-सुभाष मिश्र
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के औद्योगिक शहर गुडग़ांव, मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, भिवाड़ी और पानीपत इन दिनों एक ऐसे आंदोलन के साक्षी बन रहे हैं, जिसे केवल ‘कानून-व्यवस्थाÓ या ‘साजिशÓ के चश्मे से देखना न तो पर्याप्त है, न ही न्यायपूर्ण। सड़कों पर उतरे लाखों मज़दूरों की आवाज़ दरअसल उस लंबे समय से जमा होते आक्रोश की अभिव्यक्ति है, जिसे लगातार अनदेखा किया गया।
मामला सीधा है, लेकिन समाधान जटिल बना दिया गया है। एक ओर देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर बताया जा रहा है, दूसरी ओर उन्हीं कारखानों में काम करने वाले मज़दूर 10 से 13 घंटे की मेहनत के बदले 10-12 हजार रुपये मासिक पर जीवन काटने को मजबूर हैं। यह विडंबना केवल आर्थिक नहीं, नैतिक भी है। महंगाई, खासकर हाल के वैश्विक तनावों के कारण बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। ऐसे में जब मजदूर 20 हजार रुपये न्यूनतम वेतन की मांग करते हैं, तो यह कोई असाधारण या अव्यावहारिक मांग नहीं लगती।
सरकारों के अपने तर्क हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने 21 प्रतिशत अंतरिम वृद्धि की घोषणा की, जिससे अकुशल मजदूर का वेतन लगभग 13,690 रुपये तक पहुंचता है। हरियाणा और दिल्ली में भी न्यूनतम मजदूरी की दरें अधिसूचित हैं। दिल्ली में यह करीब 19,846 रुपये (अकुशल) तक है, जबकि हरियाणा में 15,220 रुपये के आसपास। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये दरें मौजूदा महंगाई, शहरी जीवन-यापन की लागत और श्रम की गरिमा के अनुरूप हैं? यदि मजदूरों को अपने परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त आय नहीं मिलती, तो कागज़ी आंकड़े कितने भी संतुलित क्यों न दिखें, ज़मीनी सच्चाई उन्हें झुठला देती है।
आंदोलन के स्वरूप को लेकर भी दो स्पष्ट धाराएँ दिखाई देती हैं। एक पक्ष इसे स्वत: स्फूर्त और जायज़ अधिकारों की लड़ाई मानता है, जबकि दूसरा इसे संगठित, प्रायोजित और कुछ हद तक अराजक बताता है। प्रशासन का तर्क है कि व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से मजदूरों को भड़काया गया, जिससे हिंसक घटनाएं हुईं। वहीं, मजदूर संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि जब तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे थे, तब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया; जैसे ही आंदोलन उग्र हुआ, उसे ‘सिंडिकेट और ‘षड्यंत्र का नाम दे दिया गया।
सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं स्थित है। यह मानना कठिन है कि इतने व्यापक स्तर पर असंतोष केवल बाहरी उकसावे से पैदा हो सकता है। साथ ही, यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी आंदोलन की आड़ में हिंसा, तोडफ़ोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन उसकी सीमाएं भी हैं।
हालांकि, जिस बात ने इस पूरे घटनाक्रम को अधिक चिंताजनक बनाया है, वह है दमन की तीव्रता और उसका स्वरूप। मानेसर और नोएडा में हुई गिरफ्तारियां, गंभीर धाराओं का लगाया जाना, पत्रकारों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक पर कार्रवाई, ये सब संकेत देते हैं कि राज्य इस आंदोलन को केवल श्रमिक असंतोष नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की चुनौती के रूप में देख रहा है। यह दृष्टिकोण अल्पकालिक नियंत्रण तो स्थापित कर सकता है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान नहीं दे सकता।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस आंदोलन में महिला मजदूरों की सक्रिय भागीदारी रही है। वे न केवल आर्थिक शोषण, बल्कि सामाजिक और कार्यस्थल पर होने वाली अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करती हैं। ऐसे में उनका सड़कों पर उतरना इस बात का संकेत है कि समस्या केवल वेतन तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक असुरक्षा और असमानता से जुड़ी हुई है।
मूल प्रश्न यह है कि क्या भारत की विकास यात्रा में श्रमिकों के लिए सम्मानजनक स्थान सुनिश्चित किया जा रहा है? चार नए श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को लेकर भी व्यापक बहस है। समर्थकों का कहना है कि इससे उद्योगों को लचीलापन मिलेगा और निवेश बढ़ेगा, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे श्रमिकों की सुरक्षा कमजोर होगी और ठेका प्रथा को बढ़ावा मिलेगा। इस बहस को भी ईमानदारी से समझने की आवश्यकता है।
आज जब विधायकों और सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते महंगाई के अनुपात में बढ़ते हैं, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि वही संवेदनशीलता असंगठित और औद्योगिक मजदूरों के लिए क्यों नहीं दिखाई देती। बाजार में महंगाई सबके लिए समान है, लेकिन आय में यह असमानता क्यों?
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी कमी संवाद की दिखाई देती है। यदि सरकार, उद्योग और मजदूर संगठनों के बीच समय रहते गंभीर और पारदर्शी बातचीत होती, तो शायद स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। अब भी देर नहीं हुई है। समाधान टकराव में नहीं, बल्कि विश्वास बहाली में निहित है।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए मजदूरों की जायज़ मांगों को स्वीकार करते हुए, कानून-व्यवस्था को बनाए रखा जाए; उद्योगों की व्यवहारिक कठिनाइयों को समझते हुए, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। जांच हो, लेकिन निष्पक्ष हो, कार्रवाई हो, लेकिन न्यायसंगत हो।
अंतत: यह आंदोलन केवल वेतन वृद्धि का प्रश्न नहीं है। यह उस सामाजिक अनुबंध की परीक्षा है, जिस पर आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था खड़ी है। यदि इस अनुबंध में श्रमिक खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस करेंगे, तो विकास का कोई भी मॉडल टिकाऊ नहीं रह सकता। अब यह सरकार, उद्योग और समाज—तीनों पर निर्भर है कि वे इस चेतावनी को समझें और इसे अवसर में बदलें, या फिर इसे एक और ‘कानून-व्यवस्था की समस्याÓ मानकर टाल दें।
एनसीआर का मज़दूर आंदोलन: हक़ की पुकार, सियासत का शोर और व्यवस्था की परीक्षा

17
Apr