-सुभाष मिश्र
लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता को समाज की आँख, कान और चेतना मानता है। मीडिया की दुनिया में बीते कुछ वर्षों में जितनी तेज़ी से बदलाव आया है, शायद पहले कभी नहीं आया। यह परिवर्तन केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि सोच, सरोकार, प्रस्तुति और पत्रकारिता के चरित्र तक फैला हुआ है। कभी कहा गया था—
‘खिंचो न कमानों को, न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।
लेकिन आज वही अखबार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कोरोना संक्रमणकाल ने इस बदलाव को और तेज कर दिया। कागज़ पर छपने वाले अखबार पीडीएफ में बदल गए। मोबाइल फोन ने हर व्यक्ति को रिपोर्टर, फोटोग्राफर और सूचना स्रोत बना दिया। सोशल मीडिया के दौर में खबरें अब न्यूज़रूम से पहले मोबाइल स्क्रीन पर जन्म लेने लगी हैं। पत्रकार अब नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार कम और उनके ट्वीट, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट पर अधिक निर्भर रहने लगे हैं। नेता भी जनता से सीधे संवाद के लिए मीडिया को दरकिनार कर अपने डिजिटल मंच तैयार कर चुके हैं।
तकनीकी क्रांति ने सूचना का लोकतंत्रीकरण तो किया, लेकिन इसी के साथ पत्रकारिता की विश्वसनीयता और गंभीरता पर संकट भी खड़ा हुआ। बड़ी पूंजी और कॉरपोरेट नियंत्रण ने मीडिया संस्थानों की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया है। छोटे और स्वतंत्र अखबार तथा वेब पोर्टल ऑक्सीजन सिलेंडर पर चल रहे मरीजों की तरह संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी विज्ञापन उनके लिए ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने सूचना के अधिकार, जनहित याचिका और मीडिया को भी व्यक्तिगत लाभ और अवसर में बदल दिया है। वे हर संकट में अपने लिए संभावना तलाश लेते हैं।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अनेक गंभीर पत्रकारों ने अपने स्वतंत्र डिजिटल मंचों और सब्सक्राइबर आधारित मॉडल के जरिए यह साबित किया कि ईमानदार पत्रकारिता अब भी जीवित है। वे बिना बड़े कॉरपोरेट सहारे के जनता के सवाल उठा रहे हैं और बेबाक तरीके से अपनी बात कह पा रहे हैं। यह इस दौर की एक महत्वपूर्ण संभावना है।
मीडिया के सामने चुनौतियाँ पहले भी थीं, लेकिन आज की तरह एजेंडा आधारित पत्रकारिता शायद पहले कभी नहीं रही। सत्ता और पूंजी के दबाव ने स्वतंत्र मीडिया को कमजोर किया है। बाहर से तेज-तर्रार और प्रभावशाली दिखने वाला पत्रकार अपने संस्थान के भीतर अक्सर एक कठपुतली की तरह होता है। उसे वही बोलना और लिखना पड़ता है जो संस्थान के मालिक या सत्ता प्रतिष्ठान चाहते हैं। ऐसे समय में अभिव्यक्ति की थोड़ी बहुत स्वतंत्रता वहीं बची है जहाँ पत्रकारिता को अब भी समाज के प्रति जिम्मेदारी और जनपक्षधरता का माध्यम माना जाता है। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने एक कार्यक्रम में कहा कि ‘पत्रकारिता विश्वविद्यालय आत्मघाती दस्ते तैयार कर रहे हैं। वहाँ पत्रकार नहीं, दलाल तैयार किए जा रहे हैं। उनका यह कथन यूँ ही नहीं था। उन्होंने यह टिप्पणी उस संदर्भ में की, जहाँ पत्रकारिता के छात्रों के प्रश्नपत्रों में भी वैचारिक झुकाव स्पष्ट दिखाई देने लगा था। सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी? पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से सवाल करना था, लेकिन आज उसका बड़ा हिस्सा सत्ता का प्रवक्ता बनता जा रहा है।
कोरोना काल इसका बड़ा उदाहरण रहा। उस समय जब मीडिया को स्वास्थ्य व्यवस्था, बेरोजगारी, पलायन और जनसंकट पर गंभीर सवाल उठाने चाहिए थे, तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बड़ा हिस्सा समाज को गैरजरूरी बहसों और सनसनीखेज मुद्दों में उलझाने में लगा रहा। तब्लीगी जमात को ‘मानव बम की तरह प्रस्तुत किया गया। मुस्लिम समाज के युवाओं के प्रशासनिक सेवाओं में चयन को ‘प्रशासकीय जिहाद जैसे शब्दों से जोड़ा गया। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि समाज में भय और विभाजन पैदा करने की प्रवृत्ति थी।
रामजन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद विवाद के बाद मीडिया के एक बड़े वर्ग की सोच कथित राष्ट्रवाद के नाम पर अधिक संकुचित होती चली गई। खबरों को देखने और दिखाने का दृष्टिकोण बदल गया। घटनाओं का विश्लेषण अब निष्पक्षता से अधिक वैचारिक आग्रहों से प्रभावित होने लगा। इस बीच हिंदी पत्रकारिता ने अपने 200 वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर रायपुर प्रेस ने पत्रकारिता गौरव मार्तण्ड उत्सव का आयोजन कर ‘पत्रकारिता: स्याही से स्क्रीन तक, ‘पत्रकारिता न्यूज रूम से न्यू मीडिया तक की संभावनाएं एवं चुनौतियां पर विषय पर व्याख्यान करवा रहा है। वास्तव में यह अवसर आत्ममंथन का होना चाहिए था। यह सोचने का कि पत्रकारिता जनता की आवाज़ बनने में कितनी सफल रही और कहाँ वह सत्ता के गलियारों में भटक गई।
हमारे देश में भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, सेंट जेवियर्स कॉलेज, मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर और लेडी श्रीराम कॉलेज जैसे अनेक प्रतिष्ठित संस्थान हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को गंभीर बौद्धिक आधार दिया। लेकिन सूचना क्रांति के बाद मीडिया शिक्षा रोजगार का बड़ा माध्यम बन गई। कई नए विश्वविद्यालय और संस्थान खुले जहाँ वैचारिक प्रतिबद्धता को योग्यता से अधिक महत्व मिलने लगा। परिणामस्वरूप मीडिया में ऐसे युवाओं की बड़ी संख्या आई जो नौकरी, पहचान और अवसर के संघर्ष में समझौते करने लगे। सत्ता के गलियारों तक पहुँचने का शॉर्टकट उन्हें अधिक आकर्षक लगने लगा।
आज स्थिति यह है कि मीडिया संस्थानों में एक खास वैचारिक झुकाव स्पष्ट दिखाई देता है। गोदी मीडिया शब्द अब केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि जनचर्चा का हिस्सा बन चुका है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बड़ा हिस्सा अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। कुछ चैनलों की भूमिका किसी तीसरे दर्जे के वीर रस कवि जैसी लगती है जो हर रात चीन और पाकिस्तान को ललकारते हुए राष्ट्रवाद का तमाशा पेश करते हैं। जनता के असली सवाल महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, मजदूर इन सबके लिए स्क्रीन पर जगह लगातार कम होती जा रही है।
पहले चारण होते थे, फिर अखबारों ने समाज में वैचारिक भूमिका निभाई। नेहरू युग तक अखबारों की एक नैतिक विश्वसनीयता थी। इंदिरा गांधी के दौर में उस पर दबाव बढ़ा, लेकिन आज जिस तरह मीडिया बिकने और झुकने को आतुर दिखाई देता है, वैसी स्थिति पहले कभी नहीं थी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अधिकांश चैनलों के पास अब न रीढ़ बची है, न साहस। साम, दाम, दंड और भेद हर तरीके से मीडिया को प्रभावित किया गया है। ग्लैमर और कॉरपोरेट पूंजी से चमकते नए मीडिया के पास गरीब आदमी के लिए स्पेस लगातार कम होता जा रहा है।
सबसे बड़ा संकट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर है। यदि समाज के जरूरी सवालों पर भी लोग चुप रहेंगे, तो यह चुप्पी भविष्य में एक बड़े अंधेरे को जन्म देगी। तब केवल एक तरफ से आती आवाजें सुनाई देंगी और लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ खो जाएगा। सच यह भी है कि डरी हुई सत्ता अधिक आक्रामक होती है। वह प्रतिबंधों, दबावों और दंड के माध्यम से अपने विरोधियों को डराने की कोशिश करती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जनता की आवाज़ को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। लौह कपाटों के पीछे बैठा कोई भी शासक सच से हमेशा नहीं बच सकता।
आज आवश्यकता है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल स्वभाव की ओर लौटे, जनता के पक्ष में खड़े होने वाली, सत्ता से सवाल पूछने वाली और समाज को सच दिखाने वाली पत्रकारिता। यह रास्ता आसान नहीं है। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पड़ेंगे। मठ और गढ़ तोडऩे होंगे। गजानन माधव मुक्तिबोध की पंक्तियाँ आज पहले से अधिक प्रासंगिक लगती हैं—
‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे,
तोडऩे होंगे मठ और गढ़ सब,
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार।
क्योंकि लोकतंत्र में सच बोलने की ताकत ही पत्रकारिता की असली पहचान है। यदि यह बची रही तो उम्मीद भी बची रहेगी।