दो कौड़ी का कौन? शिक्षक, मीडिया और समाज की बहस!



हाल के दिनों में एक टीवी बहस के दौरान शिक्षकों को लेकर की गई एक टिप्पणी ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। विवाद का केंद्र महज एक शब्द नहीं है, बल्कि वह सम्मान, प्रभाव और सामाजिक भूमिका है जो आज के दौर में शिक्षकों को मिल रही है।

भारत में गुरु को हमेशा विशेष स्थान दिया गया है। कबीर का प्रसिद्ध दोहा ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े… ‘ केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय समाज में शिक्षक की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। हालांकि समय के साथ शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव आए हैं। एक और कोचिंग संस्थानों का व्यावसायिक रवैया है, जो शिक्षा शिक्षा के पवित्र उद्देश्य को उद्योग में बदलने का अपराध कर रहे हैं। अधिकांश कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या भारत में शिक्षा की स्थिति को बढ़ाने या संभालने की नहीं है, बल्कि धंधे का लोभ भी है। इसी कारण बच्चों को शिक्षा के व्यावसायिक दलदल से बाहर निकालने के लिए अब गैर व्यावसायिक प्रयास भी शुरू हो गए हैं। आज शिक्षा केवल स्कूल और कॉलेजों तक सीमित नहीं है। डिजिटल क्रांति ने सीखने और सिखाने दोनों के स्वरूप को बदल दिया है।

पिछले एक दशक में ऑनलाइन शिक्षा और कम फीस या लगभग निशुल्क कोचिंग का तेजी से विस्तार हुआ है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले अनेक शिक्षक राष्ट्रीय पहचान बना चुके हैं। खान सर, विकास दिव्यकीर्ति, अवध ओझा (अलग ओझा) जैसी अनेक शिक्षकीय हस्तियां केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के बीच प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में उभरी हैं। उनकी लोकप्रियता का कारण केवल सोशल मीडिया नहीं, बल्कि वह शिक्षण शैली है जिसने जटिल विषयों को सरल बनाया और कम संसाधनों वाले विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाई।

यह भी सच है कि शिक्षा का व्यवसायीकरण कम नहीं हो रहा है। देश के कई हिस्सों में कोचिंग उद्योग एक बड़े आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है। महंगी फीस, प्रतिस्पर्धा और सफलता के दबाव ने कई प्रश्न भी खड़े किए हैं। लेकिन इसी वातावरण में ऐसे शिक्षक भी सामने आए हैं जिन्होंने कम लागत या ऑनलाइन माध्यम से लाखों छात्रों को अवसर उपलब्ध कराए।

यही कारण है कि आज शिक्षक केवल अध्यापक नहीं, बल्कि प्रेरक, मार्गदर्शक और कई मामलों में जनमत को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व भी बन गए हैं।
दूसरी ओर मीडिया की भूमिका भी लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। समाचार चैनलों की बहसों में अक्सर तीखी भाषा और आक्रामक टिप्पणियां देखने को मिलती हैं। टीआरपी और दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा में कई बार शब्दों का चयन विवाद का कारण बन जाता है। यह केवल शिक्षकों के संदर्भ में नहीं, बल्कि राजनीति, धर्म, मनोरंजन और अन्य क्षेत्रों में भी देखा गया है।

वर्तमान विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार शिक्षकों का एक बड़ा डिजिटल समुदाय खुलकर प्रतिक्रिया देता दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया ने संवाद को एकतरफा नहीं रहने दिया है। अब केवल पत्रकार, राजनेता या सेलिब्रिटी ही नहीं, बल्कि शिक्षक, छात्र और आम नागरिक भी अपनी बात सीधे लाखों लोगों तक पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि किसी टिप्पणी का जवाब भी उतनी ही तेजी से सामने आता है।

समाज के लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति नहीं, विचार पर बहस करे। किसी शिक्षक की आलोचना हो सकती है, किसी पत्रकार के काम पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन पूरे पेशे को अपमानजनक शब्दों से संबोधित करना स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा नहीं माना जा सकता है। शिक्षक और पत्रकार दोनों ही समाज को दिशा देने वाले वर्ग हैं और दोनों ही जगह प्रायः पेशे की पवित्रता खत्म हो रही है। शिक्षा के व्यवसायीकरण के बीच कुछ शिक्षकों ने शिक्षा की पवित्रता को बचाने के लिए कोशिश से शुरू की है, लेकिन अब आमजन और अधिकांश शिक्षकों का कहना है कि कुछ न्यूज़ चैनलों के पत्रकारों ने तो पेशे की पवित्रता को बेचने के लिए जो निर्लज्ज तत्परता दिखाई है, उसने ईमानदार पत्रकारों को शर्मनाक स्थिति में खड़ा कर दिया है।

शिक्षक के सामने अपनी प्रतिबद्धता या अपनी दासता को प्रमाणित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष मालिक नहीं होता है। इसलिए उसे प्रायः ऐसी कोई जरूरत भी नहीं होती है । कुछ न्यूज़ चैनलों में अपने मालिकों को खुश करने के लिए कथित रूप से कुछ एंकर जरूरत से ज्यादा और ज्ञान से कम बोलने के लिए उतावले हो जाते हैं। इससे अपनी नासमझी के चलते आमजन के गुस्से का शिकार होते हैं और संकट में पड़ जाते हैं। दरअसल कथित अभद्रता हर बार लोकप्रियता का कारण नहीं बनती है। कुछ एंकर इस बात को समझ नहीं पाते हैं और विवाद को बुलावा देते हैं।

आज का भारत ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और विश्वसनीय पत्रकारिता दोनों की आवश्यकता पहले से अधिक है। इसलिए यह विवाद केवल एक बयान का विवाद नहीं, बल्कि इस प्रश्न का भी है कि बदलते डिजिटल युग में हम अपने शिक्षकों, पत्रकारों और सार्वजनिक विमर्श के स्तर को किस नजर से देखते हैं। अंततः सम्मान किसी पद, मंच या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि समाज में किए गए योगदान से अर्जित होता है। शिक्षक हों या पत्रकार, दोनों की जिम्मेदारी भी बड़ी है और उनसे अपेक्षाएं भी। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन सम्मान उसकी बुनियाद।

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