-सुभाष मिश्र
बस्तर लंबे समय तक नक्सलवाद, हिंसा और सुरक्षा अभियानों की वजह से राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना रहा। वर्षों तक सरकारों की प्राथमिकता सुरक्षा व्यवस्था रही, लेकिन अब जब नक्सल प्रभाव सिमटता दिखाई दे रहा है तो बस्तर के सामने एक नया और कहीं अधिक जटिल सवाल खड़ा है, विकास का। सवाल यह नहीं है कि बस्तर का विकास होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि बस्तर का विकास किस मॉडल पर होगा और उसमें वहां के आदिवासियों की भूमिका क्या होगी।
यही वजह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स गठित की है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में लागू पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ विकास की संभावनाओं को तलाशना है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक अलग समिति भी बनाई गई है, जिसमें वरिष्ठ अधिकारी, जनजातीय मामलों के विशेषज्ञ, जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। यह समिति जमीन पर हो रहे कामों की निगरानी करेगी, लंबित मामलों की समीक्षा करेगी और आगे की रणनीति तैयार करेगी।
दरअसल, बस्तर की परिस्थितियां देश के अन्य हिस्सों से अलग हैं। यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है। इसका मतलब यह है कि यहां विकास की कोई भी योजना केवल सरकारी आदेश से लागू नहीं की जा सकती। यहां पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम जैसे विशेष कानून लागू हैं, जो आदिवासी समुदायों को जल, जंगल और जमीन पर अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी प्रदान करते हैं।
पेसा यानी पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम 1996 का मूल उद्देश्य यह था कि आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को वास्तविक शक्ति मिले। ग्राम सभा को केवल एक औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय शासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया। खनन, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, लघु वनोपज और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग जैसे मामलों में ग्राम सभा की भूमिका सुनिश्चित की गई। यह कानून इस विचार पर आधारित था कि जिन लोगों का जीवन जंगल और जमीन से जुड़ा है, उनके भविष्य से जुड़े निर्णय भी उनकी भागीदारी से ही होने चाहिए।
इसी तरह वर्ष 2006 में वन अधिकार अधिनियम लाया गया। इसके पीछे यह स्वीकार किया गया कि वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और पारंपरिक वनवासी दशकों से अपने अधिकारों से वंचित रहे हैं। इस कानून ने व्यक्तिगत वन अधिकार, सामुदायिक वन अधिकार और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार जैसी व्यवस्थाएं दीं। इसका उद्देश्य जंगलों को निजी संपत्ति बनाना नहीं, बल्कि उन समुदायों को कानूनी पहचान देना था, जो पीढिय़ों से वहां रह रहे थे और जंगलों पर निर्भर थे। हालांकि इन दोनों कानूनों के क्रियान्वयन मं अनेक चुनौतियां सामने आईं। बड़ी संख्या में वन अधिकार दावे लंबित हैं। कई गांवों की सीमाएं और वन भूमि का रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है। वन विभाग, राजस्व विभाग और पंचायत संस्थाओं के बीच अधिकारों को लेकर मतभेद भी देखने को मिलते हैं। कई बार विकास परियोजनाएं ग्राम सभाओं की सहमति और अधिकारों से जुड़े सवालों में उलझ जाती हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी भी एक बड़ी समस्या है।
सरकार का मानना है कि नई टास्क फोर्स इन समस्याओं का समाधान तलाशेगी। मैपिंग के माध्यम से वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा, लंबित दावों की समीक्षा होगी और जिलों को कार्ययोजना उपलब्ध कराई जाएगी। यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से लागू होती है तो ग्राम सभाओं की निर्णय क्षमता मजबूत हो सकती है, पात्र वनवासियों को अधिकार पत्र मिलने की गति बढ़ सकती है और सामुदायिक वन संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव हो सकता है। इससे ग्रामीणों की आय बढऩे और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास योजनाएं तैयार होने की संभावना भी है।
इस पूरी प्रक्रिया के साथ कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हुए हैं। क्या वन अधिकारों के विस्तार से जंगलों पर दबाव बढ़ेगा? क्या विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहेगा? क्या ग्राम सभाओं को वास्तव में निर्णय लेने की शक्ति मिलेगी या वे केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी? इन सवालों के जवाब भविष्य की नीतियों और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेंगे।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर मतभेद स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस इसे एक दिखावटी पहल बता रही है, जबकि सरकार का दावा है कि वह आदिवासी अधिकारों को जमीन पर उतारने का गंभीर प्रयास कर रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बस्तर के लाखों लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य का संबंध इन कानूनों से जुड़ा हुआ है।
वास्तव में बस्तर एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। लंबे समय तक यहां विकास और अधिकारों को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि सच्चाई यह है कि टिकाऊ विकास वही होगा जो स्थानीय समुदायों की भागीदारी, उनकी सहमति और उनके अधिकारों का सम्मान करते हुए आगे बढ़े। सड़क, स्कूल, अस्पताल और रोजगार जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी यह भी है कि आदिवासी समाज अपने संसाधनों और निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी महसूस करे।
नक्सलवाद के बाद का बस्तर केवल सुरक्षा का विषय नहीं रह गया है। अब असली चुनौती यह साबित करने की है कि लोकतंत्र, विकास और आदिवासी अधिकार साथ-साथ चल सकते हैं। यदि नई टास्क फोर्स इस संतुलन को स्थापित करने में सफल होती है, तो यह केवल बस्तर ही नहीं बल्कि देश के सभी अनुसूचित क्षेत्रों के लिए एक मॉडल बन सकती है। लेकिन यदि यह पहल केवल बैठकों और रिपोर्टों तक सीमित रह गई, तो एक और अवसर हाथ से निकल जाएगा। बस्तर को आज घोषणाओं की नहीं, जमीन पर दिखने वाले बदलाव की जरूरत है। यही इस पूरी पहल की सबसे बड़ी कसौटी होगी।