धर्मांतरण: आस्था, प्रलोभन या संगठित तंत्र?

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण का प्रश्न कोई नया विषय नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में सामने आए तथ्यों ने इस बहस को एक बार फिर गंभीर मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस बार मुद्दा किसी एक गांव, किसी चर्च या किसी प्रार्थना सभा तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि जांच एजेंसियों के दावे एक ऐसे संगठित नेटवर्क की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसमें धर्म नहीं बल्कि मनुष्य को टारगेट की तरह देखा गया। यही बात इस पूरे प्रकरण को सामान्य आस्था आधारित गतिविधियों से अलग करती है और उसे सामाजिक-राजनीतिक चिंता का विषय बनाती है।
पुलिस की जांच के अनुसार, जिस मॉडल पर यह कथित नेटवर्क काम कर रहा था, उसका केंद्र समाज के सबसे कमजोर तबके थे—अनाथ बच्चे, विधवा महिलाएं, भिखारी, फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले लोग। ये वे वर्ग हैं जिनकी सामाजिक सुरक्षा पहले से ही कमजोर है, जिनकी जरूरतें तत्काल हैं और जिनके पास विकल्प सीमित हैं। ऐसे में यदि किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि सहायता, संरक्षण या बेहतर जीवन के वादे के साथ सामने आती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह आस्था का विस्तार है या प्रलोभन के जरिए पहचान बदलने की कोशिश। आस्था का विस्तार कभी भी प्रलोभन को उपकरण नहीं बनाता है। गरीब व्यक्ति की प्राथमिकता हमेशा भूख होती है धर्म नहीं और जो उसकी प्राथमिकता पूरी करता है, वह उसकी बात मानता जरूर है। खासकर ऐसी बात जिसमें उसे कुछ भी देना नहीं है। गरीब व्यक्ति की प्राथमिकता और उसकी मजबूरी को इस तरह के संगठन भली-भांति समझते हैं। ऐसे संगठन मजबूरी को प्रलोभन के रास्ते अपने हित में उपयोग करते हैं।
राजनांदगांव जिले के धर्मापुर गांव में कथित रूप से बनाए गए आश्रम और चर्च को लेकर पुलिस का दावा है कि वहीं से प्रदेश में गतिविधियों की मॉनिटरिंग, टारगेट तय करने और योजना बनाने का काम होता था। डिजिटल माध्यमों से नेटवर्क को संचालित किए जाने की बात यह संकेत देती है कि मामला भावनात्मक या व्यक्तिगत स्तर का नहीं, बल्कि सुनियोजित और प्रोफेशनल ढांचे का हो सकता है। इसी संदर्भ में डेविड चाको के खिलाफ छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 की धाराओं के तहत मामला दर्ज होना इस बहस को और गहराई देता है।
छत्तीसगढ़ का सामाजिक ताना-बाना बेहद संवेदनशील है। यहां आदिवासी समाज की सांस्कृतिक जड़ें गहरी है—देवगुड़ी, प्रकृति पूजा, सामुदायिक परंपराएं और पूर्वजों की आस्था इस पहचान का मूल हैं। सरगुजा में घर वापसी अभियानों से लेकर बस्तर में देवगुड़ी और अंतिम संस्कार को लेकर हुए विवाद, कांकेर में मुखिया की मृत्यु के बाद उपजा टकराव—ये सभी घटनाएं बताती हैं कि धर्मांतरण का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता से भी जुड़ा हुआ है। जब किसी गांव या समुदाय में कन्वर्टेड और गैर-कन्वर्टेड लोगों के बीच टकराव की स्थिति बनती है तो उसका असर केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और भरोसे को प्रभावित करता है।
यह भी एक तथ्य है कि छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों की उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में कई संस्थानों ने सकारात्मक योगदान दिया है लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सेवा और आस्था की रेखा धुंधली हो जाती है, और आरोप यह लगने लगते हैं कि जरूरतमंदों की मजबूरी को पहचान बदलने के औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। दुर्ग में ननों की गिरफ्तारी और उसके बाद खड़ी हुई राजनीतिक बहस ने यह साफ कर दिया कि यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक या कानूनी नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी कारण बनता जा रहा है।
इस पूरे विमर्श में सबसे अहम सवाल यही है क्या धर्मांतरण व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा का परिणाम है, या फिर सामाजिक-आर्थिक दबाव और प्रलोभन का? भारतीय संविधान हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन वही संविधान जबरन या प्रलोभन के जरिए धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता। छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम इसी संतुलन को बनाए रखने का प्रयास है।
आवश्यकता इस बात की है कि कानून का उपयोग न तो आस्था को दबाने के लिए हो और न ही उसकी आड़ में किसी संगठित एजेंडे को छिपाने के लिए। राज्य के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है। जांच निष्पक्ष होनी चाहिए, तथ्य सामने आने चाहिए और दोषी चाहे किसी भी पृष्ठभूमि से हों, कानून के दायरे में आने चाहिए। साथ ही राज्य और समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि कमजोर वर्गों को इतना असहाय क्यों छोड़ दिया गया कि कोई भी संगठन उन्हें आसानी से धर्म परिवर्तन के लिए राजी कर ले । गरीब आदिवासियों के लिए सबसे प्रमुख परेशानी अभाव और स्वास्थ्य सुविधा है।शिक्षा उनकी प्राथमिकता में नहीं है कोई शिक्षा का लालच देकर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। लेकिन इलाज के लिए सुविधाओं का अभाव और गरीबी दो बड़े कारण हैं। यदि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी, तो न प्रलोभन काम करेगा और न ही आस्था को लेकर टकराव।
धर्म आस्था का विषय है, बाजार या रणनीति का नहीं। जब आस्था इंसान को जोडऩे की बजाय समाज को बांटने लगे, तब सवाल उठना जरूरी है। छत्तीसगढ़ के लिए यह समय आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर एक संतुलित, संवेदनशील और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने का है ताकि न तो आस्था आहत हो और न ही समाज।

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