तमिलनाडु की राजनीति से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आ रही है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक अहम फैसला लेते हुए मुख्यमंत्री द्वारा करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के आदेश को खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अदालत ने सुनवाई के दौरान सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और नियमों के दायरे पर बात की।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी और सुनवाई
सुनवाई के दौरान अदालत के न्यायाधीशों ने सरकार के इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि सरकार सामान्य रूप से रोजगार दे रही है। अदालत ने यह भी सवाल किया कि यदि इस तरह से नौकरियां दी जाएंगी, तो क्या अन्य सड़क हादसों या दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को भी सरकारी नौकरी दी जाएगी। न्यायाधीशों का मानना था कि नियमों को ताक पर रखकर इस तरह के फैसले लेना सही नहीं है।

क्या है पूरा मामला
आपको बता दें कि यह पूरा मामला पिछले साल 27 सितंबर को हुई उस दुर्घटना से जुड़ा है, जब एक रैली के दौरान मची भगदड़ में कई लोगों की जान चली गई थी। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी। हाल ही में मुख्यमंत्री ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था, जिसे अब अदालत ने कानूनी रूप से खारिज कर दिया है।
राजनीतिक विरोध और बयानबाजी
इस फैसले से पहले भी इस पर काफी राजनीति हो चुकी है। विपक्षी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की थी। उनका कहना था कि इस तरह नियमों को दरकिनार करके नौकरी देना उन युवाओं के साथ अन्याय है जो सालों से कड़ी मेहनत कर परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पाने का इंतजार कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप था कि राजनीतिक फायदे के लिए ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं।