अधिकारी और नेताओं के द्वंद में जनमुद्दे गुम

-सुभाष मिश्र

लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू और सुगम तरीके से चलाने के लिए विभागीय अधिकारी और जनप्रतिनिधि एक सेतु की भांति कार्य करते हैं। ये दोनों जनता के हितों के प्रति बराबर जिम्मेदार होते हैं। जनप्रतिनिधियों की नैतिक जिम्मेदारी होती है कि जनता की समस्याओं को लेकर विभागीय अधिकारियों का ध्यानकर्षण करना और कुछ सुझाव के साथ जल्द निराकरण करने की सिफारिश करना। जिसे धरातल स्तर पर मूर्त रूप देना का नैतिक दायित्व ब्यूरोक्रेट्स का है। लेकिन इन दिनों छत्तीसगढ़ में ब्यूरोक्रेट्स और जनप्रतिधियों का आपसी संवाद ने बड़ी विसंगति और सवाल खड़े कर दिए हैं।
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के जनपद पंचायत सीईओ रूपेश कुमार पांडेय को सस्पेंड कर दिया गया है। कुछ दिन पहले उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें वे ‘सुशासन तिहार के दौरान बीजेपी ग्रामीण महामंत्री पुराण देशमुख से बहस करते नजर आए थे। यह पूरा विवाद विधायक ललित चंद्राकर की मौजूदगी में हुआ था।
‘सुशासन तिहारÓ के तहत आयोजित जन समस्या निवारण शिविर में सामुदायिक भवन के लिए राशि जारी करने को लेकर बीजेपी नेता ने आपत्ति जताई थी। इसी मुद्दे पर जनपद सीईओ रूपेश कुमार पांडेय और पुराण देशमुख के बीच विवाद शुरू हो गया। देखते ही देखते दोनों के बीच तीखी नोकझोंक होने लगी।
वीडियो में रूपेश कुमार पांडेय को यह कहते हुए सुना गया था कि, ‘जो करना है कर लो। वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते ही वायरल हो गया। इसके बाद बीजेपी नेताओं और स्थानीय लोगों ने अधिकारी के व्यवहार पर सवाल उठाए थे। मामले के तूल पकडऩे के बाद राज्य सरकार ने रूपेश कुमार पांडेय को सस्पेंड कर दिया है।
ऐसा ही एक मामला सरगुजा जिले के मैनपाट स्थित राजापुर उप तहसील का है। जिसमें सीतापुर से भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो पर नायब तहसीलदार तुषार मानिक के साथ मारपीट करने का आरोप लगा है। घटना के बाद विधायक और उनकी बहन ने थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। वहीं नायब तहसीलदार और अन्य राजस्व अधिकारी ने भी रिपोर्ट दर्ज कराई हैं।
इधर, छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन ने प्रदेश में जनप्रतिनिधियों एवं कुछ नेताओं द्वारा शासकीय सेवकों के साथ किए जा रहे अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज एवं मारपीट की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसकी कड़ी निंदा की है।
फेडरेशन ने कहा है कि शासकीय सेवक पूरी निष्ठा, समर्पण एवं जिम्मेदारी के साथ शासन और जनता के बीच सेतु का कार्य करते हैं। उनके साथ इस प्रकार का अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार न केवल कर्मचारी-अधिकारी वर्ग के सम्मान पर आघात है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था एवं लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी कमजोर करने वाला कृत्य है।
फेडरेशन का मानना है कि शासकीय सेवकों के विरुद्ध हिंसा, धमकी एवं अभद्रता की घटनाएं किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। ऐसी घटनाओं से कर्मचारियों एवं अधिकारियों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा सुशासन की अवधारणा भी प्रभावित होती है।
छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन ने शासन एवं प्रशासन से मांग की है कि दोषियों के विरुद्ध तत्काल एवं सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए तथा शासकीय सेवकों की सुरक्षा एवं सम्मान की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। फेडरेशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है और दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं की जाती है, तो कर्मचारी-अधिकारी वर्ग अपने सम्मान एवं सुरक्षा की रक्षा हेतु प्रदेशव्यापी आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा, जिसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी। लेकिन सवाल उठता है कि वायरल वीडियो में जो शब्द एक निलंबित सीईओ कहते दिख रहे हैं, क्या वह उचित है। जब एक सत्ताधारी पार्टी के नेता द्वारा जनसमस्या पर सवाल करने पर बेतुके तर्क दे सकते हैं तो आम जन का क्या होगा। अभी पिछले दिनों जंजगीर चांपा जिले के जल संसाधन विभाग के एक एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर और सरकारी चालक के अमर्यादित भाषा का वीडियो वायरल हुआ था। जिसे लेकर अधिकारी और चालक संघ आमने सामने आ गए थे, जिसका मामला आपसी सुलह समझौते से किसी तरह शांत हुआ। ऐसे में भाजपा विधायक का नायब तहसीलदार के प्रति व्यवहार भी जनप्रतिनिधियों को सवालों के घेरे में खड़ा करता है। कहने का आशय है कि जनमुद्दों के निराकरण में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को आपसी समन्वय बनाने की जरूरत है। ताकि छत्तीसगढ़ की जनता में एक सकारात्मक संदेश जाए कि हमारे प्रदेश के अधिकारी और जनप्रतिनिधि जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशील हैं। इस जन विश्वास को बनाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *