-सुभाष मिश्र
‘सभी भूमि गोपाल की – भारतीय संस्कृति में यह वाक्य इस भावना को दर्शाता है कि धरती किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति की साझा धरोहर है। जमीन केवल खरीद-बिक्री की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका और भविष्य का आधार है। लेकिन आधुनिक समय में यही कहावत एक अलग अर्थ में दिखाई देने लगी है। अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर विकास से मिलने वाला लाभ किसके हिस्से में जा रहा है? क्या विकास योजनाओं का फायदा आम जनता को मिल रहा है या फिर उन लोगों को जो सत्ता, प्रशासन और प्रभावशाली नेटवर्क के करीब हैं?
देश के किसी भी हिस्से में जब कोई बड़ी विकास परियोजना आती है तो उसके आसपास की जमीनों की कीमत अचानक बढऩे लगती है। नई सड़क, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, एयरपोर्ट, मेट्रो परियोजना, स्मार्ट सिटी, धार्मिक कॉरिडोर या बड़े सरकारी प्रोजेक्ट, इनकी घोषणा होते ही जमीन बाजार में हलचल शुरू हो जाती है। कई बार देखा गया है कि परियोजना की आधिकारिक घोषणा से पहले ही कुछ लोग आसपास की जमीनें खरीद लेते हैं। बाद में वही जमीन कई गुना अधिक कीमत पर बिकती है।
यहां सवाल जमीन खरीदने का नहीं है। किसी भी नागरिक को अपनी क्षमता के अनुसार संपत्ति खरीदने का अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या कुछ लोगों को ऐसी गोपनीय जानकारी पहले से मिल जाती है जो आम लोगों के पास नहीं होती? यदि किसी व्यक्ति को पहले से पता है कि आने वाले समय में किसी क्षेत्र में सड़क बनने वाली है, उद्योग स्थापित होने वाला है या जमीन का उपयोग बदलने वाला है, तो वह जानकारी उसके लिए करोड़ों रुपये कमाने का माध्यम बन सकती है।
यही स्थिति ‘इनसाइडर इंफॉर्मेशन यानी अंदरूनी जानकारी के दुरुपयोग की चिंता पैदा करती है। शेयर बाजार में यदि कोई व्यक्ति गोपनीय जानकारी के आधार पर निवेश करता है तो इसे गंभीर अपराध माना जाता है। लेकिन जमीन के मामले में ऐसी व्यवस्था अभी उतनी मजबूत नहीं है। यही कारण है कि कई बार विकास योजनाओं की जानकारी कुछ चुनिंदा लोगों तक पहले पहुंचने के आरोप लगते रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में विकास परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। भारतमाला जैसी बड़ी सड़क परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े मामलों ने यह बहस तेज की है कि आखिर योजनाओं की जानकारी किस स्तर तक और कितनी जल्दी पहुंचती है। इसी तरह मध्य प्रदेश के उज्जैन क्षेत्र में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार द्वारा जमीन खरीदी को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया, जहां विपक्ष ने सवाल उठाए और सरकार ने इसे वैध निजी निवेश बताया। हरियाणा और राजस्थान में रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े भूमि सौदों पर भी वर्षों तक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे। उत्तर प्रदेश के नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में भी जमीन से जुड़े विवाद सामने आते रहे हैं। इन सभी मामलों में एक बात समान दिखाई देती है, जहां विकास की संभावना बढ़ती है, वहां जमीन का मूल्य तेजी से बढ़ता है। लेकिन सवाल यह है कि इस बढ़ती कीमत का सबसे बड़ा लाभ किसे मिलता है?
शहरों के विस्तार ने जमीन के इस खेल को और बड़ा बना दिया है। जो कृषि भूमि वर्षों से किसानों की आजीविका का आधार रही, वह धीरे-धीरे रियल एस्टेट की नजर में आ जाती है। जैसे ही किसी क्षेत्र का भूमि उपयोग बदलता है, जमीन की कीमत कई गुना बढ़ जाती है। किसान कई बार तत्काल आर्थिक जरूरतों के कारण अपनी जमीन बेच देते हैं, लेकिन बाद में वही जमीन बड़े कारोबारियों या निवेशकों के लिए भारी मुनाफे का साधन बन जाती है।
यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता नहीं बढ़ाती, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियां भी पैदा करती है। खेती की जमीन कम होती जाती है और उसकी जगह कंक्रीट के शहर फैलते जाते हैं। अनियोजित शहरीकरण से जल संकट, प्रदूषण और पर्यावरणीय दबाव जैसी समस्याएं भी बढ़ती हैं।
भारत में पिछले दो दशकों में रियल एस्टेट क्षेत्र ने जबरदस्त विस्तार देखा है। जमीन को लंबे समय से सुरक्षित और लाभदायक निवेश माना जाता रहा है। यही कारण है कि राजनीति, प्रशासन और कारोबार से जुड़े कई प्रभावशाली लोग जमीन में निवेश को प्राथमिकता देते हैं। जब कोई बड़ा प्रोजेक्ट आता है तो उसके आसपास जमीन की कीमत बढऩा स्वाभाविक है, लेकिन यदि यह लाभ केवल उन लोगों तक सीमित रह जाए जिनके पास पहले से जानकारी और प्रभाव है, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
विकास योजनाएं किसी क्षेत्र की जनता के जीवन को बेहतर बनाने के लिए होती हैं। सड़कें बेहतर आवागमन के लिए, उद्योग रोजगार के लिए और शहरों का विस्तार बेहतर सुविधाओं के लिए होना चाहिए। लेकिन यदि विकास की प्रक्रिया ही कुछ लोगों के लिए संपत्ति बढ़ाने का अवसर बन जाए तो लोकतंत्र में भरोसा कमजोर होता है।
इस समस्या का समाधान पारदर्शिता में है। विकास परियोजनाओं की योजना बनने से लेकर अंतिम मंजूरी तक की प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए। मास्टर प्लान, भूमि उपयोग परिवर्तन और प्रस्तावित परियोजनाओं की जानकारी समय पर सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। जिन अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों का किसी परियोजना से सीधा संबंध हो, उन्हें अपनी और अपने परिवार की संबंधित भूमि खरीद की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
इसके साथ ही हितों के टकराव के स्पष्ट नियम बनाए जाने की जरूरत है। जिन लोगों के पास किसी क्षेत्र के विकास संबंधी निर्णय लेने की जिम्मेदारी है, उनके लिए उस क्षेत्र में भूमि खरीद पर निश्चित अवधि तक प्रतिबंध या विशेष निगरानी जैसी व्यवस्था होनी चाहिए। विकास जरूरी है और देश को आगे बढऩे के लिए बड़े प्रोजेक्ट भी जरूरी हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल सड़कें, इमारतें और जमीन की बढ़ती कीमतें नहीं होना चाहिए। असली विकास वही है जिसमें आम नागरिक, किसान और स्थानीय समुदाय भी लाभ का हिस्सा बनें।
सवाल किसी एक व्यक्ति, एक सरकार या एक राज्य का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें विकास की दिशा की जानकारी कुछ लोगों के लिए निजी संपत्ति बनाने का जरिया बन जाती है। यदि ‘सभी भूमि गोपाल कीÓ है, तो उसका लाभ भी समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए। विकास की पहली फसल जनता को मिलनी चाहिए, न कि केवल उन लोगों को जिन्हें सत्ता और सूचना के गलियारों तक पहुंच हासिल है।