–सुभाष मिश्र
सोशल मीडिया, सत्ता की असहजता और निजता पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक
दुष्यंत कुमार का शेर है—
‘यह मत कहो कि बादलों में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।’
आज के भारत में यह पंक्ति सिर्फ शेर नहीं, बल्कि सत्ता और समाज ,दोनों के व्यवहार पर तीखी टिप्पणी बन चुकी है। जैसे ही कोई सवाल करता है, आलोचना करता है या व्यंग्य करता है, तुरंत उसे ‘व्यक्तिगत हमला’, ‘राष्ट्रविरोध’, या ‘कानून-व्यवस्था के लिए खतरा’ बताने की होड़ मच जाती है। अचरज और दुखद बात तो यह है कि इसमें स्थानीय प्रशासन और पुलिस भी शामिल हो जाती है। खासकर तब, जब यह सब सोशल मीडिया पर कहा गया हो।
ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट के हालिया दो फैसले बेहद अहम हैं। अलग-अलग मामलों में दिए गए ये फैसले एक ही सवाल की ओर इशारा करते हैं—क्या लोकतंत्र में बोलना अपराध है? और क्या तकनीक के नाम पर नागरिकों की निजता की कीमत वसूली जा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट की उन गाइडलाइंस को बरकरार रखा है, जिनमें साफ कहा गया था कि सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर सीधे गिरफ्तारी नहीं हो सकती। पुलिस को पहले यह जांच करनी होगी कि शिकायतकर्ता वास्तव में कानूनन पीडि़त है या नहीं, शिकायत में कोई प्रथम दृष्टया अपराध बनता भी है या नहीं, और क्या वह पोस्ट हिंसा, नफरत या सार्वजनिक अव्यवस्था को भडक़ाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि कड़ी, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक राजनीतिक भाषा अपने-आप में अपराध नहीं है। आपराधिक कानून का इस्तेमाल तभी हो सकता है, जब उससे सार्वजनिक व्यवस्था को वास्तविक खतरा हो। तेलंगाना हाई कोर्ट ने इससे पहले राज्य की कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री की आलोचना को लेकर दर्ज मामलों को रद्द करते हुए कहा था कि ये पोस्ट राजनीतिक आलोचना और व्यंग्य हैं, न कि मानहानि या राजद्रोह। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—अनुच्छेद 19(1)(ए) के दायरे में पूरी तरह संरक्षित हैं। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए राहत है, जो सत्ता से सवाल पूछने की कीमत पुलिस थाने और अदालतों के चक्कर लगाकर चुकाते रहे हैं।
दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने मेटा और व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने साफ कहा कि तकनीकी कंपनियां भारत में रहकर नागरिकों की निजता से खिलवाड़ नहीं कर सकतीं।
मुख्य न्यायाधीश ने यहां तक कह दिया कि ‘अगर आप हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते, तो भारत छोड़ दें।’ अदालत ने सवाल उठाया कि क्या आम यूजर इतनी जटिल प्राइवेसी पॉलिसी समझ सकता है? क्या दबदबे की स्थिति में दी गई सहमति वास्तव में सहमति मानी जा सकती है?
और क्या यूजर डेटा का व्यावसायिक इस्तेमाल निजता का उल्लंघन नहीं है?
चीफ जस्टिस ने अपने निजी अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि स्वास्थ्य से जुड़े मैसेज के बाद विज्ञापनों का दिखना इस बात का संकेत है कि डेटा का किस तरह इस्तेमाल हो रहा है। उन्होंने इसे ‘डेटा शेयरिंग के नाम पर सभ्य चोरी’ बताया।
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि सरकार की आलोचना अपराध नहीं है, दूसरी तरफ वह यह भी स्पष्ट करता है कि निजता लोकतंत्र की बुनियाद है, जिसे बाजार या तकनीक के हवाले नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता है। हकीकत यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे निर्देश दे चुका है, इसके बावजूद अलग-अलग राज्यों में चाहे केंद्र हो या राज्य—सत्ता की आलोचना करने वालों पर मुकदमे दर्ज होते रहे हैं। कानून की आड़ में असहमति को कुचलने की प्रवृत्ति आज भी जि़ंदा है। उधर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी दूध के धुले नहीं हैं। डेटा लीक, साइबर क्राइम, अनचाहे विज्ञापन, और एल्गोरिदम के ज़रिए सोच को प्रभावित करने का खेल लगातार जारी है। न कोई संपादक, न कोई जवाबदेही ,सिर्फ मुनाफा।
आज न सत्ता को निंदक पसंद है, न समाज को। आलोचना से असहजता बढ़ गई है। हर सवाल दुश्मनी लगता है। जबकि लोकतंत्र सवालों से ही मजबूत होता है, चुप्पी से नहीं। आलोचना व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि नागरिक का हक़ है। और यही हक़ बोलने का भी, और निजता का भी, इन दोनों फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया है।
अब सवाल अदालत से ज्यादा सरकारों, पुलिस और तकनीकी कंपनियों से है
क्या वे इस याददिहानी को सच में मानेंगे, या फिर अगली गिरफ्तारी और अगला डेटा लीक हमारा इंतज़ार कर रहा है?