रायपुर। राजधानी रायपुर के बीचों-बीच खड़ा स्काईवॉक अब केवल एक अधूरा निर्माण नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की सुस्त रफ्तार, राजनीतिक खींचतान और बढ़ती लागत का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। वर्ष 2016-17 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री राजेश मूणत के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ यह महत्वाकांक्षी निर्माण आज 8 साल बाद भी पूरा नहीं हो सका है।
जिस स्काईवॉक को जून 2018 तक जनता को समर्पित करने का लक्ष्य रखा गया था, वह वर्ष 2026 में भी अधूरा खड़ा है। शुरुआत में इसकी लागत 30 से 50 करोड़ रुपये के बीच बताई गई थी, लेकिन समय बीतने के साथ यह बढ़कर लगभग 114 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इसके बावजूद परियोजना का लगभग 60 प्रतिशत काम अब भी शेष है।
2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस सरकार ने परियोजना पर रोक लगा दी थी। वर्ष 2022 में कांग्रेस नेताओं ने कथित अनियमितताओं को लेकर भाजपा नेताओं के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो में शिकायत भी दर्ज कराई। इसके बाद यह परियोजना राजनीतिक बहस और फाइलों के बीच उलझकर रह गई।
दिसंबर 2023 में भाजपा सरकार की वापसी और विष्णुदेव साय के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्काईवॉक की फाइलें फिर खुलीं। फरवरी 2024 में इसकी समीक्षा शुरू हुई और 21 मई 2025 को निर्माण एजेंसी को नया वर्क ऑर्डर जारी किया गया। एजेंसी को मार्च 2026 तक काम पूरा करने की समय-सीमा दी गई थी।
हालांकि आठ माह से अधिक समय बीतने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। करीब 1470 मीटर लंबे स्काईवॉक में अभी 63 गर्डर और 25 स्लैब लगाए जाने हैं। 12 स्थानों पर लिफ्ट और एस्केलेटर लगने बाकी हैं। एसीपी शीट, एल्यूमिनियम फ्रेम, डिवाइडर रेलिंग, सीसीटीवी नेटवर्क, कंट्रोल रूम और एंट्री-एग्जिट प्वाइंट का कार्य भी अधूरा पड़ा हुआ है। अधिकांश स्थानों पर केवल बेसिक स्ट्रक्चर ही नजर आता है।
शास्त्री चौक पर प्रस्तावित रोटेटरी का निर्माण भी अब तक शुरू नहीं हो पाया है। बताया जा रहा है कि इसका निर्माण भिलाई स्थित यार्ड में कराया जा रहा है, जबकि रायपुर की जनता वर्षों से इसके पूरे होने का इंतजार कर रही है।
सुरक्षा पर भी बड़ा सवाल, जेल परिसर तक दिख रहा पूरा दृश्य
स्काईवॉक का एक और गंभीर पहलू सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। जेल रोड स्थित भीमराव अंबेडकर अस्पताल के सामने बने स्काईवॉक के एक छोर से केंद्रीय जेल परिसर का अंदरूनी हिस्सा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहां से जेल के भीतर की गतिविधियां, कैदियों की आवाजाही और परिसर के कई हिस्सों का सीधा दृश्य देखा जा सकता है।
जेल परिसर की आंतरिक गतिविधियों का सार्वजनिक स्थान से दिखाई देना गंभीर सुरक्षा चूक माना जाता है। इसके बावजूद अब तक इस हिस्से में दृश्य अवरोधक (विजुअल बैरियर) लगाने या डिजाइन में आवश्यक बदलाव करने की दिशा में कोई ठोस पहल नजर नहीं आई है। यह स्थिति भविष्य में सुरक्षा संबंधी जोखिमों को भी बढ़ा सकती है।
हैरानी की बात यह है कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना में लगातार हो रही देरी, बढ़ती लागत और अब सामने आ रही सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब लेने की कोशिश की जाती है तो कोई भी स्पष्ट रूप से सामने आने को तैयार नहीं दिखता। परियोजना की वर्तमान स्थिति, देरी के कारण, सुरक्षा संबंधी खामियों और नई समय-सीमा को लेकर अधिकारी खुलकर बोलने से बच रहे हैं।
ऐसे में जनता के मन में यह सवाल और गहरा हो रहा है कि आखिर जवाबदेही किसकी तय होगी? जब लागत दोगुने से भी अधिक बढ़ गई, समय-सीमा कई बार बदल गई और वर्षों बाद भी काम अधूरा है, तब इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या जनता के टैक्स से खर्च हो रहे करोड़ों रुपये का हिसाब कभी मिलेगा या यह स्काईवॉक केवल राजनीतिक वादों, प्रशासनिक उदासीनता और योजना संबंधी खामियों का स्मारक बनकर रह जाएगा?
राजधानी के हृदय स्थल में खड़ा यह अधूरा ढांचा आज भी एक सवाल पूछ रहा है—क्या विकास की परिभाषा केवल शिलान्यास, घोषणाएं और बढ़ती लागत है, या फिर जनता को कभी इसका पूरा लाभ भी मिलेगा?