कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज हो रहे आपराधिक मामलों ने फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। जनता की समस्याओं को उठाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी संभालने वाले कई विधायक स्वयं कानून के घेरे में आ रहे हैं। किसी पर धोखाधड़ी का आरोप है तो किसी पर अधिकारियों के साथ मारपीट का, वहीं किसी पर भड़काऊ भाषण का तो किसी पर नियमों के उल्लंघन या विवादित टिप्पणियों के मामले दर्ज हैं।
ताजा मामला सीतापुर से भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो का है, जिन पर एक नायब तहसीलदार के साथ मारपीट और शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का आरोप लगा है। शिकायत के बाद पुलिस ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
टोप्पो के खिलाफ दर्ज प्रकरण ने प्रदेश की राजनीति में फिर जनप्रतिनिधियों के आचरण और उनकी जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पिछले ढाई वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों के कम से कम नौ विधायक अलग-अलग मामलों में एफआईआर या कानूनी कार्रवाई का सामना कर चुके हैं। इनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेता शामिल हैं।
विधायकों के खिलाफ दर्ज मामलों की सूची पर नजर डालें तो यह केवल राजनीतिक विवादों तक सीमित नहीं है। फरवरी 2026 में जांजगीर-चांपा से कांग्रेस विधायक ब्यास नारायण कश्यप समेत 12 लोगों को सड़क जाम करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी वर्ष जनवरी में जैजैपुर से कांग्रेस विधायक बालेश्वर साहू को कोऑपरेटिव बैंक धोखाधड़ी मामले में जेल भेजा गया था।
इन मामलों ने राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा बटोरी थी। वहीं, वर्ष 2025 और 2024 के दौरान भी कई विधायक विवादों में घिरे रहे। जशपुर से भाजपा विधायक रायमुनि भगत पर धर्म विशेष को लेकर कथित टिप्पणी के मामले में एफआईआर दर्ज हुई। सारंगढ़ से कांग्रेस विधायक उत्तरी जांगड़े का एक वीडियो वायरल होने के बाद उन पर भड़काऊ भाषण देने के आरोप लगे। कोंटा से कांग्रेस विधायक कवासी लखमा पर नियमों के उल्लंघन और प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित विवादित टिप्पणी को लेकर मामला दर्ज हुआ। बाद में वे शराब घोटाले से जुड़े मामले में भी जेल गए।
विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के नाम भी इस सूची में शामिल हैं। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के खिलाफ अप्रैल 2024 में प्रधानमंत्री के संबंध में दिए गए बयान को लेकर एफआईआर दर्ज की गई थी। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का नाम भी महादेव सट्टा ऐप मामले की जांच के दौरान सामने आया, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कार्रवाई की गई। भिलाई नगर से कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव के खिलाफ भी एक से अधिक मामलों में कार्रवाई हुई। मई 2026 में एक मंत्री की प्रतीकात्मक शवयात्रा निकालने के मामले में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, जबकि इससे पहले बलौदाबाजार हिंसा प्रकरण में भी वे कानूनी कार्रवाई का सामना कर चुके हैं और जेल भी गए थे।
इन घटनाओं के बीच एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट भी चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। विधानसभा चुनाव और उपचुनाव के दौरान दाखिल हलफनामों के आधार पर तैयार रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के कम से कम 18 विधायकों के खिलाफ विभिन्न प्रकार के मामले दर्ज थे। इनमें कुछ मामले आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े हैं, जबकि कुछ गंभीर आपराधिक श्रेणी में आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सात विधायकों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन दागी विधायकों में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के जनप्रतिनिधि शामिल हैं।
वर्तमान विधानसभा में जिन विधायकों के खिलाफ विभिन्न प्रकार के मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है, उनमें सुशांत शुक्ला, इंद्रकुमार साव, देवेंद्र यादव, विनायक गोयल, गजेंद्र यादव, बालेश्वर साहू, आशाराम नेताम, विजय शर्मा, अटल श्रीवास्तव, योगेश्वर राजू सिन्हा, दयालदास बघेल, भूपेश बघेल, शकुंतला सिंह पोर्ते, ओपी चौधरी, राजेश मूणत, उद्देश्वरी पैकरा, रिंकेश सेन और सुनील सोनी जैसे नाम शामिल हैं। कई मामलों में जांच जारी है, जबकि कुछ मामलों में न्यायालय में सुनवाई चल रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की छवि केवल चुनाव जीतने से नहीं बनती, बल्कि उनके सार्वजनिक व्यवहार और कानून के प्रति सम्मान से भी तय होती है। जब विधायकों के खिलाफ लगातार एफआईआर दर्ज होती हैं या वे विवादों में घिरते हैं, तो इसका असर न केवल उनकी व्यक्तिगत साख पर पड़ता है, बल्कि संबंधित राजनीतिक दल की छवि भी प्रभावित होती है।
हालांकि अधिकांश मामलों में संबंधित नेताओं ने आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध, विरोधियों की साजिश या जनहित के मुद्दों पर संघर्ष का परिणाम बताया है। कई मामलों में अंतिम निर्णय न्यायालयों और जांच एजेंसियों के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। फिर भी यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि प्रदेश में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में बढ़ती यह प्रवृत्ति एक बड़ा सवाल छोड़ती है—क्या जनता के प्रतिनिधियों से अपेक्षित आचरण और राजनीतिक व्यवहार का स्तर बदल रहा है, या फिर राजनीतिक संघर्ष अब अधिकाधिक कानूनी लड़ाइयों में बदलता जा रहा है? जवाब जो भी हो, लेकिन बढ़ते मामलों ने कानून, राजनीति और जनप्रतिनिधित्व के रिश्ते को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।