-सुभाष मिश्र
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते हैं। वे जनता की आशाओं, अपेक्षाओं और असंतोष की सामूहिक अभिव्यक्ति भी होते हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसी प्रवृत्ति तेज़ी से उभरी है, जिसने इस लोकतांत्रिक जरूरत पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। जैसे ही चुनाव नज़दीक आते हैं, वैसे ही विपक्षी नेताओं, उनसे जुड़े व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं या विपक्ष शासित राज्यों के अधिकारियों पर जांच एजेंसियों के छापे बढऩे लगते हैं। अब यह सवाल केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता भी खुलकर पूछने लगी है। क्या यह संयोग है या सुनियोजित चुनावी षडय़ंत्र?
यह कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा कि इस प्रवृत्ति की शुरुआत आज के दौर में हुई। आपातकाल के समय इंदिरा गांधी के शासन में सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगे थे। उस दौर में सत्ता की आलोचना को कुचलने के लिए प्रशासनिक ताक़त का इस्तेमाल हुआ। यह एक कड़वी सच्चाई है। लेकिन तब और अब के बीच एक बड़ा अंतर है तब यह प्रवृत्ति असाधारण परिस्थितियों में दिखी थी और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की इस संबंध में खूब आलोचना भी हुई थी। इसी को लेकर आपातकाल के बाद कांग्रेस सरकार की बड़ी पराजय हुई थी, लेकिन आज यह बात लगभग सामान्य राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। यही कारण है कि यह स्थिति पहले से कहीं अधिक गंभीर और लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रतीत होती है।
लोकतंत्र की बुनियाद इस सिद्धांत पर टिकी होती है कि सत्ता और विपक्ष दोनों समान रूप से क़ानून के अधीन हों। जांच एजेंसियाँ स्वतंत्र हों, निष्पक्ष हों और उनका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए न हो लेकिन जब चुनाव के ठीक पहले छापे पड़ते हैं, गिरफ़्तारियाँ होती हैं, मीडिया ट्रायल शुरू होता है और बाद में कई मामलों में वर्षों तक कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकलता, तो जनता के मन में संदेह स्वाभाविक है। अब आम नागरिक यह सोचने लगा है कि यदि आरोप इतने गंभीर थे तो कार्रवाई चुनाव के समय ही क्यों? और यदि आरोप सही नहीं थे तो वर्षों तक लोगों की छवि और जीवन क्यों बर्बाद किया गया?
इसका सीधा प्रभाव जनता की सोच पर पड़ रहा है। एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि राजनीति अब नीतियों और विचारधाराओं की नहीं, येन केन प्रकरेण सत्ता में बने रहने के लिए बेहिचक सरकारी एजेंसियों और दबाव की लड़ाई बनती जा रही है। इससे सत्ता के प्रति भय तो पैदा होता है, लेकिन विश्वास नहीं। लोकतंत्र में डर से मिली चुप्पी स्थायित्व नहीं लाती, बल्कि अंदर ही अंदर असंतोष को जन्म देती है।
दूसरा बड़ा प्रभाव यह है कि जनता सत्ता की राजनीति को और अधिक संदेह की दृष्टि से देखने लगी है। पहले लोग सोचते थे कि सभी नेता भ्रष्ट हैं, अब यह सोच और गहरी हो गई है सिस्टम ही पक्षपाती है। यह भावना लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है, क्योंकि जब नागरिकों का भरोसा संस्थाओं से उठने लगता है, तब लोकतांत्रिक ढांचा खोखला होने लगता है।
आमजन के एक बड़े हिस्से का यह मानना है कि युवा वर्ग पर इसका असर और भी चिंताजनक है। जो पीढ़ी राजनीति में बदलाव की उम्मीद लेकर आई थी, वह यह देखकर निराश होती जा रही है कि चुनाव, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार या महंगाई पर नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के लिए किसी भी तरह किस पर छापा डाला जाए और किसे जेल भेजा जाए इस पर केंद्रित हो गया है। इससे युवाओं में या तो राजनीतिक उदासीनता पैदा होती है या फिर कट्टरता। दोनों ही लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं हैं। व्यापारी वर्ग का भी मानना है कि व्यापारियों और पेशेवर वर्ग में भी असुरक्षा की भावना बढ़ी है। यदि किसी व्यापारी का राजनीतिक संपर्क उसे कभी भी जाँच के दायरे में ला सकता है तो वह जोखिम लेने से बचेगा। इसका असर अर्थव्यवस्था, निवेश और नवाचार पर भी पड़ता है। लोकतंत्र केवल वोट देने का अधिकार नहीं है, यह निर्भय होकर काम करने और विचार रखने का वातावरण भी मांगता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि धीरे-धीरे यह सब नया सामान्य बनता जा रहा है। जब असामान्य चीज़ें सामान्य लगने लगें, तब खतरे की घंटी बजनी चाहिए। जनता का एक हिस्सा इसे सत्ता की मज़बूती मानकर स्वीकार कर लेता है, जबकि दूसरा हिस्सा भीतर ही भीतर लोकतंत्र के क्षरण को महसूस करके विरोध का मन बनाने लगता है।
आमजन के बीच अब यह बड़ी बहस का विषय हो गया है कि आवश्यकता इस बात की है कि जांच एजेंसियों की स्वायत्तता पर गंभीर सार्वजनिक बहस हो। संसद, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज, सभी की जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि क़ानून का इस्तेमाल क़ानून के लिए हो, राजनीति के लिए नहीं। चुनाव जीतने के लिए डर नहीं, भरोसा पैदा किया जाना चाहिए।
अंतत: लोकतंत्र केवल सत्ता में बैठे लोगों की परीक्षा नहीं है, बल्कि जनता की भी परीक्षा है कि वह सवाल पूछे, संयोग और साजि़श के फर्क को समझे, और अपने अधिकारों को धीरे-धीरे खत्म होते देखने की बजाय उन्हें बचाने के लिए सजग रहे, क्योंकि लोग अब दबी जुबान में नहीं मुखर होकर कहने लगे हैं कि जब चुनाव केवल छापों और भय की छाया में होने लगे, तब लोकतंत्र औपचारिक तो रह जाता है, लेकिन आत्मा खो देता है।