एसआईआर: मतदाता सूची का शुद्धिकरण या लोकतंत्र की परीक्षा?

-सुभाष मिश्र
उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की ड्राफ्ट मतदाता सूची सामने आते ही लोकतंत्र के सबसे बुनियादी आधार—मतदाता—पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। 15.44 करोड़ मतदाताओं वाले प्रदेश में 2.89 करोड़ नामों का कटना, यानी लगभग 18 प्रतिशत या हर पांचवां वोटर सूची से बाहर होना, किसी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का आंकड़ा नहीं है। चुनाव आयोग का तर्क है कि इनमें 46.23 लाख मृत, 2.17 करोड़ स्थानांतरित और 25.47 लाख डुप्लीकेट मतदाता हैं। कागज पर यह स्पष्टीकरण तार्किक लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र केवल आंकड़ों से नहीं चलता, वह भरोसे और भागीदारी से चलता है। जब इतने बड़े पैमाने पर नाम कटते हैं तो सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि कौन बाहर हुआ, बल्कि यह भी कि अब तक वे सभी भीतर कैसे बने रहे और उन सूचियों के आधार पर हुए चुनावों की विश्वसनीयता को किस तरह देखा जाए।
उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाम कटने का तथ्य इस बहस को और गंभीर बना देता है। लखनऊ जैसे शहरी क्षेत्र में 12 लाख और ललितपुर जैसे जिले में 95 हजार नाम कटना यह बताता है कि यह समस्या केवल सीमावर्ती या पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं है। विडंबना यह है कि जिस राज्य में पिछले एक दशक से अधिक समय से एक ही राजनीतिक दल की सरकार है, वहीं सबसे बड़ी छंटनी हो रही है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या अब तक के चुनाव फर्जी या अवैध मतदाताओं के सहारे लड़े गए, या फिर यह मान लिया जाए कि प्रशासनिक तंत्र वर्षों तक मतदाता सूची को अद्यतन करने में विफल रहा। यह सवाल किसी एक दल पर नहीं, बल्कि पूरे चुनावी ढांचे की साख पर जाता है।
चुनाव आयोग की ओर से यह जरूर कहा जा रहा है कि किसी के अधिकार छीने नहीं जा रहे हैं। ड्राफ्ट सूची में नाम न होने पर 6 फरवरी तक दावे और आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं, फॉर्म 6 और 7 उपलब्ध हैं, कोई शुल्क नहीं है, 1950 हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है और शहरी क्षेत्रों में विशेष कैंप लगाने की योजना भी है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रक्रिया जितनी कागज पर सरल दिखती है, उतनी व्यवहार में नहीं है। बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता हैं जो पहले भी वोट डाल चुके हैं, जिनका केवल पता बदला है, जो किराए के मकान में रहते हैं या जिनके दस्तावेज पुराने पते से जुड़े हैं। ऐसे मतदाताओं के लिए रिकॉर्ड जुटाना और अधिकारियों के चक्कर लगाना आसान नहीं है। जब एक वैध मतदाता खुद को यह महसूस करने लगता है कि वह अचानक सिस्टम के बाहर हो गया है, तो लोकतांत्रिक भरोसे में दरार पड़ना स्वाभाविक है।
यह पूरी कवायद केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। यूपी से पहले 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की ड्राफ्ट सूची आ चुकी है, जहां कुल 3.69 करोड़ वोटरों के नाम हटाए गए हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, केरल, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चिम बंगाल—लगभग पूरा देश इस प्रक्रिया से गुजर रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि एसआईआर एक राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक पहल है, न कि किसी एक राज्य को निशाना बनाने की कार्रवाई। लेकिन लोकतंत्र में समस्या केवल नीति की नहीं होती, उसकी राजनीतिक व्याख्या और परसेप्शन भी उतनी ही अहम होती है।
यही कारण है कि बिहार और पश्चिम बंगाल में एसआईआर की राजनीति बिल्कुल अलग दिखाई देती है। बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा उठा जरूर, रैलियां भी निकलीं, वोट चोरी के आरोप भी लगे, लेकिन वह चुनावी विमर्श का केंद्रीय मुद्दा नहीं बन सका। इसके उलट पश्चिम बंगाल में नवंबर से शुरू हुई यह प्रक्रिया ममता बनर्जी सरकार, केंद्र और चुनाव आयोग के बीच टकराव का सबसे बड़ा बिंदु बन गई है और आने वाले विधानसभा चुनाव में इसके एक प्रमुख मुद्दा बनने की पूरी संभावना है। तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरू से ही इसे लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। उनका आरोप है कि बिहार और बंगाल के लिए अलग-अलग मापदंड तय किए गए हैं—बिहार में पारिवारिक रजिस्टर को वैध दस्तावेज माना गया, जबकि बंगाल में उसे स्वीकार नहीं किया जा रहा। यहां से बहस चुनाव आयोग की निष्पक्षता से आगे बढ़कर उसकी समानता और पारदर्शिता पर आ टिकती है।
बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच यह मुद्दा राजनीतिक हथियार बन चुका है। बीजेपी का दावा है कि फर्जी वोटरों के नाम कटने और अल्पसंख्यक वोट बैंक के बिखरने के डर से तृणमूल बेचैन है। वहीं तृणमूल का आरोप है कि सुनवाई और दस्तावेज़ सत्यापन के नाम पर वैध वोटरों को सूची से बाहर करने की साजिश रची जा रही है। दिलचस्प तथ्य यह है कि बंगाल में ड्राफ्ट सूची में करीब 58.20 लाख नाम कटे हैं, जबकि बीजेपी पहले एक करोड़ अवैध वोटरों के नाम हटने की बात कर रही थी। अब तक बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोटर होने के कोई ठोस प्रमाण भी सामने नहीं आए हैं। इससे यह संदेह और गहराता है कि कहीं एसआईआर एक प्रशासनिक सुधार से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा तो नहीं बनता जा रहा।
इस पूरे विमर्श में सबसे अहम बात यह है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में गलत नहीं है। मृत मतदाताओं के नाम हटना चाहिए, डुप्लीकेट प्रविष्टियां नहीं रहनी चाहिए और स्थानांतरित लोगों को अपनी नई जगह पर पंजीकरण कराना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में सवाल केवल ‘क्या’ का नहीं, ‘कैसे’ का होता है। अगर हर दस साल में ऐसी कवायद होती है तो वह स्वाभाविक है, लेकिन अगर करोड़ों नाम एक साथ कटते हैं तो उसके लिए उतनी ही सरल, मानवीय और भरोसेमंद प्रक्रिया भी होनी चाहिए। अन्यथा यह शुद्धिकरण की बजाय बहिष्करण की प्रक्रिया बन सकती है।
अंततः यह मुद्दा किसी एक राज्य, किसी एक दल या किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं है। यह उस बिंदु पर आकर ठहरता है जहां लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी—मतदाता—खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। अगर मतदाता सूची पर भरोसा डगमगाया, अगर वैध नागरिक को यह डर सताने लगा कि उसका नाम किसी तकनीकी या प्रक्रियागत जटिलता की भेंट चढ़ सकता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी। एसआईआर जरूरी है, सुधार भी जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक भरोसे को तोड़े नहीं, बल्कि उसे मजबूत करे।

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