PMKVY: करोड़ों खर्च, लक्ष्य अधूरे – CAG की रिपोर्ट में भारी अनियमितताएं उजागर

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना रही है, जिसका उद्देश्य युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार के योग्य बनाना था। वर्ष 2015 में शुरू हुई इस योजना के तीन चरणों PMKVY 1.0, 2.0 और 3.0 के अंतर्गत अब तक लाखों युवाओं को प्रशिक्षण देने का दावा किया गया और इस पर करीब 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई। हालांकि, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने इस योजना की कार्यप्रणाली, वित्तीय प्रबंधन और क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दिसंबर 2025 में संसद में पेश CAG की रिपोर्ट संख्या 20 ऑफ 2025 में कहा गया है कि PMKVY अपने निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में काफी हद तक असफल रही। रिपोर्ट के अनुसार, योजना के संचालन में व्यापक अनियमितताएं, फंड के दुरुपयोग और डेटा प्रबंधन में भारी खामियां सामने आई हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब इतने बड़े खुलासे के बावजूद मुख्यधारा की मीडिया में इस मुद्दे पर लगभग चुप्पी देखने को मिलती है।

CAG की ऑडिट रिपोर्ट में वर्ष 2015 से 2022 के बीच PMKVY के पहले तीन चरणों की जांच की गई। इसमें कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय, नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन और असम सहित आठ राज्यों के कार्यान्वयन की समीक्षा की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, योजना के तहत पंजीकृत 95.90 लाख लाभार्थियों में से करीब 90.66 लाख यानी लगभग 94 प्रतिशत के बैंक खाते से जुड़ी जानकारी या तो उपलब्ध नहीं थी, अधूरी थी या अमान्य पाई गई। इससे सीधे तौर पर यह संदेह पैदा होता है कि लाभार्थियों तक धन पहुंचा भी या नहीं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्किल इंडिया पोर्टल पर उपलब्ध डेटा की विश्वसनीयता संदिग्ध रही। प्रशिक्षण से जुड़े फोटो और वीडियो साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की कोई स्पष्ट नीति नहीं थी। कई मामलों में उम्मीदवारों को आयु, शैक्षणिक योग्यता और कार्य अनुभव जैसे मानकों का पालन किए बिना ही नामांकित कर लिया गया। योजना का लक्ष्य बेरोजगार युवाओं और स्कूल छोड़ चुके छात्रों को लाभ पहुंचाना था, लेकिन उनके सत्यापन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई।

प्लेसमेंट के मोर्चे पर भी योजना का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग और विशेष परियोजनाओं के तहत प्रमाणित 56.14 लाख उम्मीदवारों में से केवल 23.18 लाख यानी करीब 41 प्रतिशत को ही रोजगार मिल पाया। केरल में गलत प्लेसमेंट दस्तावेज प्रस्तुत करने का मामला सामने आने पर 22.33 लाख रुपये की वसूली की गई और संबंधित एजेंसी को ब्लैकलिस्ट किया गया। इसके अलावा, रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग योजना के तहत एजेंसियों के चयन, प्रस्तावों की जांच और निगरानी में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। कई एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज अविश्वसनीय पाए गए।

वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी CAG ने कड़ी टिप्पणी की है। रिपोर्ट के अनुसार, फंड जारी करने में देरी, राज्य घटक में राशि का उपयोग न होना और प्राप्ति एवं भुगतान नियमों का उल्लंघन किया गया। PMKVY 1.0 के दौरान NSDC द्वारा 24.13 करोड़ रुपये प्रशासनिक खर्च के रूप में अधिक वसूले गए, जबकि मंत्रालय को 12.16 करोड़ रुपये का ब्याज NSDC से वापस लेना पड़ा। गलत आकलन और देरी से हुए ट्रांसफर के कारण भारत की संचित निधि पर कुल 222.63 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। कुछ स्वतंत्र आकलनों में इस पूरे मामले को 14 हजार करोड़ रुपये तक के संभावित घोटाले के रूप में भी देखा जा रहा है।

CAG रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि इन अनियमितताओं के पीछे केवल व्यक्तिगत स्तर की गड़बड़ियां नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता जिम्मेदार रही। योजना तैयार करते समय सूक्ष्म स्तर पर कौशल की मांग और आपूर्ति का आकलन नहीं किया गया। न तो कोई दीर्घकालिक राष्ट्रीय कौशल विकास रणनीति बनाई गई और न ही केंद्र व राज्य सरकारों तथा विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय प्रभावी रहा। निगरानी और नियंत्रण की कमजोर व्यवस्था ने फर्जी नामांकन और गलत प्लेसमेंट दावों को बढ़ावा दिया।

इतने गंभीर खुलासों के बावजूद, मुख्यधारा की मीडिया द्वारा इस मुद्दे पर सीमित कवरेज देना लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। कुछ स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया चर्चाओं में इसे बड़े घोटाले के रूप में उठाया गया, लेकिन बड़े मीडिया संस्थानों की खामोशी कई तरह के संदेह को जन्म देती है। राजनीतिक दबाव, सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता या नीतिगत मुद्दों पर आत्म-सेंसरशिप को इसकी संभावित वजह माना जा रहा है।

PMKVY पर CAG की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि यदि समय रहते सख्त निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई, तो ‘स्किल इंडिया’ जैसे कार्यक्रम केवल कागजी दावों तक सीमित रह जाएंगे। युवाओं के भविष्य से जुड़ी इस योजना में सामने आई खामियों पर खुली बहस और ठोस सुधार जरूरी हैं। सरकार को CAG की सिफारिशों पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करनी होगी, ताकि कौशल विकास वास्तव में रोजगार का माध्यम बन सके, न कि एक और असफल सरकारी प्रयोग।

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