पौधे कागजों में जिंदा, जमीन पर मर गई हरियाली,आठ करोड़ के चार प्रोजेक्ट फेल, जमीन पर सिर्फ वीरानी



कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के नाम पर डेढ़ दशक में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन इन योजनाओं का बड़ा हिस्सा अब सरकारी फाइलों तक ही सीमित नजर आता है। कागजों में लाखों पौधे लहलहा रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत में अधिकांश परियोजनाएं सूखी मिट्टी, टूटे ट्री-गार्ड और उजड़े हुए मैदानों में बदल चुकी हैं। रायपुर, धमतरी और कोरिया जिलों में लगभग आठ करोड़ रुपये की लागत से संचालित चार प्रमुख वृक्षारोपण परियोजनाओं की स्थिति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


धमतरी से नगरी तक राम वन गमन मार्ग को हरियाली से आच्छादित करने के उद्देश्य से वर्ष 2020 में 56 किलोमीटर लंबे मार्ग पर दो करोड़ पांच लाख रुपये खर्च कर करीब 14 हजार पौधे लगाए गए थे। पीपल, बरगद, नीम और आम जैसे छायादार वृक्षों के इन पौधों से मार्ग को धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व देने की योजना थी। लेकिन कुछ वर्षों बाद ही अधिकांश पौधे नष्ट हो गए। आज वहां हरियाली के बजाय सूखी जमीन और जर्जर ट्री-गार्ड दिखाई देते हैं। वन विभाग के अधिकारी अब स्वीकार कर रहे हैं कि मुरमयुक्त भूमि पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण करना व्यावहारिक नहीं था।
इसी तरह नवा रायपुर के पचेड़ा क्षेत्र में वर्ष 2019-20 के दौरान तीन करोड़ रुपये की लागत से 66 हजार से अधिक औषधीय और छायादार पौधे लगाए गए थे। इस परियोजना को राजधानी क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हरित क्षेत्र विकसित करने के रूप में प्रस्तुत किया गया था। हालांकि वर्तमान स्थिति बिल्कुल विपरीत है। यहां बड़ी संख्या में कटे हुए पेड़ों के ठूंठ दिखाई देते हैं और रखरखाव की व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। जिस क्षेत्र को पर्यावरण संरक्षण का मॉडल बनाया जाना था, वह अब उपेक्षा का प्रतीक बन गया है।


नवा रायपुर के सुंदरकेरा गांव में शुरू की गई परियोजना की कहानी भी कम विडंबनापूर्ण नहीं है। वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने स्वयं 32 एकड़ क्षेत्र में इस महत्वाकांक्षी हरित परियोजना का शुभारंभ किया था। लगभग 50 लाख रुपये खर्च कर इसे विकसित करने का प्रयास किया गया, लेकिन रखरखाव के अभाव में यह योजना असफल हो गई। बाद के वर्षों में तीन बार और पुनर्जीवित करने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार परिणाम निराशाजनक रहे। आज डॉ. कलाम के सपनों से जुड़ी यह परियोजना अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रही है।
कोरिया जिले के चिरमिरी में सोनावनी बौद्ध विहार परिसर में विकसित किए गए ऑक्सीजन पार्क का हाल भी कुछ अलग नहीं है। हरियर छत्तीसगढ़ योजना के तहत 40 एकड़ भूमि पर दो चरणों में करीब 30 हजार पौधे लगाए गए थे। इसके लिए एक करोड़ पांच लाख रुपये खर्च किए गए। उद्देश्य था कि यह क्षेत्र स्थानीय लोगों के लिए स्वच्छ वातावरण और हरित क्षेत्र का केंद्र बने। लेकिन वर्तमान में यह पार्क हरियाली के बजाय उजड़े हुए मैदान जैसा दिखाई देता है, जहां अधिकांश पौधे जीवित नहीं बच पाए।


स्थिति की गंभीरता का अंदाजा वन विभाग के आंतरिक ऑडिट से लगाया जा सकता है। ऑडिट में राज्यभर के 500 से अधिक वृक्षारोपण स्थलों पर पौधारोपण के पूरी तरह विफल होने की बात सामने आई है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और बस्तर संभाग को सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल किया गया है। इसके बावजूद वृक्षारोपण कार्यक्रमों पर खर्च का सिलसिला लगातार जारी रहा। पिछले दस वर्षों में कैम्पा फंड और विभागीय बजट से पौधारोपण तथा संरक्षण के नाम पर 2,500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं।


सरकारी आंकड़ों के अनुसार विभिन्न अभियानों के तहत अब तक 65 से 70 करोड़ पौधे लगाए जाने का दावा किया गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन पौधों का बड़ा हिस्सा वास्तव में जीवित बचा होता, तो छत्तीसगढ़ का हरित आवरण वर्तमान स्तर से कहीं अधिक होता और राज्य का ग्रीन कवर 60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकता था। लेकिन जमीनी हालात इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।


सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जहां एक ओर अनेक वृक्षारोपण स्थल वीरान पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय वन सर्वेक्षण की 2023 की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को वन एवं वृक्ष आवरण वृद्धि के मामले में देश में अग्रणी राज्यों में शामिल किया गया है। सरकारी रिपोर्टों और जमीनी वास्तविकता के बीच यह अंतर पर्यावरणीय योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
हरियाली के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि पौधे कुछ वर्षों के भीतर ही नष्ट हो जाएं, तो यह केवल संसाधनों की बर्बादी नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य की भी विफलता है। छत्तीसगढ़ की इन परियोजनाओं ने यह साबित कर दिया है कि केवल पौधे लगाने से हरियाली नहीं आती। उनके संरक्षण, निगरानी और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था के बिना वृक्षारोपण अभियान सिर्फ सरकारी फाइलों में दर्ज आंकड़ों तक सीमित रह जाते हैं। आज इन योजनाओं के स्थल इस कड़वी सच्चाई के गवाह हैं कि कागजों में उगी हरियाली जमीन पर जीवन नहीं दे सकती।


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