मांग सुस्त, भाव स्थिर; बेहतर बाजार की राह देख रहे वनोपज संग्राहक

चरोटा के निर्यात पर असर, डोरी सीड मजबूत; बबूल बीज और नीम गुठली की खरीद फिलहाल शांत

राजकुमार मल

भाटापारा- डिमांड कमजोर। भंडारण भरपूर। इसलिए कीमतों में स्थिरता का रुख बना हुआ है। चरोटा, बबूल बीज, नीम गुठली और डोरी सीड संग्राहकों को प्रतीक्षा है अच्छी मांग की।

महुआ के बाद छत्तीसगढ़ के प्रमुख वनोपज में आता है नाम चरोटा, बबूल बीज,नीम गुठली और डोरी सीड का। बेहतर मांग वाले यह चारों पहली बार शार्ट डिमांड के घेरे में है।इसके बावजूद कीमतों में कमी की धारणा इसलिए भी नहीं है क्योंकि उपभोक्ता क्षेत्र खरीफ फसलों की बोनी के लिए जोरदार बारिश की राह देख रहा है।


एक्सपोर्ट बंद है चरोटा में

चीन, ताईवान, मलेशिया और जापान प्रदेश के चरोटा के सबसे बड़े खरीददार है‌ंं लेकिन इन चारों देशों के लिए विदेश व्यापार विभाग ने निर्यात पर बंदिश लगा रखी है। लोकल डिमांड वैसे भी नहीं के बराबर है। इसलिए प्रति क्विंटल भाव 2200 से 2400 रुपए पर स्थिर है।इसे बीते दो साल का सबसे न्यूनतम भाव बताया जा रहा है।


मजबूत डोरी सीड

कमजोर थी महुआ की फसल। ऐसे में कमजोर खरीदी के बावजूद डोरी सीड 5000 से 5100 रुपए क्विंटल की कीमत पर मजबूत है। खाद्य तेल उत्पादक ईकाइयों की बेहतर मांग की प्रतीक्षा कर रहे संग्राहक और वनोपज बाजार की धारणा है कि डोरी सीड में कीमतें नीचे जाने की धारणा इसलिए नहीं हैं क्योंकि खाद्य तेलों के सीजन की शुरुआत बहुत जल्द होने वाली है।


शांत हैं यह दोनों

बबूल बीज से बनता है पशु आहार। नीम गुठली खरीदतीं हैं कीटनाशक दवाएं और रासायनिक तथा जैविक खाद निर्माता कंपनियां।भाव क्रमशः 2000 से 2200 रुपए क्विंटल और 1600 से 1700 रुपए क्विंटल। बबूल बीज में डिमांड कमजोर इसलिए हो रही है क्योंकि उपभोक्ता राज्यों में हरा चारा की उपलब्धता आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ रही है। जबकि नीम गुठली की खरीदी का पहला दौर खत्म हो चला है।अब तैयारी भंडारण की है। इसके लिए ईकाइयां फिलहाल अनिच्छुक हैं।

प्रतीक्षा कर रहे हैं

कीमतें प्रति क्विंटल कम ही है। इसके बावजूद उपभोक्ता खरीदी बेहद शांत है। इसलिए प्रतीक्षा कर रहें हैं बेहतर मांग के दिनों की।
-सुभाष अग्रवाल,एस पी इंडस्ट्रीज, रायपुर

कमजोर मांग अस्थायी, वनोपजों का दीर्घकालीन महत्व बरकरार

चरोटा, बबूल बीज, नीम गुठली और डोरी सीड की मौजूदा कीमतें बाजार की अस्थायी मांग-आपूर्ति स्थिति को दर्शाती हैं, संसाधनों की वास्तविक उपयोगिता को नहीं। यदि इन वनोपजों का वैज्ञानिक संग्रहण, गुणवत्तापूर्ण भंडारण, मूल्य संवर्धन और निर्यात बाजार को प्रोत्साहन मिले, तो संग्राहकों को भविष्य में बेहतर मूल्य प्राप्त हो सकते हैं।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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