रोजगार छिनने से भड़के 10 गांवों के ग्रामीण, सांसद-विधायक के खिलाफ खोला मोर्चा

​जनधारा संवाददाता चारामा-अनूप वर्मा

चारामा रेत खदान एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में आ गई है। लेकिन इस बार मामला किसी प्रशासनिक कार्रवाई का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ ग्रामीणों के सीधे आक्रोश का है। चारामा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लगभग 10 से अधिक गांवों के ग्रामीण और ग्राम प्रमुख देर रात भारी संख्या में चारामा के कोरर चौक पर इकट्ठा हुए और सांसद व विधायक के खिलाफ जमकर नाराजगी जाहिर की। ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थ और ‘झोली भरने’ के लिए नियमतः चल रही खदानों को बंद करवा रहे हैं, जिससे स्थानीय युवाओं का रोजगार छिन रहा है।


​वहीं दूसरी ओर, क्षेत्रीय विधायक सावित्री मंडावी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए तीखा पलटवार किया है। विधायक ने सवाल उठाया है कि मीडिया के सामने आकर बयानबाजी करने वाले लोग आखिर हैं कौन?
​ग्रामीणों का आरोप: “सांसद-विधायक छीन रहे रोजगार, खदान से होता है गांवों का विकास”
​प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों ने क्षेत्रीय सांसद भोजराज नाग द्वारा हाल ही में की गई कार्रवाई को पूरी तरह बेवजह बताया। ग्रामीणों का कहना है कि रेत खदानों से मिलने वाली रॉयल्टी और राशि से गांवों में मूलभूत विकास कार्य हो रहे हैं।


​ग्राम भिलाई के प्रमुख गोपाल गजेंद्र ने कहा, “हमारे गांव की खदान पंचायत और ग्राम सभा के प्रस्ताव के बाद नियमों के तहत संचालित हो रही है। इस राशि से गांव में तालाब, देवगुड़ी, शीतला मंदिर और रंगमंच का निर्माण कराया गया है। बस्तर संभाग के लोगों को पांचवीं अनुसूची के तहत जल, जंगल और जमीन पर अधिकार मिला हुआ है। खदान रोकना गांव के विकास को रोकने जैसा है।”
​ग्राम करिहा के प्रमुख मदन लाल जैन ने बताया, “करिहा में लगभग 20 लाख रुपये की लागत से भव्य शीतला मंदिर का निर्माण चल रहा है। यदि रेत खदान बंद हुई तो यह काम अधूरा रह जाएगा। जनप्रतिनिधि सिर्फ अपनी झोली भरने के लिए हस्तक्षेप कर रहे हैं, जबकि गांव की समस्याओं को सुनने वे कभी नहीं आते।”
​ग्राम मचान्दुर (भर्रीटोला) के ग्रामीण हेमू साहू ने रोष जताते हुए कहा, “मैं खुद भाजपा का कार्यकर्ता हूं, लेकिन सांसद ने कभी हमसे चर्चा नहीं की। वे अचानक आकर कार्रवाई कर रहे हैं, जिससे हमारे बेरोजगार युवाओं का रोजगार छिन रहा है।”
​ग्राम हाराडुला के सरपंच पति टाकेश्वर मरकाम ने बताया, “नई सरकार बने एक साल हो गया, लेकिन पंचायत में फंड की भारी कमी है। कोई बड़ा सरकारी काम नहीं हुआ। हमने रेत खनन से प्राप्त राशि से गांव में नया बोर खनन करवाया और सोलर लाइटें लगवाईं ताकि जल संकट दूर हो सके।”
​ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यदि किसी को कोई आपत्ति है, तो पहले ग्राम सभा में चर्चा होनी चाहिए, न कि सीधे खदान बंद कराई जाए।
​विधायक सावित्री मंडावी का पलटवार: “हम खदान नहीं, अवैध चैन माउंटेन और भारी हाइवा के खिलाफ”
​ग्रामीणों के इस बड़े विरोध प्रदर्शन और आरोपों पर क्षेत्रीय विधायक सावित्री मंडावी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे रेत खदान बंद कराने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि उनका विरोध अवैध मशीनों और भारी वाहनों से होने वाली तबाही के खिलाफ है।


​विधायक मंडावी के मुख्य बिंदु:
​ब्लॉक सरपंच संघ की मांग: विधायक ने कहा, “मेरे पास ब्लॉक सरपंच संघ का लिखित आवेदन है। सरपंच संघ ने खुद मांग की है कि खदानों में भारी चैन माउंटेन मशीनों से अवैध खनन रोका जाए और बड़े-बड़े हाइवा बंद किए जाएं, ताकि स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार मिले।”
​पुल टूटने और हादसों का खतरा: उन्होंने बताया कि भारी हाइवा गाड़ियों के चलने से चारामा क्षेत्र का एक पुल पूरी तरह टूट चुका है और अन्य पुलों के सरिए दिखाई देने लगे हैं। नेशनल हाईवे पर चलने वाले राहगीरों, विशेषकर बाइक सवारों के साथ आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं, जिसमें कई लोग जान गंवा चुके हैं।
​ट्रैक्टर परिवहन का समर्थन: विधायक ने कहा, “हम भी चाहते हैं कि स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। गांवों में अधिकांश लोगों के पास ट्रैक्टर हैं। यदि ट्रैक्टरों के माध्यम से परिवहन होगा, तो स्थानीय युवाओं को काम मिलेगा। ट्रैक्टर मालिक भी इस पर सहमत हैं।”


​”बयान देने वाले सरपंच हैं क्या?”
​मीडिया में आए बयानों पर सवाल उठाते हुए विधायक सावित्री मंडावी ने कहा:
​”जो लोग मीडिया के सामने चिल्ला रहे हैं, वहां असल गांव वाले तो दिख नहीं रहे हैं। मैं पूछना चाहती हूं कि क्या ये लोग रोज होने वाले सड़क हादसों और टूटते पुलों की जिम्मेदारी लेंगे? जब किसानों के मुद्दे आते हैं, तब ये लोग कहीं नजर नहीं आते। क्या बयान देने वाले लोग सरपंच हैं? मैं खुद जल्द ही गांवों का दौरा करूंगी और सीधे ग्रामीणों से बात करूंगी कि हकीकत क्या है।”
​निष्कर्ष (जमीनी स्थिति)
​चारामा की रेत खदानों को लेकर अब आर-पार की लड़ाई छिड़ चुकी है। एक तरफ जहां ग्रामीण इसे पांचवीं अनुसूची के तहत अपने संसाधनों पर अधिकार और गांवों के विकास व रोजगार का इकलौता जरिया मानकर खदानें पूरी तरह चालू रखने की मांग कर रहे हैं; वहीं दूसरी ओर, प्रशासन और विधायक भारी वाहनों (हाइवा) और भारी मशीनों (चैन माउंटेन) से हो रहे पर्यावरण व अधोसंरचना के नुकसान का हवाला दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने की आशंका है।

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