बिहार की राजनीति में विरासत की नई पारी? क्या नीतीश के बेटे निशांत संभालेंगे बिहार की कमान?

बिहार की राजनीति में पारिवारिक विरासत का सिलसिला कोई नया नहीं है। राज्य की सियासत में कई बड़े नेताओं ने अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए अपने बेटों को राजनीति में उतारा है। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के संभावित राजनीतिक प्रवेश की चर्चा के साथ यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या वे भी अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएंगे।

बिहार के राजनीतिक इतिहास में समाजवादी राजनीति और पारिवारिक विरासत का गहरा संबंध रहा है। ऐसे में यदि निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में आते हैं तो यह जेडीयू की भावी राजनीति और राज्य के राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों और युवाओं की नजर इस बात पर टिकी है कि एक अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण और साफ छवि वाले निशांत कुमार बिहार की जटिल सियासत में खुद को किस तरह स्थापित करते हैं।

दरअसल, बिहार के इतिहास में अब तक सात ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिनके बेटे राजनीति में सक्रिय हुए और कई ने अपनी अलग पहचान भी बनाई। इनमें सबसे चर्चित नाम लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के परिवार का है। उनके दोनों बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव सक्रिय राजनीति में हैं, जिनमें तेजस्वी यादव को आज बिहार की राजनीति के प्रमुख चेहरों में गिना जाता है।

इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के बेटे नीतीश मिश्रा ने भी राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई और वे बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद ने भी राजनीति में कदम रखकर सांसद के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की।

इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन भी सक्रिय राजनीति में हैं और ‘हम’ पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। पुराने दौर में भी यह परंपरा देखने को मिली थी जब पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बेटे निखिल कुमार राजनीति में आए और कई अहम पदों पर रहे। समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर भी सक्रिय राजनीति में रहे और राज्यसभा सदस्य बने।

इस तरह तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, नीतीश मिश्रा, कीर्ति आजाद, संतोष कुमार सुमन, निखिल कुमार और रामनाथ ठाकुर जैसे नाम उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने अपने मुख्यमंत्री पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निशांत कुमार अगर सक्रिय राजनीति में आते हैं तो बिहार की सियासत में एक और राजनीतिक विरासत का नया अध्याय जुड़ सकता है।

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