-सुभाष मिश्र
हंसी को लेकर हमारे पुराणों में कहा गया है। इससे बड़ा विभाजन का कोई हथियार नहीं। महाभारत में द्रोपदी की हँसी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हंसी को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को कब हँसना चाहिए, कहां हंसना चाहिए इस बात की यदि उसे जानकारी और समझ नहीं है तो उस व्यक्ति की समझ, शिक्षा और संस्कार और न जाने किन-किन चीजों पर लोग उंगली उठाने लग जाते हैं। यह लोगों की जल्दबाजी जरूर हो सकती है लेकिन यह उस व्यक्ति की भी गलती होती है जो लोगों को ऐसा अवसर देती है क्योंकि भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती है। भीड़ प्रतिक्रिया देने में बहुत जल्दबाजी करती है लेकिन संबंधित व्यक्ति को अपनी प्रतिक्रिया पर काबू रखना जरूरी है।
यह बात इसलिए आज जरूरी लगी कि तमिलनाडु के कोयंबटूर में 10 साल की बच्ची से दुष्कर्म वह हत्या के जघन्य केस में पुलिस अधिकारियों और मंत्री की मुस्कान पर विवाद हो गया है और प्रेस कांफ्रेंस के समय आईजी रम्या भारती का जोर से ठहाका लगाना और हँसना इस विवाद का कारण है। उनकी यह हंसी पूरे देश भर में वायरल हो गई है और निंदा का कारण बनी है। और उस समय उद्योग मंत्री एस कीर्तना भी रेप और हत्याकांड पर जवाब देते समय मुस्कुरा रही थीं। यह राष्ट्रीय शर्म की बात है। सबसे अचरज की बात यह है कि एक मासूम बच्ची के रेप और हत्याकांड पर जवाब देने आई बड़ी पुलिस अधिकारी और मंत्री जो एक स्त्री भी हैं, उनकी यह हरकत गैरजिम्मेदाराना, शर्मनाक और लगभग गैर मामूली है। इसलिए कि इतने बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों से गंभीरता और संवेदना की अपेक्षा की जाती है। लोग इसे पुलिस के संवेदनहीनता और क्रूरता से जोड़ रहे हैं जो कि पुलिस के लिए स्वाभाविक है लेकिन इसी जगह से बहुत सारे प्रश्न उठ रहे हैं। एक पुलिस अधिकारी जो आईजी रैंक की है, वह निश्चित रूप से बहुत पढ़ी-लिखी होगी और उसे अनेक प्रशिक्षण से होकर गुजरना पड़ा होगा तो क्या इस पूरी अवधि में पढ़ाई लिखाई से लेकर प्रशिक्षण अवधि तक उसे संवेदना का पाठ नहीं पढ़ाया गया? क्या सामान्य शिष्टाचार नहीं सिखाया गया कि ऐसे अवसरों पर कैसा व्यवहार एक अधिकारी को रखना चाहिए? यह बात इसलिए जरूरी लग रही है कि अभी कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महोदय ने युवा पीढ़ी के बारे में काकरोच जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था।
हंसना सेहत के लिए फायदेमंद है। यही वजह है कि लोग सुबह शाम बाग बगीचों में लाफिंग क्लब के जरिए हंसी के ठहाके लगाते हैं। बहुत सारे लोग बात बेबाक हंसते हैं। बहुत सारे लोग हंसने के लिए हास्य कवि सम्मेलन और हास्य फिल्म भी देखते हैं। बहुत सारे लोग मधुर यादों के साथ अपनी हंसी बनाए रखते हैं, वैसे अकेले जोर जोर से हंसना पागल की श्रेणी में भी आता है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के शब्दें में कहूं तो –
किसी गांव की खेत की सकरी पगडंडी पर टाइट पेंट, हाई हील की सैंडिल पहनकर, गॉगल लगाकर, बैग लटकाकर चलने वाली लड़की अगर लडख़ड़ाकर गिरती है तो उस पर हंसने वाले विसंगति पर हंंसते हैं यदि कोई महिला जीर्ण-शीर्ण है और वह गांव की जंगल से लकड़ी का गट्ठा लेकर आ रही हो और वह गिरती है तो उस पर हंसना क्रूरता है। आपके पास यह दृष्टि होनी चाहिए कि आप विसंगति पर हंस रहे हैं या आप किसी की मजबूरी का मजाक उड़ा रहे हैं। दरअसल, तमिलनाडु की घटना में हंसना क्रूरता है और यह क्रूरता पुलिस के वरिष्ठ महिला अधिकारी और मंत्री के द्वारा की गई है जो निंदनीय है। यही वजह है कि तमिलनाडु के सीएम जोसेफ विजय द्वारा तीन पुलिस अधिकारियों को, जो कि नाबालिग बच्चे के साथ हुई रेप और हत्या मामले में पत्रकारवार्ता के दौरान निर्लज हंसी हंस रहे थे, निलंबित करना एकदम सही कदम है।
यह सारी बातें, सारी असावधानी और यदि कहें तो एक किस्म की कथित दम्भ से भरी बातें पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा सामने आई है और वह भी देश के सबसे ज्यादा गंभीर माने जाने वाले और जिम्मेदार तबके से आई है क्यों ?
लोगों के बीच कई तरह की बातें हैं। लोग इन्हें उन अधिकारियों के संस्कार और शिक्षा से जोड़कर देखते हैं जो कि गलत है। संस्कार के लिए परिवार को दोष देना गलत है। कौन परिवार चाहेगा कि उसका बच्चा अगंभीर, असंवेदनशील, घमंडी और गलत बोल बोलने वाला हो! इस घटना को आईजी के पद के घमंड से जोड़कर भी नहीं देखा जा सकता है। ऐसे पद पर अनेक लोग रहे हैं लेकिन ऐसी अगंभीर और कथित अस्वाभाविक हरकत किसी ने नहीं की है। दरअसल इतने बड़े पदों पर रहने वाले लोगों का प्रशिक्षण बहुत गंभीर और जिम्मेदारी से होना चाहिए और वह कभी होता भी रहा है लेकिन अब इन पदों पर जाने वाले लोग उस प्रशिक्षण को गंभीरता से नहीं लेते हैं। जहां तक बात प्रशिक्षण की बात है तो मसूरी का लालबहादुर प्रशिक्षण अकादमी हो या हैदराबाद की पुलिस अकादमी या राज्यों की प्रशासन अकादमी सभी में संवेदनशीलता के साथ व्यक्तिगत आचरण का पाठ भी पढ़ाया जाता है और यह भी बताया जाता है कि एक अधिकारी की बॉडी लैंग्वेज कैसी होनी चाहिए और एक अधिकारी को किस तरह का आचरण करना चाहिए। किन्तु प्रशिक्षण के दौरान दिया गया सारा ज्ञान पद पर काबिज होते ही कहां चला जाता है पता ही नहीं चलता। कई बार यह भी देखने में आया है कि प्रशिक्षण बहुत फौरी तौर से औपचारिकता के लिए दिया जाता है। बहुत बार भी यह भी देखा गया है कि प्रशिक्षण देने वाले भी इतने गंभीर नहीं होते। जो अधिकारियों को सही बाते बता सके। गलती दोनों तरफ से हो रही है। प्रशिक्षण में संवेदना, नैतिकता और जिम्मेदारी जैसी बातों पर गंभीरता से प्रशिक्षण कथित रूप से लगभग नदारद होता जा रहा है। प्रशिक्षण लेने वाला और प्रशिक्षण देने वाला दोनों के लिए है यह एक औपचारिकता रह गई है। पहले कभी कोई आईएएस या आईपीएस अपवाद छोड़कर किसी तरह के विवाद में नहीं सामने आता था। अब ऐसी संख्या इतनी बढ़ गई है कि गिनना कठिन हो गया है । ऐसे अधिकारियों के सामने अब कोई आदर्श भी नहीं रह गए हैं। राजनीति की स्थिति और खराब हो गई है जिससे उन्हें डर लगे या उससे प्रेरणा ग्रहण करें।
कोयंबटूर की आईजी की हँसी की यह घटना एक मासूम के बलात्कार और हत्या का बहुत बड़ा अपमान है बल्कि यदि थोड़ा भावुक होकर कहें तो एक तरह से उस मासूम का दोबारा बलात्कार है और वह भी एक स्त्री की हँसी के द्वारा!