शिव ही शुरुआत हैं और शिव ही अंत हैं. इस पूरी दुनिया में जो कुछ भी है, वो शिव का ही रूप है. लेकिन सबसे खास बात यह है कि खुद भगवान शिव ने भी कभी अपने आपको सृष्टि के नियमों से ऊपर नहीं रखा. यही वजह है कि महादेव को भी समय-समय पर श्रापों का सामना करना पड़ा था. हिंदू पुराणों में हर बड़ी घटना किसी न किसी वरदान या श्राप से जुड़ी हुई है. आइए जानते हैं कि महादेव को किन-किन श्रापों का सामना करना पड़ा था.

राजा दक्ष का श्राप, जब यज्ञ में शिव को स्थान मिलना बंद हो गया
राजा दक्ष ब्रह्मा जी के पुत्र थे. उन्हें सृष्टि को आगे बढ़ाने का काम मिला था. माता सती ने दक्ष की बेटी के रूप में जन्म लिया और उनका विवाह शिव जी से हुआ. लेकिन दक्ष को शिव जी पसंद नहीं थे. एक बार एक बड़े यज्ञ में जब दक्ष पहुंचे, तो सभी देवता उनके सम्मान में खड़े हो गए, लेकिन भगवान शिव बैठे रहे. इसे दक्ष ने अपना अपमान मान लिया. गुस्से में आकर दक्ष ने शिव जी को श्राप दे दिया कि अब से किसी भी यज्ञ में उन्हें देवताओं के बराबर स्थान नहीं मिलेगा. भोलेनाथ ने बिना किसी विरोध के इस श्राप को स्वीकार कर लिया था.
ऋषि कश्यप का श्राप, जिसकी वजह से काटना पड़ा था गणेश जी का सिर
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के दो भक्तों का सूर्यदेव से युद्ध हो गया था. अपने भक्तों को बचाने के लिए शिव जी ने सूर्यदेव पर त्रिशूल से वार कर दिया, जिससे सूर्यदेव बेहोश हो गए. यह देखकर सूर्यदेव के पिता ऋषि कश्यप बहुत दुखी हुए. उन्होंने गुस्से में शिव जी को श्राप दिया कि जैसे आज मेरे बेटे की यह हालत हुई है, वैसे ही एक दिन तुम्हें भी अपने बेटे का सिर काटना पड़ेगा. आगे चलकर यह श्राप सच साबित हुआ और शिव जी को गणेश जी का सिर काटना पड़ा था.
माता पार्वती का श्राप, जब जुए के खेल में नाराज हो गईं थीं देवी
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के बीच पासे का खेल यानी जुआ हुआ. इस खेल में शिव जी सब कुछ हार गए और गंगा किनारे चले गए. बाद में भगवान विष्णु ने पासे का रूप धारण किया और शिव जी को खेल में जिताने लगे. जब यह धोखा माता पार्वती को पता चला, तो वह बेहद क्रोधित हो गईं. उन्होंने गुस्से में आकर शिव जी को हमेशा गंगा को अपने सिर पर धारण करने का श्राप दे दिया. इसके साथ ही उन्होंने विष्णु जी को रावण के रूप में दुश्मन मिलने का और कार्तिकेय को हमेशा बाल रूप में रहने का श्राप भी दिया था.
क्या होता है श्राप का असली मतलब
पुराणों के अनुसार, श्राप सिर्फ एक सजा नहीं है बल्कि हमारे कर्मों का फल होता है. जब किसी को अपने कर्मों का कारण समझ नहीं आता, तो वह उसे श्राप मान लेता है. कई बार ये श्राप कुछ समय के लिए होते हैं, तो कभी कई जन्मों तक चलते हैं. लेकिन सच तो यह भी है कि भगवान शिव खुद हर तरह के कष्ट और श्राप को खत्म करने की ताकत रखते हैं.