परिसीमन: गणित का खेल या लोकतंत्र की नई पटकथा?

-सुभाष मिश्र
देश में परिसीमन की प्रक्रिया जिस तेजी से आगे बढ़ाई जा रही है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम केवल जनसंख्या के गणित के आधार पर लोकतंत्र को परिभाषित करने जा रहे हैं, या फिर उसके भीतर निहित संतुलन और न्याय के सिद्धांतों को भी उतना ही महत्व देंगे। केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि की दिशा में कदम बढ़ा रही है और संकेत हैं कि इसके लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन और परिसीमन आयोग से जुड़े विधेयक जल्द ही संसद में पेश किए जा सकते हैं। तकनीकी रूप से देखें तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अनुच्छेद 82 के तहत हर जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण होना ही चाहिए। लेकिन इस बार मामला केवल तकनीक का नहीं, राजनीति और नीति दोनों का है।
परिसीमन का तर्क सीधा है, जनसंख्या बढ़ी है, इसलिए प्रतिनिधित्व भी बढऩा चाहिए। आज एक सांसद औसतन 22 से 23 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिहाज से अत्यधिक है। सीटों की संख्या बढ़ाकर इसे लगभग 14-15 लाख तक लाने का प्रस्ताव सुनने में तार्किक लगता है। इससे प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के प्रति अधिक जवाबदेह हो सकेंगे, यह भी एक स्वाभाविक अपेक्षा है। लेकिन यही वह बिंदु है जहां से पूरी बहस एक नए मोड़ पर चली जाती है, क्योंकि यह प्रश्न उठने लगता है कि यह बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व किसका होगा और किसकी कीमत पर होगा।
यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की लोकसभा में हिस्सेदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी, जबकि दक्षिण भारत के वे राज्य जिन्होंने दशकों से जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है, जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना उनकी सापेक्ष हिस्सेदारी घट जाएगी। यही वह बिंदु है जहां से असंतोष की आवाजें उठ रही हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी जैसे नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि इस प्रक्रिया में राज्यों के साथ असमानता हुई, तो इसका विरोध होगा। यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि उस मूल प्रश्न से जुड़ा है कि क्या जनसंख्या नियंत्रण की सफलता अंतत: राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के रूप में सामने आएगी।
भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है, लेकिन उसका भौगोलिक विस्तार सीमित है। विकास की अधिकांश योजनाएँ अक्सर इसीलिए दबाव में आ जाती हैं क्योंकि संसाधनों पर जनसंख्या का बोझ लगातार बढ़ता जाता है। ऐसे में दशकों से सरकारें परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करती रही हैं। अब यदि वही देश यह संदेश देता दिखाई दे कि अधिक जनसंख्या का मतलब अधिक राजनीतिक शक्ति है, तो यह नीति और परिणाम के बीच एक विचित्र विरोधाभास पैदा करता है। यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हम अनजाने में यह संकेत दे रहे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण कोई लाभ नहीं, बल्कि एक तरह का राजनीतिक नुकसान है।
इसी के समानांतर महिला आरक्षण का मुद्दा भी इस पूरी बहस में जुड़ा हुआ है। केंद्र सरकार का तर्क है कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन आवश्यक है, क्योंकि नई सीटों के बिना इसे प्रभावी रूप से लागू करना संभव नहीं होगा। लेकिन विपक्ष, जिसमें राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे जैसे नेता शामिल हैं, यह सवाल उठा रहा है कि जब महिला आरक्षण पर व्यापक सहमति पहले से मौजूद है, तो इसे सीधे लागू करने के बजाय जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं से क्यों जोड़ा गया। इस जुड़ाव ने लोगों के मन में यह संदेह पैदा किया है कि कहीं महिला आरक्षण एक बड़े राजनीतिक पुनर्वितरण को स्वीकार्य बनाने का माध्यम तो नहीं बन रहा।
सरकार यह भी कह रही है कि सभी राज्यों की सीटों में समान अनुपात में वृद्धि होगी, जिससे किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। लेकिन यह तर्क उस वास्तविकता से टकराता है कि कुल हिस्सेदारी का अनुपात बदलना ही राजनीतिक प्रभाव को बदल देता है। यदि किसी राज्य की कुल सीटें बढ़ती भी हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसका प्रतिशत घटता है, तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से कम होता है। यही वह सूक्ष्म अंतर है जो इस बहस को और जटिल बना रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में एक और पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या केवल सीटों की संख्या बढ़ाने से लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार आ जाएगा। संसद के सत्रों की अवधि, सांसदों की उपस्थिति, विधायी कामकाज की गंभीरता और समय से पहले लोकसभाओं का भंग होना जैसे तथ्य यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल संख्या की नहीं, बल्कि कार्यप्रणाली की भी है। ऐसे में यह मान लेना कि अधिक सांसद होने से स्वत: बेहतर शासन हो जाएगा, एक अधूरा निष्कर्ष प्रतीत होता है।
परिसीमन अपने आप में कोई नई या असामान्य प्रक्रिया नहीं है, लेकिन इस बार इसकी टाइमिंग, इसके साथ जुड़े मुद्दे और इसे लागू करने की गति ने इसे एक संवेदनशील राजनीतिक प्रश्न बना दिया है। यह केवल सीटों का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन का पुनर्निर्धारण भी है। और शायद इसी कारण यह बहस केवल संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों, राजनीतिक दलों और आम नागरिकों के बीच भी गहराई से चल रही है।

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