स्त्री के प्रति भारतीय समाज का दोहरा नजरिया

-सुभाष मिश्र

भारतीय समाज को प्राय: आस्था और अध्यात्म का समाज कहा जाता है। यहाँ धर्म केवल व्यक्तिगत विश्वास का विषय नहीं है बल्कि जीवन की सामाजिक संरचना का भी एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। गाँवों से लेकर महानगरों तक, मंदिरों की घंटियों, भजन की ध्वनियों और धार्मिक उत्सवों की रंगीनियों में भारतीय जीवन की सांस्कृतिक धड़कन सुनी जा सकती है। वर्तमान समय में तो मानो आस्था का एक विशाल उफान दिखाई देता है। देश के अनेक भागों में लगातार नए मंदिर बन रहे हैं, धार्मिक यात्राओं की संख्या बढ़ रही है और देवी देवताओं के प्रति भक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक रूप में सामने आ रहा है।
इसी समय मध्य भारत और उत्तर भारत में गणगौर जैसे पर्व अत्यंत उत्साह के साथ मनाए जा रहे हैं। यह त्योहार स्त्री की सौभाग्य कामना और देवी माँ की आराधना से जुड़ा हुआ है। इन दिनों गाँवों और शहरों में रात भर जागरण होते हैं, देवी के भजन गाए जाते हैं, स्त्रियाँ और युवतियाँ नृत्य करते हुए गीतों में अपनी आस्था व्यक्त करती हैं। अनेक स्थानों पर पुरुष देवी के रथ को अपने सिर पर रखकर जुलूस निकालते हैं, भक्ति गीत गाते हैं और देवी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। इस पूरे दृश्य में भारतीय धार्मिक संस्कृति की भावुकता, समर्पण और सामूहिकता एक साथ दिखाई देती है।
किन्तु ठीक इसी समय एक दूसरा दृश्य भी भारतीय समाज में उपस्थित है जो इस धार्मिक उल्लास के साथ गहरे विरोधाभास की तरह खड़ा दिखाई देता है। देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार स्त्रियों के साथ हिंसा, उत्पीडऩ और बलात्कार की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। निर्भया कांड जैसी त्रासद घटनाएँ केवल एक अपवाद नहीं रहीं बल्कि वे उस सामाजिक मानसिकता का संकेत बन चुकी हैं , जिसमें स्त्री की गरिमा बार बार कुचली जाती है। घरेलू हिंसा, दहेज के लिए बहुओं को जलाने की घटनाएँ, विवाह विच्छेद की बढ़ती संख्या और स्त्रियों के साथ सार्वजनिक स्थानों पर होने वाला अपमान इस विरोधाभास को और अधिक स्पष्ट करते हैं।
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि भारतीय समाज में धार्मिक आस्था इतनी प्रबल है, यदि देवी की पूजा इतनी व्यापक है, यदि स्त्री को देवी के रूप में पूजने की परंपरा इतनी पुरानी और प्रतिष्ठित है, तो फिर वास्तविक जीवन में स्त्रियों के साथ इतना अन्याय और अपमान क्यों हो रहा है? यह प्रश्न केवल नैतिक या भावनात्मक नहीं है बल्कि यह भारतीय समाज की गहरी संरचनात्मक समस्या की ओर संकेत करता है। दरअसल इस विरोधाभास की जड़ भारतीय पुरुष की मानसिक संरचना में छिपी हुई है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में स्त्री को देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने की प्रवृत्ति बहुत प्राचीन है। दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों के रूप में स्त्री शक्ति की आराधना की जाती रही है। शास्त्रों और पुराणों में स्त्री को शक्ति का स्रोत कहा गया है। यह आदर्शात्मक छवि स्त्री को अत्यंत ऊँचे और पवित्र स्थान पर स्थापित करती है। परंतु समस्या यह है कि यह आदर्शात्मक स्त्री और वास्तविक स्त्री के बीच एक गहरी दूरी बनी हुई है। धार्मिक कल्पना में स्थापित देवी एक अलौकिक सत्ता है जो मनुष्य से ऊपर है, जबकि सामाजिक जीवन में उपस्थित स्त्री एक साधारण मनुष्य है, जिसके अधिकार, इच्छाएँ और स्वतंत्रता हैं। भारतीय पुरुष के मन में अक्सर यह दम्भ मौजूद रहता है कि देवी की पूजा की जा सकती है परंतु घर की स्त्री को बराबरी का अधिकार देना आवश्यक नहीं समझा जाता। परिणाम यह होता है कि देवी के प्रति श्रद्धा और स्त्री के प्रति सम्मान दो अलग अलग क्षेत्रों में विभाजित हो जाते हैं। इस मानसिक विभाजन के कारण धार्मिक आस्था का सामाजिक नैतिकता से कोई सीधा संबंध नहीं बन पाता। व्यक्ति मंदिर में जाकर देवी की आराधना करता है, व्रत रखता है, भजन गाता है और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेता है, किन्तु वही व्यक्ति घर के भीतर अपनी पत्नी या बहू के साथ अपमानजनक व्यवहार करने में संकोच नहीं करता। धार्मिकता और नैतिकता के बीच यह दूरी भारतीय समाज की एक गंभीर समस्या है।
भारतीय पारिवारिक संरचना भी इस विरोधाभास को बनाए रखने में एक भूमिका निभाती है। पारंपरिक परिवार व्यवस्था में पुरुष को परिवार का स्वामी माना जाता रहा है और स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह आज्ञाकारी और समर्पित बनी रहे। विवाह संस्था के भीतर स्त्री की स्वतंत्रता अक्सर सीमित कर दी जाती है। उसके श्रम को स्वाभाविक कर्तव्य के रूप में देखा जाता है और उसके अधिकारों को गौण समझा जाता है। इस व्यवस्था में पुरुष का प्रभुत्व इतना सामान्य मान लिया गया है कि कई बार स्त्री के साथ होने वाला अन्याय भी सामाजिक दृष्टि से सामान्य व्यवहार प्रतीत होने लगता है।
आधुनिक समय में जब स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो रही हैं, तब यह पारंपरिक पुरुष मानसिकता और भी असहज हो जाती है। पुरुष का अहंकार और असुरक्षा कई बार हिंसक रूप ले लेती है। यही कारण है कि स्त्रियों के प्रति हिंसा की घटनाएँ केवल ग्रामीण समाज तक सीमित नहीं हैं बल्कि महानगरों में भी लगातार दिखाई देती हैं।
इस स्थिति को और जटिल बनाने में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति की भूमिका भी कम नहीं है। जिन लोगों के पास राजनीतिक पहुँच या आर्थिक संपन्नता होती है, वे कई बार यह मान बैठते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं। यह दंभ उन्हें स्त्रियों के प्रति हिंसक और अमानवीय व्यवहार करने के लिए भी प्रेरित करता है। दुर्भाग्य से अनेक मामलों में न्याय प्रक्रिया की धीमी गति , भ्रष्टाचार या राजनीतिक-सामाजिक दबाव के कारण अपराधियों को दंड नहीं मिल पाता। इससे अपराध करने वालों का साहस और बढ़ जाता है और समाज में एक गलत संदेश फैलता है कि शक्ति और प्रभाव के बल पर किसी भी अपराध से बचा जा सकता है।
यह स्थिति कानून व्यवस्था के प्रश्न के साथ ही समाज की नैतिक चेतना से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि धार्मिक आस्था सचमुच समाज की नैतिकता को मजबूत करती, तो संभवत: स्त्रियों के प्रति हिंसा की इतनी घटनाएँ सामने नहीं आतीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म स्वयं समस्या है, बल्कि समस्या उस मानसिकता में है जो धर्म को केवल अनुष्ठान और प्रदर्शन तक सीमित कर देती है। मंदिरों की संख्या बढऩे से भी सामाजिक न्याय स्वत: स्थापित नहीं हो जाता। इसके लिए आवश्यक है कि धार्मिक आस्था के साथ साथ सामाजिक चेतना और नैतिक जिम्मेदारी भी विकसित हो।
शिक्षा और दबावमुक्त कानून सही इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि बच्चों और युवाओं को प्रारंभ से ही स्त्री पुरुष समानता का मूल्य सिखाया जाए, यदि उन्हें यह समझाया जाए कि सम्मान और संवेदना किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला हैं, तो संभव है कि आने वाली पीढिय़ाँ इस विरोधाभास को कम कर सकें। मीडिया, साहित्य और सामाजिक संस्थाओं को भी इस विषय पर लगातार संवाद और विमर्श करना होगा।

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