0- याद आ रही मिट्टी आधारित भवन प्रणाली
राजकुमार मल | भाटापारा
आधुनिक निर्माण सामग्री ने भवनों को आकर्षक और मजबूत जरूर बनाया है, लेकिन इसके साथ ही प्राकृतिक ताप संतुलन भी बिगड़ता जा रहा है। ग्रेनाइट, सेरेमिक टाईल्स, कांक्रीट, लोहा और कांच के बढ़ते उपयोग ने घरों के भीतर गर्मी को कैद करना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि अब दिन ही नहीं, रातें भी पहले की तुलना में ज्यादा गर्म महसूस होने लगी हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे मकान और मिट्टी के फर्श आज भी प्राकृतिक रूप से ठंडक बनाए रखने में सक्षम हैं। जलवायु परिवर्तन, हीट वेव और लगातार बढ़ते तापमान के दौर में पारंपरिक मिट्टी आधारित भवन प्रणाली फिर से चर्चा में आ गई है।
ऊष्मा को तेजी से सोखते हैं आधुनिक निर्माण सामग्री
सेरेमिक टाईल्स, मार्बल और कांक्रीट सूर्य की गर्मी को तेजी से अवशोषित करते हैं और लंबे समय तक उसे अपने भीतर संचित रखते हैं। खासकर गहरे रंग की टाईल्स और कम वेंटिलेशन वाले भवनों में यह प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है। कांच की खिड़कियां और लोहे का उपयोग गर्मी को बाहर निकलने नहीं देता, जिससे घरों के अंदर “हीट ट्रैप” जैसी स्थिति बन जाती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि दिनभर जमा हुई गर्मी रात में धीरे-धीरे बाहर निकलती है। यही कारण है कि ऐसे भवनों में देर रात तक गर्मी बनी रहती है।
तेजी से बढ़ रहा “अर्बन हीट आईलैंड” प्रभाव
सीमेंट-कांक्रीट के भवन, डामर की सड़कें, कम हरियाली, एयर कंडीशनर और वाहनों से निकलने वाली गर्मी मिलकर शहरों में “अर्बन हीट आईलैंड” की स्थिति पैदा कर रहे हैं। इससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा बढ़ रहा है।
मिट्टी है प्राकृतिक इंसुलेटर
विशेषज्ञों के मुताबिक मिट्टी एक प्राकृतिक इंसुलेटर का काम करती है। मिट्टी की मोटी दीवारें बाहरी गर्मी को तेजी से अंदर नहीं आने देतीं। पुराने समय में मिट्टी के घरों में ऊंची छत, लकड़ी की खिड़कियां और प्राकृतिक वेंटिलेशन का विशेष ध्यान रखा जाता था। इससे घरों के भीतर तापमान संतुलित बना रहता था।
मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म छिद्र लंबे समय तक नमी बनाए रखते हैं। तापमान बढ़ने पर यही नमी धीरे-धीरे वाष्पित होती है, जिससे प्राकृतिक ठंडक महसूस होती है। यही प्रक्रिया आसपास के वातावरण को भी ठंडा बनाए रखने में मदद करती है।
प्रकृति आधारित निर्माण ही भविष्य का विकल्प
अजीत विलियम्स का कहना है कि बढ़ती गर्मी और हीट वेव की परिस्थितियों में प्रकृति आधारित निर्माण प्रणाली ही भविष्य का समाधान बन सकती है। यदि भवन निर्माण में स्थानीय सामग्री, हरियाली, प्राकृतिक वेंटिलेशन और वृक्ष आधारित डिजाइन को बढ़ावा दिया जाए, तो अर्बन हीट आईलैंड के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि नेचर बेस्ड हाउसिंग अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में एक जरूरी आवश्यकता बनती जा रही है।
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