बंगाल में दीदी युग का अंत, शुभेंदु सरकार के बड़े फैसले

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य को एक नई दिशा दी है। जनता ने इस बार केवल चेहरा नहीं बदला, बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल को ही बदल दिया है। इसके साथ ही पिछले पंद्रह सालों से चला आ रहा ममता बनर्जी का शासन खत्म हो गया है और राज्य में एक नई राजनीतिक व्यवस्था की शुरुआत हुई है।

शुभेंदु सरकार के ताबड़तोड़ फैसले

नौ मई को शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उन्होंने राज्य में भाजपा की पहली सरकार की कमान संभाली है। कुर्सी संभालते ही नई सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है। प्रशासन, कानून व्यवस्था और जनता से जुड़े मामलों में तेजी से फैसले लिए जा रहे हैं। सरकार ने शुरुआती दो हफ्तों में ही कई पुरानी नीतियां बदल दी हैं। इन बदलावों का साफ मकसद पिछली सरकार के फैसलों को पलटना और अपने चुनावी वादों को पूरा करना है।

बंगाल में बदला सत्ता का केंद्र

पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति सिर्फ ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द घूमती थी। सरकारी दफ्तरों से लेकर स्थानीय स्तर और त्योहारों तक उनका गहरा असर दिखता था। सत्ता बदलते ही यह समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। अब राज्य में भाजपा के नेतृत्व में नया पावर सेंटर बन गया है।

समान नागरिक संहिता पर बढ़ी सरकार

नई सरकार उन वादों पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रही है जो चुनाव के दौरान किए गए थे। सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। इस नियम का सीधा मतलब यह है कि शादी, तलाक और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में अब हर धर्म और समुदाय के लोगों के लिए एक जैसा कानून होगा।

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