पूजा स्थल में सुविधाओं के लिए दान

-सुभाष मिश्र

यह बाजार का समय है और बाजार का एक सीधा-सा नियम है कि जिसके पास परचेजिंग पावर है, वह अपनी क्षमता के अनुसार सुविधाएं खरीद सकता है। आपके पास पैसा है तो हवाई जहाज में इकॉनमी की जगह बिजनेस क्लास में यात्रा कर सकते हैं, ट्रेन में सामान्य श्रेणी की जगह प्रथम श्रेणी में जा सकते हैं, बस की जगह अपनी महंगी गाड़ी से चल सकते हैं और बहुत ज्यादा पैसा है तो चार्टर्ड विमान भी ले सकते हैं। होटल में एक सामान्य कमरा लेने के बजाय आलीशान सुइट बुक कर सकते हैं और सामर्थ्य हो तो पूरा होटल अपने लिए आरक्षित कर सकते हैं। सिनेमा में एक टिकट खरीदने के बजाय पूरा हॉल बुक कर सकते हैं।
बाजार में यह सब असामान्य नहीं है, क्योंकि बाजार ने कभी बराबरी का दावा भी नहीं किया। वहां जिसके पास जितना पैसा है, उसके पास उतने विकल्प और उतनी सुविधाएं हैं, लेकिन धर्म और ईश्वर को हमने हमेशा बाजार से अलग माना है। हमें बताया गया कि ईश्वर के सामने राजा और रंक बराबर हैं, अमीर और गरीब बराबर हैं। कबीर ने कहा था कि ईश्वर को बाहर खोजने की जरूरत नहीं, वह मनुष्य के भीतर और उसके आसपास ही मौजूद है। हमारी संत परंपरा भी लगातार यही कहती रही कि हरि को भजे सो हरि का होई। यानी ईश्वर तक पहुंचने के लिए आपकी जेब में कितना पैसा है, इससे कोई फर्क नहीं पडऩा चाहिए। ईश्वर सबका है और अगर ईश्वर सबका है तो उसके दर्शन का अधिकार भी सबका बराबर होना चाहिए।
इसके बावजूद धीरे-धीरे हमारे धार्मिक स्थलों में भी बाजार की यह व्यवस्था प्रवेश करती दिखाई देती है। देश के अनेक बड़े मंदिरों में दर्शन के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। सामान्य दर्शन की लाइन अलग है, विशेष दर्शन की अलग। कहीं टिकट है, कहीं पास है, कहीं प्रोटोकॉल है और कहीं बड़ा दान देने वालों के लिए अलग सुविधा है। आम आदमी कई-कई घंटे कतार में खड़ा रहता है, लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति, विशेष पास वाला श्रद्धालु या बड़ा दानदाता उससे पहले भगवान के सामने पहुंच जाता है। कई धार्मिक संस्थानों ने इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश भी की है, लेकिन यह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है कि जिस ईश्वर के बारे में हम कहते हैं कि उसकी नजर में सब बराबर हैं, उसके दर्शन की व्यवस्था में यह आर्थिक और सामाजिक भेदभाव क्यों है? क्या पैसा बाजार में ही नहीं, भगवान तक पहुंचने के रास्ते को भी छोटा कर सकता है?
तिरुपति बालाजी मंदिर में एक ही दिन में लगभग 97 करोड़ रुपये का दान मिलने की खबर इस सवाल को और गंभीर बनाती है। नई डोनर पॉलिसी लागू होने से ठीक पहले हजारों लोगों ने बड़ी रकम दान की। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह बताया गया कि पुरानी व्यवस्था में दानदाताओं को मिलने वाली आजीवन सुविधाएं नई नीति में सीमित होने वाली थीं। नई व्यवस्था लागू होने से पहले दान करने वाले पुराने नियमों के तहत मिलने वाली सुविधाओं के पात्र बने रहेंगे, इसलिए नई नीति लागू होने से ठीक पहले दान देने वालों की संख्या अचानक बढ़ गई और मंदिर को एक ही दिन में 96.98 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड दान प्राप्त हुआ। अब इसमें किसी की आस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लोग अपनी श्रद्धा और सामथ्र्य के अनुसार दान देते हैं और उन्हें इसका पूरा अधिकार है। जिसने एक रुपया दिया, उसकी श्रद्धा भी महत्वपूर्ण है और जिसने एक करोड़ रुपये दिए, उसके योगदान का भी सम्मान होना चाहिए। सवाल तब उठता है जब दान के साथ सुविधाओं की एक पूरी सूची जुड़ जाती है और दान की राशि के आधार पर यह तय होने लगता है कि किसे कैसी सुविधा मिलेगी।
तिरुपति की व्यवस्था में बड़े दानदाताओं को विशेष प्रवेश दर्शन, कुछ विशेष धार्मिक सेवाओं में भाग लेने का अवसर, आवास और विभिन्न प्रकार के स्मृति चिन्ह जैसी सुविधाएं मिलती रही हैं। नई नीति में इन सुविधाओं को सीमित जरूर किया गया है और आजीवन मिलने वाले कई लाभ निश्चित अवधि के लिए होंगे, लेकिन मूल सवाल अपनी जगह बना हुआ है। अगर एक सामान्य श्रद्धालु घंटों लाइन में खड़ा होकर भगवान के दर्शन करता है और एक बड़ा दानदाता विशेष व्यवस्था के माध्यम से अपेक्षाकृत आसानी से दर्शन कर सकता है तो इसे केवल प्रशासनिक सुविधा कहकर क्या हम उस सामाजिक सवाल से बच सकते हैं जो इसके भीतर छिपा हुआ है? क्या दान इसलिए दिया जा रहा है कि धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सहयोग हो या दान के साथ मिलने वाली सुविधाएं भी उसका एक आकर्षण बन रही हैं? अगर नई नीति लागू होने से ठीक पहले पुराने आजीवन लाभ सुरक्षित करने के लिए दान की इतनी बड़ी राशि एक साथ आती है तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यहां केवल श्रद्धा काम कर रही थी या सुविधा भी दान की प्रेरणा बन रही थी? दान हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। हमारे यहां दान को त्याग से जोड़ा गया, प्रतिफल से नहीं। दान का अर्थ था कि आपने अपनी सामथ्र्य का एक हिस्सा समाज, धर्म या किसी जरूरतमंद के लिए दिया और बदले में किसी सुविधा की अपेक्षा नहीं की, लेकिन आधुनिक समय में कहीं-कहीं दान और सुविधा का रिश्ता इतना मजबूत होता जा रहा है कि दान भी किसी प्रीमियम सदस्यता जैसा दिखाई देने लगता है। इतना दान कीजिए तो इतनी सुविधा, उससे ज्यादा दान कीजिए तो कुछ और सुविधा। यह व्यवस्था धार्मिक संस्थानों की आर्थिक जरूरतों के हिसाब से उपयोगी हो सकती है, लेकिन धर्म के मूल विचार के सामने एक असहज प्रश्न जरूर खड़ा करती है। अगर पैसे के आधार पर सुविधाएं तय होंगी तो फिर मंदिर और बाजार के बीच अंतर आखिर कहां रहेगा?
इस समय धार्मिक दान से जुड़ा दूसरा गंभीर सवाल पारदर्शिता का भी है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित गबन के मामले ने भी लोगों को चिंतित किया है। मामला जांच के अधीन है और अंतिम सत्य जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा लेकिन ऐसी कोई भी घटना इसलिए ज्यादा गंभीर हो जाती है क्योंकि धार्मिक स्थल पर दिया गया पैसा केवल पैसा नहीं होता, उसके साथ करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी होती है। आदमी बाजार में पैसा देता है तो उसके बदले सामान मांगता है, लेकिन मंदिर में पैसा देता है तो वह अपना विश्वास सौंपता है। इसलिए धार्मिक दान में एक रुपये की गड़बड़ी भी केवल आर्थिक अपराध नहीं, विश्वास पर चोट बन जाती है। देश के बड़े धार्मिक संस्थानों के पास हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति और हर वर्ष अरबों रुपये का दान आता है तो उनकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। दान का एक-एक रुपया कहां से आया, कहां गया और किस काम में खर्च हुआ, इसकी पूरी पारदर्शिता समाज के सामने होनी चाहिए।
एक तरफ चढ़ावे की सुरक्षा और पारदर्शिता का सवाल है और दूसरी तरफ दान के आधार पर विशेष सुविधाओं की व्यवस्था है। इन दोनों को साथ रखकर देखें तो हमारे सामने एक बड़ी तस्वीर सामने आती है। पैसा आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र में व्यक्ति की पहुंच तय कर रहा है। अच्छी शिक्षा चाहिए तो पैसा, बेहतर अस्पताल चाहिए तो पैसा, आरामदायक यात्रा चाहिए तो पैसा और बेहतर जीवन की लगभग हर सुविधा के लिए पैसा। समाज में भी जिसके पास ज्यादा पूंजी है, उसकी पहुंच ज्यादा है, उसका प्रभाव ज्यादा है और उसकी बात सुनने वाले भी ज्यादा हैं। इसीलिए कहा जाता है कि सबसे बड़ा रुपैया। अगर यही सिद्धांत धार्मिक स्थलों पर भी लागू होने लगे और ईश्वर के दर्शन तक पहुंचने में भी पैसा सुविधा पैदा करने लगे तो फिर सामान्य आदमी आखिर कहां बराबर रहेगा?
ईश्वर स्वयं तो किसी से भेदभाव नहीं करता। उसने किसी मंदिर में वीआईपी प्रवेश द्वार नहीं बनाया, किसी के लिए अलग लाइन नहीं बनाई और न यह कहा कि जिसने ज्यादा दान दिया वह मेरे ज्यादा करीब होगा। ये व्यवस्थाएं मनुष्य ने बनाई हैं। मंदिरों के ट्रस्ट, प्रबंधक, पुजारी और व्यवस्था संचालित करने वाले लोग इन्हें बनाते हैं। इसलिए सवाल भगवान से नहीं, व्यवस्थाओं को बनाने वाले लोगों से पूछा जाना चाहिए। बड़े दानदाता का सम्मान जरूर होना चाहिए, क्योंकि उसके पैसे से मंदिर अस्पताल चला सकता है, स्कूल बना सकता है, अन्नक्षेत्र चला सकता है और समाज के लिए अनेक अच्छे काम कर सकता है, लेकिन दानदाता का सम्मान करने और उसे भगवान तक पहुंचने का विशेष अधिकार देने के बीच अंतर होना चाहिए। क्या ऐसा संभव नहीं है कि बड़े दानदाता को सम्मान दिया जाए, लेकिन दर्शन की कतार में वह भी उसी सामान्य श्रद्धालु के साथ खड़ा हो जिसने अपनी मेहनत की कमाई से दस रुपये चढ़ाए हैं?
हमारे धार्मिक स्थलों को इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मंदिर वह जगह होनी चाहिए जहां आदमी अपनी सामाजिक हैसियत, पद और संपत्ति को बाहर छोड़कर प्रवेश करे। जहां करोड़पति और मजदूर के बीच कोई फर्क न हो। जहां किसी की जेब देखकर यह तय न हो कि उसे भगवान के दर्शन कितनी जल्दी होंगे। बाजार में पैसे की ताकत स्वीकार की जा सकती है, लेकिन कम से कम ईश्वर का दरबार तो बाजार नहीं बनना चाहिए। दानदाता का सम्मान हो, लेकिन सामान्य श्रद्धालु का अपमान नहीं। धार्मिक संस्थानों को दान मिले, लेकिन दान सुविधा खरीदने का माध्यम न बने। मंदिरों के पास संपत्ति बढ़े, लेकिन उससे भी ज्यादा उनका विश्वास बढऩा चाहिए और उस विश्वास की पहली शर्त पारदर्शिता तथा बराबरी है।
तिरुपति में एक दिन में मिले लगभग 97 करोड़ रुपये को केवल रिकॉर्ड दान के रूप में देखने के बजाय हमें उसके पीछे छिपे बड़े सवाल को भी देखना चाहिए कि आखिर नई नीति लागू होने से ठीक पहले इतनी बड़ी राशि क्यों आई? यदि पुराने नियमों के तहत मिलने वाली आजीवन सुविधाओं को सुरक्षित करना इसकी बड़ी वजह थी तो हमें दान और सुविधा के इस रिश्ते पर विचार करना होगा। इसी तरह राम मंदिर या किसी भी धार्मिक स्थल के चढ़ावे में गड़बड़ी का आरोप सामने आता है तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह केवल पैसे का मामला नहीं है, यह करोड़ों लोगों के विश्वास का मामला है। ईश्वर अगर सबका है तो उसका दरबार भी सबका होना चाहिए। वहां किसी की पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं, उसकी श्रद्धा से होनी चाहिए। क्योंकि जिस दिन भगवान के दर्शन भी परचेजिंग पावर से तय होने लगेंगे, उस दिन मंदिर और बाजार के बीच की आखिरी दीवार भी गिर जाएगी और तब हमें खुद से पूछना पड़ेगा कि हमने ईश्वर के घर में भी बराबरी के लिए कितनी जगह छोड़ी है?

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