कृष्ण कुमार सिकंदर
भारत की संसदीय व्यवस्था में राज्यसभा केवल एक सदन नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन की महत्वपूर्ण संस्था है। हर दो वर्ष में इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और नए सदस्य चुने जाते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। यह एक नियमित संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन इस बार चुनावों के साथ-साथ विपक्षी दलों के कुछ सांसदों के इस्तीफों और राजनीतिक पुनर्संरेखण ने राज्यसभा की बदलती तस्वीर को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।
मध्य प्रदेश में भाजपा के तीनों उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचित होना यह दर्शाता है कि कई राज्यों में पार्टी का राजनीतिक प्रभाव मजबूत बना हुआ है। राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और झारखंड जैसे राज्यों में भी चुनावी मुकाबले अलग-अलग राजनीतिक संदेश दे रहे हैं। इन चुनावों का महत्व केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले वर्षों में संसद के भीतर शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगा।
राज्यसभा की वर्तमान स्थिति में सबसे अधिक चर्चा विपक्षी दलों के कुछ सांसदों के इस्तीफों को लेकर हो रही है। तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़ने अथवा इस्तीफा देने की खबरों ने विपक्षी राजनीति के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के भीतर मतभेद, पुनर्गठन और दल-बदल असामान्य नहीं हैं, लेकिन जब ऐसे घटनाक्रम संसद के भीतर संख्या बल को प्रभावित करते हैं, तब उनका प्रभाव राष्ट्रीय नीति-निर्माण तक दिखाई देता है।
सत्ता पक्ष के दृष्टिकोण से देखें तो राज्यसभा में बढ़ती संख्या निश्चित रूप से सरकार के लिए एक सकारात्मक स्थिति है। लंबे समय तक केंद्र सरकार को कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए गैर-गठबंधन दलों का समर्थन लेना पड़ता था। यदि अब सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल उपलब्ध हो जाता है, तो विधायी प्रक्रिया अधिक सुचारु और तेज हो सकती है। समर्थकों का तर्क है कि इससे विकास परियोजनाओं, आर्थिक सुधारों और प्रशासनिक निर्णयों में अनावश्यक राजनीतिक अवरोध कम होंगे।
दूसरी ओर, लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं चलता, बल्कि प्रभावी विपक्ष भी उसकी अनिवार्य शर्त है। संसद में विपक्ष की भूमिका सरकार के हर निर्णय का विरोध करना नहीं, बल्कि उसकी समीक्षा करना, कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करना और जनता के विभिन्न वर्गों की आवाज को मंच प्रदान करना है। यदि विपक्ष लगातार कमजोर होता है, तो संसदीय बहसों की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार जितनी मजबूत हो, उतना ही मजबूत और सक्रिय विपक्ष भी आवश्यक माना जाता है।
तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती केवल सीटें बचाने की नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक संगठन और जनविश्वास को मजबूत बनाए रखने की है। बार-बार होने वाले इस्तीफे और दल-बदल जनता के बीच यह संदेश भी दे सकते हैं कि विपक्षी दल अपने नेताओं को एकजुट रखने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। इससे विपक्ष की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
हालांकि इस पूरे परिदृश्य को केवल सत्ता और विपक्ष की जीत-हार के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्थाओं में निहित है। राज्यसभा का उद्देश्य केवल विधेयकों को पारित करना नहीं, बल्कि उन पर गहन विमर्श सुनिश्चित करना भी है। इसलिए संख्या बल बढ़ने के साथ-साथ यह जिम्मेदारी भी बढ़ती है कि संसद में संवाद, असहमति और विचार-विमर्श की परंपरा कमजोर न पड़े।
आने वाले दिनों में 24 सीटों के चुनाव और रिक्त सीटों पर संभावित उपचुनाव राज्यसभा की संरचना को और प्रभावित करेंगे। यह स्थिति भाजपा और एनडीए के लिए राजनीतिक अवसर लेकर आई है, वहीं विपक्ष के लिए आत्ममंथन और पुनर्गठन का समय है। लेकिन अंततः लोकतंत्र की सफलता किसी एक दल की ताकत से नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदार, जवाबदेह और रचनात्मक भूमिका से तय होती है।
राज्यसभा का यह बदलता गणित भारतीय राजनीति के एक नए अध्याय की ओर संकेत कर रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बढ़ते बहुमत का उपयोग सरकार कितनी प्रभावी नीति-निर्माण में करती है और विपक्ष अपने घटते संख्या बल के बावजूद लोकतांत्रिक विमर्श को कितना जीवंत बनाए रख पाता है। लोकतंत्र की असली जीत तभी होगी जब संसद में संख्या से अधिक महत्व संवाद, जवाबदेही और जनहित को मिले।