फिर फसल चक्र परिवर्तन का राग
छत्तीसगढ़ जब राज्य बना था तब पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने किसानों को फसल चक्र बदलने यानी धान के आलावा अन्य फसलों की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया था। उस समय की विपक्ष भारतीय जनता पार्टी ने इसका जमकर मजाक बनाया था। सत्ता के गलियारों और विधानसभा में फसल चक्र परिवर्तन का मजाक उड़ाया जाता था। जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तब उसे इसका महत्त्व समझ में आया। अब मौजूद विष्णुदेव साय सरकार ने कैबिनेट की बैठक में धान के स्थान पर अन्य फसल लेने वाले किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार सहयोग राशि देने का निर्णय लिया है। अब सरकार चाहती है कि किसान धान के अलावा दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी और रागी की खेती करे। इसका पहला फायदा तो यह होगा कि किसानों की आय बढ़ेगी और दूसरा जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि बीते वर्षों में सरकार ने इस दिशा में काम तो किया, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इस फैसले का एक पहलु सरकार की माली हालत से भी जुड़ा है। चुनाव में भाजपा ने वादा किया था, इसलिए सरकार हर किसान का धान 3100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीद रही है। सारे उपयोग के बाद सरकार के पास लाखों टन धान बच रहा है, जिसे 1800 रूपये प्रति क्विंटल के भाव से बेचने के लिए मजबूर है। जिसके चलते पिछले साल ही सरकार को तीन हजार करोड़ से अधिक का नुक्सान उठाना पड़ा। धान के अलावा अन्य फसलों पर किसान इसलिए भी ध्यान नहीं देता, क्योंकि उसे कम मेहनत और संसाधनों में अच्छी कीमत मिल जाती है। खेती और किसान को समृद्ध बनाना है तो धान के विकल्प पर गंभीरता से काम करना होगा, लेकिन चुनावी राजनीति के चलते यह हो पायेगा संभव नहीं लगता।
बस्तर में श्वेत क्रांति : दश्त ए तलब
बस्तर में माओवाद के खात्मे के बाद राज्य सरकार आदिवासियों के जीवन स्तर को ऊंचा करने के लिए बस्तर में श्वेत क्रांति की बुनियाद रखने जा रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी घोषणा की है कि बस्तर के प्रत्येक आदिवासी परिवार को एक गाय और एक भैंस दी जाएगी। गुजरात के अमूल मॉडल की तरह बस्तर के गांव-गांव में संग्रहण केंद्र, प्रोसेसिंग प्लांट और मार्केटिंग की व्यवस्था की जाएगी। बस्तर में इस बड़े पशुधन वितरण और डेयरी नेटवर्क के लिए देश की बड़ी एजेंसियों के साथ करार भी हो गया है। बस्तर में जो होने जा रहा ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। राज्य में जब पहली बार भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने भी दुधारू पशु प्रदाय योजना के तहत आदिवासी परिवारों को गाय वितरित की थी। इस योजना को लेकर कई विवादास्पद मामले सामने आये थे। कुछ परिवारों को तो गाय की जगह बैल प्रदान कर दिया गया था। डॉक्टर रमन सिंह की पंद्रह साल की सत्ता में इस योजना के कोई चमत्कारी नतीजे नहीं निकले। कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी पशुधन के लिए गौठान योजना लागू की और रोका छेका अभियान चलाकर गायों को गौठान में लाया जाता था, जहां इनके चारे पानी की व्यवस्था होती थी, लेकिन इन सुविधाओं के बीच सैकड़ों गायों की मौत भी हुई। इस पर विपक्ष ने जमकर बवाल काटा। वर्तमान में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार में दुधारू पशु प्रदाय योजना फिर से प्रारंभ की गई है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत कांकेर, कोंडागांव, जशपुर, सारंगढ़, बलरामपुर में 325 आदिवासी परिवारों की महिलाओं को 650 साहीवाल गाय बांटी गई। सरकार ने इस साल से इस योजना का दायरा बढ़ाने की घोषणा की है। राज्य में दुग्ध उत्पादन बढऩे के लिए पांच योजनाएं पहले ही चल रही हैं। अब बस्तर अंचल में यह योजना कितनी कारगर होगी यह तो वक्त बताएगा लेकिन सरकारों की पिछली और वर्तमान में चल रही योजनाओं के परिणामों ने निराश ही किया है। दरअसल, व्यवस्था का भ्रष्ट तंत्र है जो किसी अच्छी योजना को फलीभूत नहीं होने देता।
स्कूलों में भी नेतागिरी
इन दिनों स्कूल नेतागिरी का अड्डा बन गए हैं। फिर मामला स्कूलों को जुलाई से नया सत्र शुरू करने का हो, शाला प्रवेश उत्सव का हो या गायत्री मंत्र या दीप मंत्र की अनिवार्यता का हो, जमकर नेतागिरी हो रही है। नियमानुसार राज्य में 16 जून से स्कूल शुरू हो जाते हैं। सरकार पूरे राज्य के स्कूलों में शाला प्रवेशोत्सव मनाती है। इस बार स्थानीय नेताओं ने शिकायत कर दी कि शाला प्रवेशोत्सव में उन्हें बुलाया नहीं जाता। शिकायतें इतनी बढ़ गई कि स्कूल शिक्षा विभाग को आदेश जारी करना पड़ा कि इस कार्यक्रम में शाला प्रबंधन स्थानीय जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा ना करे। स्कूल शिक्षा विभाग का यह आदेश राज्य सरकार को शायद वजनदार नहीं लगा, इसलिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी सार्वजनिक अपील कर दी कि स्थानीय नेताओं की शाला प्रवेशोत्सव में भागीदारी सुनिश्चित की जाए। अब यह मामला तो शांत हो गया, लेकिन गर्मी के चलते स्कूलों को एक जुलाई तक बंद रखने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी विवादों के केंद्र में दुर्ग जिला है। बताते हैं कि भिलाई से भाजपा विधायक रिकेश सेन स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव पर लगातार दबाव बना रहे हैं कि राज्य में पड़ रही प्रचंड गर्मी को देखते हुए स्कूल एक जुलाई तक बंद कर दिए जाएं, लेकिन स्कूल शिक्षा मंत्री भी स्कूल बंद ना करने पर अड़ गए हैं। भीषण गर्मी के चलते एक स्कूल में मूर्छित हुए एक छात्र का वीडियो भी जमकर वायरल किया जा रहा है। इस वीडियो को देख शायद शिक्षा मंत्री अपना निर्णय बदल दें, लेकिन अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है। इन सब विवादों के बीच एक और बड़ा विवाद आकार ले रहा है। राज्य सरकार ने सभी स्कूलों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राज्य गीत के साथ ही गायत्री मंत्र, सरस्वती वंदना, दीप मंत्र, गुरु मंत्र, शांति मंत्र, भोजन मंत्र और महापुरुषों की जीवनी का वाचन अनिवार्य कर दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टीएस सिंहदेव के विरोध के बाद अब यह मामला सांप्रदायिक रंग ले रहा है। स्कूलों में गायत्री मंत्र अनिवार्य करने पर विवाद हो सकता है स्कूल और बच्चों को लेकर विवाद या राजनीति नहीं होना चाहिए।
मुख्य सचिव की सक्रियता के मायने
लगभग आठ महीने पहले प्रदेश के मुख्य सचिव की कुर्सी संभालने वाले विकासशील ने प्रशासन में अचानक अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। मुख्य सचिव सप्ताह में दो या तीन बार किसी न किसी विभाग की बैठक ले रहे हैं। विभागों के कार्यों की समीक्षा कर रहे हैं। मुख्य सचिव ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार की योजनाओं की समीक्षा करना शुरू कर दिया है। प्रदेश के अधिकारियों को कभी भी बैठक का बुलावा आ जाता है। स्कूल, शिक्षा, पानी, बिजली, सिंचाई, जैसे बुनियादी विषयों पर विकासशील अफसरों की खिंचाई भी कर रहे हैं। मुख्य सचिव की इस सक्रियता से सत्ता के करीबी अधिकारी असहज हो रहे हैं। जानकार बताते हैं मुख्य सचिव का फोकस केंद्रीय योजनाओं के राज्य में क्रियान्वयन पर अधिक होता है, साथ ही उनका जोर इस बात पर भी होता है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर तत्काल कार्रवाई हो। माओवाद से प्रभावित रहे इलाकों में विकास योजना की समीक्षा भी वे लगातार कर रहे हैं। मुख्य सचिव की इस सक्रियता से सभी विभागों के अध्यक्ष और सचिव अब अलर्ट मोड में रहते हैं कि पता नहीं कब बैठक का बुलावा आ जाये।
एक ही कंपनी पर मेहरबान ‘नान
छत्तीसगढ़ का नागरिक आपूर्ति निगम चना खरीदी के मामले में एक ही कम्पनी पर मेहरबान है। दरअसल, राज्य के अनुसूचित क्षेत्र में नागरिक आपूर्ति निगम, सार्वजानिक वितरण प्रणाली के तहत प्रत्येक हितग्राही को दो किलो चना उपलब्ध कराता है। इसके लिए ‘एनइएमएलÓ नामक कम्पनी के जरिए ई नीलामी होती है। इस कम्पनी को ई नीलामी का काम कुछ बरस पहले टेंडर के जरिये दिया गया। तब से हर साल इसी कम्पनी को यह काम दिया जाता है। यह कंपनी ई नीलामी में नागरिक आपूर्ति निगम को चना खरीदकर देती है और बदले में विक्रेताओं से सर्विस शुल्क लेती है। पहली बार जब इस कम्पनी को ई नीलामी का काम दिया गया तब यह शुल्क कुल राशि का एक प्रतिशत होता था। बाद में नागरिक आपूर्ति निगम के एक प्रबंध संचालक ने इसे घटाकर शून्य दशमलव पच्चीस प्रतिशत निर्धारित कर दिया। हाल ही में कैबिनेट की बैठक में राज्य सरकार ने भी निर्धारित सर्विस शुल्क या उससे कम दरों पर चना खरीदी की अनुमति प्रदान की है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि नागरिक आपूर्ति निगम प्रतिवर्ष 72 हजार मीट्रिक टन यानी 6 हजार मीट्रिक टन चने का वितरण प्रतिमाह करता है, जिसकी कीमत न्यूनतम 56 रुपये प्रति किलो के भाव से लगभग 336 करोड़ रूपये होती है। पहले ई नीलामी करने वाली कम्पनी एक प्रतिशत के हिसाब से प्रतिमाह लगभग तीन करोड़ सर्विस शुल्क वसूलती थी। इस सर्विस शुल्क को और कम करने एवं प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए नागरिक आपूर्ति निगम ने कभी नया टेंडर निकाला ही नहीं जबकि एक दर्जन से अधिक कंपनियां देश में ई नीलामी का काम कर रही हैं। बताते हैं कि माननीय मंत्री जी के निवास से पूरा मामला सैट है वहाँ पदस्थ एक अधिकारी सर्विस शुल्क में प्रतिस्पर्धा करवा कर कमीशन का बना बनाया खेल बिगाडऩा नहीं चाहते।
मन बहका रे बहका आधी रात को
‘उत्सव फि़ल्म का यह रोमांटिक गाना है-‘मन क्यों बहका रे बहका आधी रात कोÓ, मगर छत्तीसगढ़ की राजनीति में मन तो बहका, लेकिन बेला नहीं महका आधी रात को। इस गाने का जिक्र इसलिए क्योंकि परसों अचानक छत्तीसगढ़ के मंत्रियों का मन रात में विचलित हुआ। उनके विचलन से उनसे जुड़े लोग भी विचलित हुए, फिर हल्ला मचा कि सीएम हाउस में मंत्रियों को बुलाया गया है और संगठन की बैठक है। बहुत दिनों से अटकलें तेज थी कि मंत्रिमंडल से इस्तीफा लेकर नए सिरे से मंत्री बनाए जाएंगे। दूसरा यह था कि रेत माफिया जिस तरह से पूरे राज्य में हिंसा का तांडव कर रहा है। उससे निपटने की कोई बात होगी। जो सरकार नक्सलियों को भगाने में कामयाब हो गई। उस सरकार का पूरा तंत्र राज्य के भीतर जो इस तरह की गतिविधि चल रही, उससे नहीं निपट पा रहा है। अब लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला का आगमन एक कारण था। पर दहशत सबके मन में थी। मंत्री जहां थे वहां से लौटे और सीएम हाउस में अटकलों का दौर चालू हुआ। बाहर लोग बहुत तरह-तरह की बात कर रहे थे और सबको लग रहा था कि रात में मंत्रियों को अचानक बुलाया गया है तो कुछ बड़ा होने वाला है, पर बाद में यह कहा गया कि ढाई साल की समीक्षा थी तो ढाई साल की समीक्षा के लिए देर रात तक मंत्रियों को बुलाकर उनसे बात करना क्यों जरूरी था। कई लोगों के दिमाग में वह गाना गूंज रहा होगा कि ‘मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को बेला महका रे महका आधी रात को तो बहुत सारे जो लोग प्रतीक्षा सूची में या जिनके बारे में अटकलें लगाई जा रही है कि उनको मंत्री बनाया जाएगा उनके बहुत सारे प्रशंसक मीडिया में फोन करके यह पूछ रहे थे कि भैया का नाम है क्या? किसको बनाया जा रहा है किसको ड्रॉप किया जा रहा है तो यह जो रात थी इससे मन बहका तो जरूर पर नतीजा कुछ नहीं निकला।