के बाद यह उम्मीद थी कि देश अपनी सभ्यता, संस्कृति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नई शिक्षा प्रणाली विकसित करेगा, लेकिन लंबे समय तक औपनिवेशिक शिक्षा की छाया बनी रही। अंग्रेज चले गए, पर उनकी बनाई व्यवस्था और अंग्रेज़ी-केंद्रित सोच का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ।
आजादी के बाद हर सरकार ने शिक्षा में सुधार की बात की। आयोग बने, समितियां बनीं, नई नीतियां आईं और पाठ्यक्रम बदलते रहे। वर्ष 2020 में लागू राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) ने भी शिक्षा को रटने की बजाय समझ, कौशल, रोजगार, नवाचार और बहुविषयक अध्ययन से जोडऩे का लक्ष्य रखा। यह स्वागतयोग्य दिशा है। बच्चों का बोझ कम करना, आलोचनात्मक सोच विकसित करना और स्थानीय ज्ञान को महत्व देना निश्चित रूप से सकारात्मक पहल है। इसी नीति के अनुरूप आज एनसीईआरटी और विभिन्न राज्यों के एससीईआरटी अपने पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव कर रहे हैं। कक्षा 9 में सामाजिक विज्ञान की एकीकृत पुस्तक लाई गई है। अर्थशास्त्र को व्यवहारिक उदाहरणों से जोड़ा गया है। न्यायपालिका, लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों पर नए सिरे से जोर दिया गया है। छत्तीसगढ़ में भी स्थानीय साहित्य, संस्कृति, स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों और राज्य की विशेषताओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रयास हो रहा है। यह भी उचित है कि बच्चे अपने परिवेश और अपनी मिट्टी से परिचित हों।
लेकिन, प्रश्न केवल इतना नहीं है कि क्या पढ़ाया जा रहा है? बड़ा प्रश्न यह है कि क्यों पढ़ाया जा रहा है और किस दृष्टिकोण से पढ़ाया जा रहा है? यहीं से विवाद शुरू होता है। हर नई सरकार सत्ता में आने के बाद पाठ्यपुस्तकों को बदलना अधिकार मान लेती है। कोई कहता है कि पहले इतिहास वामपंथी दृष्टिकोण से लिखा गया था, इसलिए उसे बदला जाना चाहिए। कोई आरोप लगाता है कि वर्तमान सरकार इतिहास का भगवाकरण कर रही है। कहीं स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका बदली जाती है, कहीं मुगलकाल का महत्व घटाया जाता है, कहीं धार्मिक प्रतीकों को अधिक स्थान मिलता है, तो कहीं प्रार्थनाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर नए निर्देश आते हैं। शिक्षा धीरे-धीरे ज्ञान का माध्यम कम और वैचारिक संघर्ष का मैदान अधिक बनती दिखाई देती है।
यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। पाठ्यपुस्तकें सरकार की विचारधारा का प्रचार-पत्र नहीं हो सकतीं। उनका उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए जो प्रश्न पूछ सके, तर्क कर सके, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखे और संविधान के मूल्यों को समझे। यदि बच्चे को केवल एक ही दृष्टिकोण पढ़ाया जाएगा तो उसकी सोच सीमित हो जाएगी। शिक्षा का उद्देश्य सोच को खोलना है, बंद करना नहीं। यह भी सच है कि पाठ्यक्रम समय के साथ बदलना चाहिए। दुनिया बदल रही है, तकनीक बदल रही है, अर्थव्यवस्था बदल रही है और पर्यावरण संबंधी चुनौतियां भी नई हैं। दशकों पुराने आंकड़े और अप्रासंगिक विषय बच्चों को वर्तमान से नहीं जोड़ सकते। इसलिए समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। लेकिन समीक्षा और राजनीतिक पुनर्लेखन में अंतर होता है। बदलाव तथ्यों, शोध और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर होना चाहिए, न कि सत्ता परिवर्तन के साथ। लगातार बदलाव का व्यावहारिक नुकसान भी कम नहीं है। हर साल नई किताबें आने से अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। शिक्षक बार-बार प्रशिक्षण लेने को मजबूर होते हैं। छात्र परीक्षा के दबाव के बीच नए ढांचे के साथ तालमेल बैठाते हैं। सरकारी और निजी स्कूलों के बीच गुणवत्ता का अंतर भी बढ़ सकता है। शिक्षा में स्थिरता उतनी ही आवश्यक है जितनी प्रासंगिकता।
इसलिए आवश्यकता संतुलन की है। पाठ्यक्रम की समीक्षा हर पांच-दस वर्ष में विशेषज्ञ समितियों द्वारा हो। उसमें शिक्षकों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों, अभिभावकों और विषय विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित हो। स्थानीय इतिहास और संस्कृति को सम्मान मिले, लेकिन राष्ट्रीय एकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई समझौता न हो। इतिहास तथ्य आधारित हो, विज्ञान प्रमाण आधारित हो और समाज विज्ञान लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हो। किसी भी समुदाय, धर्म, विचारधारा या व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह या महिमामंडन शिक्षा का उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
देश का भविष्य संसद में कम और कक्षाओं में अधिक तय होता है, इसलिए पाठ्यपुस्तकों का रंग बदलने से अधिक जरूरी है कि शिक्षा का स्तर बदले। सरकारें आएंगी-जाएंगी, विचारधाराएं बदलेंगी, लेकिन यदि हमारी शिक्षा बच्चों में जिज्ञासा, विवेक, संवेदनशीलता और वैज्ञानिक सोच पैदा नहीं कर सकी, तो कोई भी नई शिक्षा नीति अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाएगी। पाठ्यक्रम का उद्देश्य विचार थोपना नहीं, विचार पैदा करना होना चाहिए। यही शिक्षा की असली कसौटी है।

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