संस्कृति बनाम मनोरंजन : सभ्यता का बौद्धिक संकट

-सुभाष मिश्र

भारतीय संस्कृति सदियों से अपनी समृद्धता, गहनता और विविधता के कारण विश्वभर में प्रतिष्ठित रही है। यह केवल जीवन जीने की शैली नहीं, बल्कि मानव चेतना की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों—संस्कार, मूल्य, मर्यादा और विवेक का समुच्चय है। इसके विपरीत, मनोरंजन मनुष्य के जीवन में श्रम और तनाव के बाद क्षणिक विश्रांति और प्रसन्नता का साधन है। संकट तब उत्पन्न होता है, जब मनोरंजन को ही संस्कृति का पर्याय मान लिया जाता है और दोनों के बीच का बुनियादी अंतर मिटने लगता है। आज यही संकट हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की केंद्रीय समस्या बन चुका है।
संस्कृति कभी भी मात्र मन बहलाने की प्रक्रिया नहीं रही। भारतीय मनीषा ने इन्द्रिय-शैथिल्य, कामुकता, अश्लीलता और मर्यादाहीन जीवन दृष्टि को कभी सांस्कृतिक आदर्श के रूप में स्वीकार नहीं किया। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए संयम और प्राकृतिक जीवन, तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए विषय वासनाओं से दूरी ये भारतीय सांस्कृतिक चेतना के मूल स्तंभ रहे हैं। तप, साधना, आत्मसंयम और विवेक ने ही इस संस्कृति को दीर्घायु और गतिशील बनाए रखा।
आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम हर सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधि को मनोरंजन के पैमाने पर तौलने लगे हैं। कोई आयोजन हो, सम्मेलन हो, उत्सव हो या विवाह—पहला प्रश्न यही होता है कि मज़ा आएगा या नहीं? हंसी, शोर, तालियां और दृश्यात्मक उत्तेजना यदि मौजूद है तो उसे सफल मान लिया जाता है और यदि विचार, गंभीरता या विमर्श है, तो उसे उबाऊ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यहीं से संस्कृति और मनोरंजन का फर्क धुंधला नहीं, बल्कि लगभग समाप्त हो जाता है।
यह प्रवृत्ति साहित्य और कला के क्षेत्र में विशेष रूप से दिखाई देती है। मंचीय कवि सम्मेलन, जो कभी सामाजिक-राजनीतिक चेतना के संवाहक थे, अब चुटकुलों और हल्के हास्य के अखाड़े बनते जा रहे हैं। गंभीर कविता, विचारप्रधान वक्तव्य और असहज प्रश्न उठाने वाले रचनाकार इंटरटेनिंग न होने के कारण हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। साहित्य उत्सव और पुस्तक मेले अब विमर्श के नहीं, बल्कि इवेंट मैनेजमेंट और ब्रांडिंग के मंच बन चुके हैं। यह परिवर्तन केवल स्वाद का नहीं, बल्कि बौद्धिक अनुशासन के क्षरण का संकेत है।
इस सांस्कृतिक बदलाव को समझने के लिए क्रिकेट का उदाहरण प्रासंगिक है। कभी पांच दिन का टेस्ट मैच धैर्य, रणनीति और तकनीक की परीक्षा हुआ करता था—एक प्रकार का बौद्धिक अनुशासन। फिर वनडे आया और अब टी-20 का दौर है—तेज़, चमकदार और शोरपूर्ण। टी-20 अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब उसी को क्रिकेट का अंतिम और श्रेष्ठ रूप मान लिया जाता है। आज यही भूल हम संस्कृति के साथ कर रहे हैं। हम गहराई की जगह गति, विचार की जगह दृश्य और संवाद की जगह शोर को चुन रहे हैं—एक तरह की टी-20 संस्कृति में जी रहे हैं।
मनोरंजन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। भारतीय सभ्यता के आरंभिक काल से ही गायन-वादन, नृत्य, खेल, मेले, उत्सव, सत्संग और प्रतियोगिताएं सामूहिक आनंद और मानसिक ताजगी के साधन रही हैं। वेद, पुराण और परंपरागत कथाएँ केवल ज्ञान का स्रोत नहीं थीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और आनंद का माध्यम भी थीं। किंतु भारतीय संस्कृति ने मनोरंजन को सदैव मर्यादा और नैतिकता की सीमाओं में रखा। जो साधन समाज को पतन की ओर ले गए जैसे द्यूत क्रीड़ा, हिंसक या वासना-प्रधान गतिविधियां उन्हें अस्वीकार कर दिया गया।
आज का संकट यह है कि मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता, नग्नता, हिंसा, जुआ, मदिरापान और फूहड़ता को सामान्य बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ किया है। लोकप्रियता को गुणवत्ता का पर्याय बना दिया गया है। यह लोकतंत्रीकरण नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक अवमूल्यन है। प्रश्न यह है कि क्या क्षणिक उत्तेजना देने वाले दृश्य और अनुभव मनुष्य को स्थायी आनंद, मानसिक शांति और संतुलन दे सकते हैं? उत्तर स्पष्ट है नहीं। ऐसे साधन मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक विकृति और सामाजिक विघटन के उपकरण बनते हैं।
समाधान संस्कृति-विरोधी नहीं, बल्कि संस्कृति-अनुकूल मनोरंजन में है। सत्साहित्य, शास्त्रीय और लोक कलाएँ, नैतिक गीत-संगीत, खेलकूद, योग, सामूहिक उत्सव और संवाद—ये मनोरंजन के साथ-साथ चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। मनोरंजन को संस्कृति के अधीन रहना चाहिए न कि संस्कृति को मनोरंजन का अधीन बना दिया जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संस्कृति को पुन: गंभीर विमर्श, आत्ममंथन और विवेक की प्रक्रिया के रूप में देखें। मनोरंजन जीवन की आवश्यकता है, संस्कृति हमारी पहचान। दोनों का संतुलन ही स्वस्थ समाज की कुंजी है। क्योंकि जब संस्कृति केवल मनोरंजन बन जाती है, तब सभ्यता केवल भीड़ में बदल जाती है और कोई भी सभ्यता तालियों के शोर पर नहीं, विचारों की गहराई पर टिकती है।

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