-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल ने जेल से बाहर आने के बाद जो आरोप लगाए हैं, उन्होंने एक बार फिर देश की जेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शराब घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 170 दिन जेल में रहने के बाद उन्होंने दावा किया कि रायपुर सेंट्रल जेल में उन्हें 10×7 के आइसोलेटेड सेल में रखा गया, पीने के पानी में कीड़े मिलते थे, एक ही कमरे में भोजन और शौचालय की व्यवस्था थी, इलाज की कोई समुचित सुविधा नहीं थी और कई बार कैदी ही इंजेक्शन लगाते थे। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ कांग्रेस नेताओं के साथ विशेष रूप से बुरा व्यवहार किया गया।
इन आरोपों पर अभी तक जेल प्रशासन की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए इन दावों की सत्यता का निर्धारण जांच और तथ्यों के आधार पर ही हो सकेगा। परंतु प्रश्न केवल एक व्यक्ति या एक राजनीतिक दल का नहीं है। यह बहस उस मूल प्रश्न से जुड़ती है क्या भारत की जेलें वास्तव में ‘सुधार गृह हैं या अब भी ‘यातनागृह की मानसिकता से संचालित हो रही हैं?
भारतीय संविधान और न्यायिक व्यवस्था जेल को सजा का स्थान मानती है, प्रताडऩा का नहीं। न्यायालय सजा सुनाता है—कारावास। परंतु कारावास का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति को अमानवीय परिस्थितियों में रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि कैदी भी मौलिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित नहीं होता। साफ पानी, चिकित्सा सुविधा, मानवीय व्यवहार, ये बुनियादी अधिकार हैं।
जेलों में दो प्रकार के कैदी होते हैं, दोषसिद्ध और विचाराधीन। देश की अधिकांश जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या अधिक है, जिनका अपराध न्यायालय में अभी सिद्ध नहीं हुआ है। ऐसे में यदि जेल की स्थितियां खराब हैं, तो यह केवल सजा पाए लोगों की नहीं, बल्कि उन लोगों की भी पीड़ा है जिन पर अपराध सिद्ध होना बाकी है।
इतिहास पर नजर डालें तो अंग्रेजी शासन में जेल दमन का प्रतीक थी। स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे सुधार की अवधारणा सामने आई। चंबल के दस्युओं के लिए खुली जेल का प्रयोग, तिहाड़ जेल में किरण बेदी के कार्यकाल के दौरान सुधारवादी पहल, इन उदाहरणों ने यह संदेश दिया कि जेल केवल दंड का नहीं, पुनर्वास का स्थान भी हो सकती है। दुनिया के कई देशों में कैदियों को कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और परिवार से नियमित संवाद की सुविधाएं दी जाती हैं, ताकि वे समाज में लौटकर बेहतर जीवन जी सकें।
लेकिन भारत में समय-समय पर जेलों से जुड़ी जो खबरें आती हैं, वे एक विरोधाभासी तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। कभी जेल के भीतर से गैंगस्टर द्वारा आपराधिक नेटवर्क संचालित करने की खबरें आती हैं, तो कभी छापों में मोबाइल, नशीले पदार्थ और अन्य प्रतिबंधित सामग्री मिलने की सूचना। कहीं वीआईपी कैदियों को विशेष सुविधाएं मिलने के आरोप लगते हैं, तो कहीं सामान्य कैदियों के साथ मारपीट, अव्यवस्था और चिकित्सा लापरवाही की बातें सामने आती हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न जेलों में कैदियों की संदिग्ध मौतों ने भी बहस को तेज किया है।
चैतन्य बघेल के आरोपों के राजनीतिक आयाम भी हैं। उनके पिता भूपेश बघेल ने इसी संदर्भ में यह दावा किया है कि उन्हें भाजपा में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था और इनकार करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई तेज हुई। यह आरोप गंभीर हैं और स्वाभाविक है कि सत्तारूढ़ पक्ष उन्हें खारिज करेगा। परंतु जेल की स्थितियों पर उठे प्रश्न केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
सवाल यह भी है कि क्या जेलों में व्यवहार व्यक्ति की राजनीतिक पहचान से प्रभावित होता है? या फिर वास्तविक समस्या प्रशासनिक लापरवाही, संसाधनों की कमी और निगरानी तंत्र की कमजोरियों में छिपी है? कई बार यह भी सुनने को मिलता है कि जो कैदी ‘सेवा शुल्क देने में सक्षम होते हैं, उन्हें अपेक्षाकृत बेहतर सुविधा मिलती है, जबकि कमजोर और निर्धन कैदी उपेक्षा झेलते हैं। यदि ऐसा है, तो यह कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत पर सीधा प्रहार है।
जेल सुधार का मुद्दा नया नहीं है। विभिन्न आयोगों और न्यायालयों ने समय-समय पर सुझाव दिए हैं-जेलों में भीड़ कम करने, विचाराधीन कैदियों के मामलों का त्वरित निपटारा, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, स्वतंत्र निरीक्षण तंत्र को मजबूत करने और मानवाधिकार मानकों का पालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। परंतु जमीनी स्तर पर सुधार की गति अक्सर धीमी रही है।
यदि किसी जेल में पीने के पानी की गुणवत्ता संदिग्ध है, यदि चिकित्सा सुविधा पर्याप्त नहीं है, यदि कैदियों को अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहना पड़ता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व की उपेक्षा है। दूसरी ओर, यदि लगाए गए आरोप अतिरंजित या राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं, तो भी पारदर्शी जांच आवश्यक है, ताकि सच्चाई सामने आए और व्यवस्था पर अनावश्यक अविश्वास न फैले।
जेल सुधार की अवधारणा का मूल उद्देश्य यह था कि अपराधी को समाज से अस्थायी रूप से अलग कर उसके भीतर सुधार की संभावना पैदा की जाए। यदि जेल स्वयं हिंसा, असमानता और अव्यवस्था का केंद्र बन जाए, तो वह सुधार की प्रक्रिया को कमजोर कर देती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जेलों को राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठाकर संस्थागत सुधार के नजरिए से देखा जाए। नियमित स्वतंत्र निरीक्षण, सीसीटीवी निगरानी की पारदर्शी व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं का बाहरी ऑडिट, कैदियों की शिकायतों के लिए स्वतंत्र तंत्र और विचाराधीन कैदियों के मामलों का त्वरित निपटारा, ये कदम किसी भी सरकार के लिए प्राथमिकता होने चाहिए।
जेल किसी भी लोकतंत्र की संवेदनशील परीक्षा होती है। वहां राज्य की असली प्रकृति दिखाई देती है, क्या वह प्रतिशोध से प्रेरित है या न्याय से? क्या वह दंड को अपमान में बदल देता है या उसे सुधार की दिशा में मोड़ता है?
चैतन्य बघेल के आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, परंतु उनसे उठे प्रश्न व्यापक हैं। यह समय है कि हम फिर से पूछें क्या हमारी जेलें सचमुच सुधार गृह हैं, या कहीं वे अनजाने में यातनागृह में तब्दील तो नहीं हो रही हैं? लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह इन प्रश्नों से असहज होकर भी उनका ईमानदारी से सामना करे।