बिलासपुर। बिलासपुर में अब ‘लू’ में फर्जीवाड़ा सामने आया है। सर्पदंश से मौत के बाद पीड़ित परिवारों को राहत देने के लिए सरकार की ओर से दी जाने वाली मुआवजा राशि ही कथित फर्जीवाड़े के जहर का असर अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि लू से हुई मौतों और मुआवजा वितरण घोटाला सामने आया है। इन घोटालों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। विधायक सुशांत शुक्ला द्वारा मामला उठाए जाने के बाद जिला प्रशासन ने पुराने प्रकरणों की जांच शुरू की तो चौंकाने वाली अनियमितताएं सामने आईं। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अलग-अलग थानों में 14 एफआईआर दर्ज कर ली हैं।
जांच में सामने आया कि कुछ मामलों में मृतकों के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर सरकारी सहायता राशि निकालने का प्रयास किया गया। आरोप है कि मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया में दस्तावेजों की जांच से लेकर आवेदन तैयार करने तक कई स्तरों पर गड़बड़ी हुई। प्रारंभिक जांच में 60 लाख से अधिक की राशि में अनियमितता की आशंका जताई गई है। विधायक ने प्रदेश में लू से हुई मौतों और मुआवजा वितरण के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड में कुछ जिलों को छोड़कर अन्य स्थानों पर लू से मौत के मामले दर्ज नहीं होना जांच का विषय है। उन्होंने मांग की है कि लू से मौत और राहत राशि वितरण की प्रक्रिया की भी स्वतंत्र जांच कराई जाए। फिलहाल पुलिस और प्रशासन दोनों इस बात की पड़ताल में जुटे हैं कि कथित फर्जीवाड़े का दायरा कितना बड़ा है। जांच में यदि और दस्तावेज या नए नाम सामने आते हैं तो आने वाले दिनों में मामले में और एफआईआर दर्ज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।
दरअसल, जब जिला प्रशासन ने सर्पदंश से मृत्यु के बाद दिए गए 17 मुआवजा प्रकरणों की समीक्षा शुरू की। जांच के दौरान कई फाइलों में दस्तावेजों की सत्यता, मेडिकल प्रमाण-पत्र और मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। इसके बाद प्रशासन ने पुलिस को प्रकरण दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। पुलिस के अनुसार अब तक दर्ज एफआईआर में सबसे ज्यादा मामले सरकंडा थाना क्षेत्र के हैं, जहां 5 प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा कोनी थाना में 3, सिविल लाइन थाना में 3, तोरवा थाना में 2 और सिटी कोतवाली थाना में 1 मामला दर्ज किया गया है।
इस पूरे मामले में केवल आवेदकों पर ही सवाल नहीं उठे हैं, बल्कि जांच का दायरा उन लोगों तक भी पहुंच गया है, जिनकी भूमिका मुआवजा प्रक्रिया में रही। पुलिस ने कुछ वकीलों, डॉक्टरों और मृतकों के परिजनों को भी आरोपी बनाया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि यदि फर्जी दस्तावेजों के जरिए मुआवजा राशि निकाली गई है तो इसमें एक संगठित नेटवर्क की भूमिका हो सकती है।
विधायक सुशांत शुक्ला ने आरोप लगाया है कि यह मामला सिर्फ कुछ लोगों की धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा तंत्र काम कर सकता है।
उन्होंने कहा कि मुआवजा वितरण व्यवस्था में यदि किसी स्तर पर संरक्षण या लापरवाही हुई है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। वास्तविक दोषियों तक पहुंचने के लिए केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की जांच जरूरी है। इस मामले में 14 नहीं बल्कि 17 एफआईआर दर्ज की गई हैं और जांच का दायरा बढ़ाकर उन अधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों की भूमिका भी सामने लाई जानी चाहिए, जिनकी निगरानी में मुआवजा प्रक्रिया पूरी हुई।