हर साल लाखों श्रद्धालु उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होने आते हैं। भक्तों में एक आम धारणा बनी हुई है कि हर साल भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति को बदलकर नई मूर्ति स्थापित की जाती है। लेकिन मंदिर की प्राचीन परंपराओं और हकीकत को जानने के बाद आपकी सोच बदल सकती है। यह मान्यता पूरी तरह सच नहीं है।
नवकलेवर का दुर्लभ संयोग
पुरी मंदिर के नियमों के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियों को हर साल नहीं बदला जाता है। इन्हें सिर्फ एक विशेष और पवित्र अनुष्ठान के दौरान ही बदला जाता है, जिसे नवकलेवर कहा जाता है। यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यह प्रक्रिया हिंदू चंद्र पंचांग के अनुसार एक दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग बनने पर ही होती है। इसलिए इसे सबसे रहस्यमय और आध्यात्मिक रूप से खास अनुष्ठानों में गिना जाता है।
कैसे चुनी जाती है पवित्र लकड़ी
नई मूर्ति बनाने के लिए पेड़ों का चुनाव एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गोपनीय प्रक्रिया है। मूर्तियों के लिए नीम के विशेष पेड़ों को चुना जाता है, जिन्हें दारू ब्रह्मा कहा जाता है। इन पेड़ों की तलाश मंदिर के पुजारी और पारंपरिक बनजगा दल द्वारा की जाती है। यह चयन यूं ही नहीं होता, बल्कि चुने गए नीम के पेड़ों में प्राचीन ग्रंथों में बताए गए शास्त्रसूचक चिन्हों का होना अनिवार्य है।
जब तक ऐसा विशेष संयोग नहीं बनता, तब तक पुरानी मूर्तियों की ही पूजा की जाती है। इसलिए रथ यात्रा हर साल होती है, लेकिन मूर्तियों का कलेवर बदलना बहुत ही कम बार होता है। इस पवित्र प्रक्रिया की गहराई और भक्तों की अटूट श्रद्धा ही पुरी मंदिर को दुनिया भर में अनोखा बनाती है।