Antarctica Ice Sheet Mystery: अंटार्कटिका में तीन किलोमीटर मोटी बर्फ के नीचे छिपी मिली विशाल रहस्यमयी संरचना, प्राचीन गोंडवाना महाद्वीप से जुड़ा है कनेक्शन

नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने पूर्वी अंटार्कटिका की बर्फीली चादर के नीचे एक बेहद चौंकाने वाली खोज की है। तीन किलोमीटर से भी ज्यादा मोटी बर्फ की परतों के नीचे एक विशाल पंखे जैसी आकृति का सिस्टम मिला है। यह विशाल ढांचा जमीन के अंदर मौजूद कई बड़े बेसिनों और घाटियों को आपस में जोड़ता है। रिसर्चर्स का मानना है कि इस रहस्यमयी संरचना का संबंध करोड़ों साल पहले टूटे प्राचीन सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना (Supercontinent Gondwana) से हो सकता है। इस खोज ने विज्ञान जगत में हलचल मचा दी है क्योंकि यह पृथ्वी की सबसे बड़ी भूगर्भीय संरचनाओं में से एक हो सकती है।

क्या है बर्फ के नीचे छिपा पंखे जैसा सिस्टम

इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ जेनोआ के वैज्ञानिक एगिडियो आर्माडिलो और उनकी टीम ने इस छिपी हुई दुनिया का पता लगाया है। वैज्ञानिकों ने इसे ईस्ट अंटार्कटिक फैन-शेप्ड बेसिन प्रोविंस (East Antarctic Fan-Shaped Basin Province) नाम दिया है। यह अनोखा सिस्टम अंटार्कटिका के कई मशहूर बेसिनों को आपस में जोड़ता है, जिसमें लेक वोस्तोक (Lake Vostok) भी शामिल है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पूरी संरचना एक दुर्लभ टेक्टोनिक प्रक्रिया के कारण बनी है, जिसे डिस्ट्रिब्यूटेड रोटेशनल एक्सटेंशन (Distributed Rotational Extension) कहा जाता है। इसमें जमीन का एक हिस्सा किसी केंद्र बिंदु से बाहर की तरफ फैलता है।

गोंडवाना के टूटने का छिपा है राज

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह संरचना उस दौर की है जब करीब 18 करोड़ साल पहले प्राचीन गोंडवाना महाद्वीप टूट रहा था। इस महाद्वीप में भारत, अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका जैसे भूभाग एक साथ जुड़े हुए थे। करीब 7 करोड़ साल पहले जब अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया एक-दूसरे से अलग हुए, तब इस फैन-शेप्ड बेसिन ने उस जमीन को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई होगी। इस खोज से जुड़ी पूरी स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल नेचर जियोसाइंस (Nature Geoscience Journal) में प्रकाशित हुई है।

अंटार्कटिका उतना शांत नहीं जितना समझा जाता था

अब तक दुनिया भर के वैज्ञानिक पूर्वी अंटार्कटिका (Eastern Antarctica) को पृथ्वी का सबसे पुराना और स्थिर हिस्सा मानते थे। लेकिन इस नई खोज ने पुरानी सारी धारणाएं बदल दी हैं। इस अध्ययन से साफ हो गया है कि इस बर्फीले इलाके का इतिहास काफी हलचल भरा और जटिल रहा है। बर्फ के नीचे दबे इस खिंचाव और टूट-फूट के कारण ही वहां गैंबुर्तसेव जैसी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं (Gamburtsev Mountain Range) बनीं, जो आज पूरी तरह बर्फ के नीचे दफन हैं।

भविष्य के क्लाइमेट चेंज को समझने में मिलेगी मदद

यह खोज सिर्फ इतिहास जानने के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि इससे ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के खतरे को समझने में भी मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जमीन के नीचे का यह ढांचा ही तय करता है कि ग्लेशियर और बर्फ किस तरफ खिसकेंगे। यदि आने वाले समय में तापमान बढ़ने से अंटार्कटिका की बर्फ (Antarctic Ice Sheet) पिघलती है, तो यह डेटा काफी काम आएगा। इससे वैज्ञानिक अधिक सटीकता से मौसम और समुद्र के जलस्तर में होने वाले बदलावों का अनुमान लगा सकेंगे। अंटार्कटिका का 99 फीसदी हिस्सा अभी भी बर्फ के नीचे छिपा है, जिससे जुड़े कई राज खुलना बाकी हैं।

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