चारमा में कमजोर मानसून से गहराया संकट: यदि 48 घंटे में नहीं बरसे बदरा तो मंडराएगा भीषण अकाल का साया

चारमा : खरीफ सीजन की शुरुआत में हुई हल्की-फुल्की फुहारों को देखकर चारमा अंचल के किसानों के चेहरों पर जो रौनक आई थी, वह अब पूरी तरह गायब हो चुकी है। मानसून की बेरुखी ने पूरे क्षेत्र को भीषण संकट में डाल दिया है। पिछले एक हफ्ते से अधिक समय से आसमान से बादल पूरी तरह नदारद हैं। तेज, कड़क और चुभने वाली धूप के कारण धरती का तापमान तेजी से बढ़ा है, जिससे मानसून का पूरा चक्र बुरी तरह पिछड़ चुका है। खेती-किसानी के सबसे महत्वपूर्ण समय में बारिश का यह ठहराव एक बड़े कृषि संकट की ओर इशारा कर रहा है।

मौसम विभाग व कृषि विशेषज्ञों की महा-चेतावनी

सरकारी और स्थानीय कृषि केंद्रों से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस सीजन में अब तक महज 110 एमएम ही बारिश दर्ज की गई है, जो कि इस अवधि तक होने वाली सामान्य औसत बारिश का सिर्फ 50 प्रतिशत ही है। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी जारी की है कि यदि अगले 24 से 48 घंटे के भीतर क्षेत्र में व्यापक रूप से मूसलाधार बारिश नहीं होती है, तो इस वर्ष क्षेत्र में भीषण अकाल की स्थिति निर्मित हो जाएगी। खरीफ का पूरा सीजन चौपट होने की कगार पर पहुंच चुका है और रोपे गए धान के पौधे खेतों में ही दम तोड़ रहे हैं।

सूख रही धान की हरी चादर, खेतों में आई दरारें

अंचल के किसान प्रदीप कुमार मंडावी, रेखलाल विश्वकर्मा, हेमंत विश्वकर्मा, धर्मेंद्र मंडावी, सुनील सोनकर, अजय देवांगन, राहुल सिन्हा, लोकेश्वर जैन, जसवंत सोनकर, प्रतीक साहू, तोमेंद्र देवांगन और महेंद्र रेड्डी सहित दर्जनों ग्रामीणों का दर्द छलक पड़ा है। उन्होंने बताया कि मानसून के आगमन पर कर्ज लेकर और जमापूंजी झोंककर धान की बुवाई की थी। पहली बारिश के बाद खेत हरी चादर की तरह दिखने लगे थे, लेकिन अब आसमान से बरसती आग के कारण खेतों की नमी गायब हो चुकी है। धूप से मिट्टी पत्थर जैसी सख्त हो गई है और उसमें चौड़ी दरारें पड़ने लगी हैं। पानी के अभाव में नन्हे पौधे पीले पड़कर झुलस रहे हैं।

अत्यधिक उमस से लोग बेहाल, अस्पतालों में उमड़ी मरीजों की भारी भीड़

बारिश बंद होने का दुष्प्रभाव केवल फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने आम जनजीवन और इंसानी सेहत को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। दिन में तीखी धूप और रात में हवा थम जाने के कारण वातावरण में उमस का स्तर रिकॉर्ड तोड़ ऊंचाइयों पर पहुंच गया है। इस दमघोंटू मौसम के कारण बच्चों, बुजुर्गों और कामकाजी लोगों की तबीयत लगातार बिगड़ रही है। क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में मौसमी बीमारियों, उल्टी-दस्त, गंभीर डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और तेज बुखार के मरीजों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है, जिससे स्वास्थ्य संकट गहराने लगा है।

दोबारा बोनी का खतरा, दोहरी आर्थिक मार झेलने को मजबूर किसान

मानसून पिछड़ने से किसानी का काम पूरी तरह से ठप हो गया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि दो-तीन दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो अंकुरित हो चुकी धान की फसल पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। इसके बाद किसानों के सामने खेतों को दोबारा जोतकर नए सिरे से बुवाई करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। दोबारा बोनी करने से बीज, खाद, ट्रैक्टर के डीजल और मजदूरी का खर्च दोगुना हो जाएगा। पहले से ही कृषि सामग्रियों की बढ़ती महंगाई से दबा छोटा और सीमांत किसान अब पूरी तरह कर्ज के जाल में फंसने की कगार पर खड़ा है।

खाली पड़े जलाशय और दम तोड़ते बोरवेल, उठ सकती है मुआवजे की मांग

जुलाई के इस महीने में भी क्षेत्र के नदी, नाले और पारंपरिक तालाब खाली पड़े हुए हैं। लगातार शुष्क मौसम के कारण भूमिगत जल स्तर काफी नीचे चला गया है। जिन किसानों के पास बोरवेल हैं, वे फसल बचाने के लिए उन्हें दिन-रात चला रहे हैं, लेकिन वाटर लेवल गिरने के कारण बोरवेलों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है और पानी की धार बेहद पतली हो चुकी है। व्याकुल किसानों का कहना है कि यदि आगामी एक हफ्ते के भीतर पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो वे एकजुट होकर शासन, प्रशासन और कृषि विभाग से जमीनी हकीकत का सर्वे कराने, क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने तथा उचित मुआवजे की मांग करेंगे। फिलहाल किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए भगवान भरोसे बैठे हैं।

अनुप वर्मा

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