रायपुर : रायपुर में कमिश्नरेट सिस्टम लागू करते समय दावा किया गया था कि राजधानी की पुलिसिंग अधिक आधुनिक, जवाबदेह और तकनीक आधारित होगी। कहा गया था कि अपराधियों पर तेजी से शिकंजा कसा जाएगा और हर नागरिक को समयबद्ध न्याय मिलेगा। लेकिन हाल के कुछ मामलों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या पुलिस की सक्रियता सभी नागरिकों के लिए समान है या फिर कुछ मामलों को विशेष प्राथमिकता मिलती है।
पिछले दिनों राजधानी में सामने आए तीन मामलों में पुलिस ने बेहद कम समय में आरोपियों तक पहुंचकर कार्रवाई की। सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धर्मलाल कौशिक से मॉर्निंग वॉक के दौरान मोबाइल लूट की घटना हुई। शिकायत मिलते ही पुलिस सक्रिय हुई और 24 घंटे के भीतर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस कार्रवाई को कमिश्नरेट सिस्टम की सफलता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद भाजपा विधायक पुरंदर मिश्र से साइबर ठगी का मामला सामने आया। ठग ने खुद को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का निजी सहायक बताकर विधायक को झांसे में लिया और 10 हजार रुपये ट्रांसफर करवा लिए। शिकायत मिलते ही साइबर सेल हरकत में आई, आरोपी की लोकेशन ओडिशा में ट्रेस की गई और पुलिस टीम भेजकर उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
ताजा मामला डंगनिया क्षेत्र में हुई 10 लाख रुपये की लूट का है। परवेश गैस एजेंसी के सुपरवाइजर-ड्राइवर श्रवण साहू से बाइक सवार बदमाशों ने नकदी से भरा बैग लूट लिया था। इस मामले में पुलिस एक्टिव मोड में है। ताबड़तोड़ जांच में जुटी है। पुलिस का दावा है कि जल्दी ही आरोपियों की पहचान कर और गिरफ्तार कर लेगी। जिस गैस एजेंसी से यह रकम लूटी गई है। उसका संबंध क्षेत्र के एक विधायक से बताया जाता है। इन तीनों मामलों में पुलिस की तत्परता और तकनीकी दक्षता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। सवाल उस तुलना को लेकर है जो आम नागरिकों के अनुभवों के साथ स्वतः खड़ी हो जाती है।
राजधानी में हर दिन मोबाइल चोरी, बाइक चोरी और साइबर ठगी की दर्जनों शिकायतें सामने आती हैं। अनेक पीड़ितों का कहना है कि उन्हें एफआईआर दर्ज कराने से लेकर जांच की प्रगति जानने तक लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई मामलों में महीनों बीत जाने के बाद भी आरोपियों तक पुलिस नहीं पहुंच पाती। ऐसे में जब किसी जनप्रतिनिधि या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा मामला रिकॉर्ड समय में सुलझ जाता है, तो आम लोगों के बीच सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है। पुलिस अधिकारियों का तर्क होता है कि संवेदनशील मामलों में अधिक संसाधन और विशेष टीमें लगाई जाती हैं। जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में राजनीतिक और मीडिया दबाव भी अधिक रहता है, जिसके कारण त्वरित कार्रवाई आवश्यक हो जाती है। लेकिन नागरिकों का सवाल इससे अलग है। उनका कहना है कि यदि तकनीक, साइबर ट्रैकिंग, सीसीटीवी नेटवर्क और विशेष टीमें उपलब्ध हैं, तो इनका लाभ हर पीड़ित को समान रूप से क्यों नहीं मिलना चाहिए?
कमिश्नरेट सिस्टम का मूल उद्देश्य ही यही था कि पुलिस व्यवस्था अधिक जवाबदेह बने और अपराधों के प्रति प्रतिक्रिया का समय कम हो। यदि व्यवस्था कुछ मामलों में 24 से 48 घंटे के भीतर आरोपी तक पहुंच सकती है, तो फिर सामान्य नागरिकों की शिकायतों में वही गति अक्सर दिखाई क्यों नहीं देती? राजधानी में लगातार बढ़ रहे सीसीटीवी कैमरे, डिजिटल निगरानी तंत्र और साइबर जांच सुविधाएं पुलिस की क्षमता को मजबूत बनाती हैं। लेकिन इन संसाधनों की प्रभावशीलता का आकलन केवल चर्चित मामलों से नहीं, बल्कि उन हजारों शिकायतों से होगा जो रोजाना थानों तक पहुंचती हैं। आम आदमी के लिए पुलिस की छवि किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस या उपलब्धि से नहीं, बल्कि उसकी अपनी शिकायत पर हुई कार्रवाई से बनती है।
यही वजह है कि शहर में अब यह चर्चा सुनाई देने लगी है कि कहीं पुलिसिंग का एक “वीआईपी रिस्पांस मॉडल” तो विकसित नहीं हो रहा, जिसमें पीड़ित की पहचान ही कार्रवाई की गति तय करती है। यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन इसका बनना स्वयं पुलिस व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार जनता का भरोसा होता है।
रायपुर की हालिया घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कानून के सामने सभी समान हैं, या फिर न्याय की रफ्तार अब भी पहचान और प्रभाव के अनुसार बदल जाती है। यही वह सवाल है जिसका जवाब जनता पुलिस व्यवस्था से चाहती है।