मोबाइल और टीवी के ‘चंगुल’ में बचपन! गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे हो रहे स्क्रीन के आदी, इन 5 असरदार तरीकों से बचाएं

गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों के चेहरे खिल जाते हैं। न स्कूल जाने की जल्दी और न ही होमवर्क का तनाव। लेकिन इस आजादी का एक स्याह पहलू भी है—दिनभर मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियां चटकाना या टीवी के सामने घंटो बैठे रहना। अगर आपका बच्चा भी इस कतार में खड़ा है, तो यह खबर आपके लिए एक जरूरी अलार्म है। लगातार स्क्रीन से चिपके रहना न सिर्फ बच्चों की आंखों और मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि हाल ही में ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ की एक स्टडी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। स्टडी के मुताबिक, 6 घंटे से ज्यादा का स्क्रीन टाइम बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) का खतरा काफी हद तक बढ़ा देता है।

ऐसे में बच्चों से जबरन मोबाइल छीनने या गुस्सा करने के बजाय, उनके रूटीन को स्मार्टली बैलेंस करना जरूरी है। आइए जानते हैं वो 5 आसान और प्रैक्टिकल तरीके, जिससे आप खेल-खेल में बच्चों का स्क्रीन टाइम कम कर सकते हैं:

समय की लक्ष्मण रेखा तय करें: छुट्टियों के माहौल में बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर करना नामुमकिन है, इसलिए एक समय सीमा (Time Limit) तय कर दें। दिनभर में मोबाइल या टीवी देखने का एक फिक्स टाइम तय करें, जिससे बच्चे को भी पता हो कि उसे कितनी देर स्क्रीन मिलेगी।

आउटडोर एक्टिविटीज को बनाएं रूटीन: बच्चा जितना घर के अंदर बंद रहेगा, उसका ध्यान उतना ही गैजेट्स की तरफ जाएगा। शाम के वक्त जब धूप कम हो, तो बच्चों को पार्क लेकर जाएं। उन्हें साइकिलिंग, बैडमिंटन, क्रिकेट या दौड़-भाग वाले खेलों के लिए प्रेरित करें ताकि उनकी फिजिकल एक्टिविटी बनी रहे।

इनडोर क्रिएटिविटी से बढ़ाएं फोकस: दोपहर के वक्त जब बाहर तेज धूप हो, तब बच्चों को घर के अंदर ही व्यस्त रखें। उन्हें ड्राइंग, पेंटिंग, स्टोरी बुक्स पढ़ना, पेपर क्राफ्ट, म्यूजिक या दिमागी पहेलियां (Puzzles) सुलझाने जैसी एक्टिविटीज में लगाएं। इससे उनका स्क्रीन से ध्यान भी हटेगा और रचनात्मक विकास भी होगा।

पारिवारिक बातचीत और बोर्ड गेम्स: डिजिटल दुनिया से दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है अपनों का साथ। छुट्टियों में बच्चों के साथ कैरम, लूडो, या चेस जैसे बोर्ड गेम्स खेलें। उनके साथ बैठकर बातें करें, किस्से कहानियां सुनाएं। परिवार के साथ बिताया यह समय बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए टॉनिक का काम करता है।

खुद बनें रोल मॉडल (No Phone Zone): बच्चे वही सीखते हैं जो वो घर में देखते हैं। अगर माता-पिता खुद दिनभर फोन में स्क्रॉलिंग करते रहेंगे, तो बच्चों को टोकने का कोई असर नहीं होगा। इसलिए बच्चों के सामने खुद भी मोबाइल का इस्तेमाल कम से कम करें और घर में एक ‘नो फोन टाइम’ तय करें।

गर्मियों की इन छुट्टियों को सिर्फ स्क्रीन के सामने गंवाने के बजाय, इन आदतों को अपनाकर आप अपने बच्चों के बचपन को सेहतमंद और एक्टिव बना सकते हैं।

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