उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद अंतर्गत खड्डा नगर पंचायत में स्वच्छता व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और करोड़ों की लागत से बना मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी यानी एमआरएफ सिस्टम सफेद हाथी साबित हो रहा है। शहर से निकलने वाले कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करने के बजाय उसे खुलेआम सड़कों के किनारे डंप किया जा रहा है जिससे पूरा इलाका कूड़े के बड़े ढेर में तब्दील हो चुका है। कागजों पर सक्रिय दिखाए जा रहे प्लांट की जमीनी हकीकत यह है कि न तो कचरे का पृथक्करण हो रहा है और न ही प्रबंधन। डंप किए गए कूड़े से उठने वाली भीषण दुर्गंध और जहरीली गैसों ने स्थानीय निवासियों और राहगीरों का जीना दूभर कर दिया है जिससे प्रशासन के स्वच्छता के दावों की पोल खुल गई है।
कचरे में लगाई जा रही आग और बीमारियों का बढ़ा प्रकोप
कचरा प्रबंधन में नाकाम प्रशासन अब निस्तारण के नाम पर कूड़े के ढेरों में सीधे आग लगा रहा है जिससे निकलने वाला जहरीला धुआं और मीथेन गैस हवा को प्रदूषित कर रही है। इस दमघोंटू वातावरण के कारण बच्चों और बुजुर्गों में सांस संबंधी बीमारियों, एलर्जी और फेफड़ों के संक्रमण की शिकायतें तेजी से बढ़ने लगी हैं। स्थानीय दुकानदारों और निवासियों द्वारा बार-बार की गई शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं। शहर के मुख्य मार्गों पर जमा यह गंदगी न केवल प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन को ठेंगा दिखा रही है बल्कि किसी बड़ी महामारी को खुला निमंत्रण भी दे रही है।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी योजनाएं और प्रशासनिक उदासीनता
करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद जनता को स्वच्छ वातावरण न मिलना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। एमआरएफ प्लांट का केवल फाइलों में संचालित होना यह साबित करता है कि सरकारी धन का बंदरबांट कर जनता को मौत के मुहाने पर छोड़ दिया गया है। वैज्ञानिक निस्तारण की अनुपस्थिति ने कचरे को एक बड़े संकट में बदल दिया है जिसके समाधान के लिए फिलहाल कोई ठोस कार्ययोजना नजर नहीं आती। स्थानीय लोगों ने अब शासन से हस्तक्षेप की मांग की है ताकि इस जहरीले माहौल से निजात मिल सके और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सके।