नई दिल्ली। भारतीय शूटिंग जगत के लिए एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। देश के सबसे सफल निशानेबाजों में शामिल जसपाल राणा का 49 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। जर्मनी से लौटने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। दिल्ली में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर दुख जताया है। उन्होंने इसे भारतीय खेल जगत की अपूरणीय क्षति बताया।
कम उम्र में ही दिखाई थी असाधारण प्रतिभा
28 जून 1976 को उत्तराखंड के एक गढ़वाली परिवार में जन्मे जसपाल राणा को खेलों का माहौल विरासत में मिला था। उनके पिता नारायण सिंह राणा सेना के पूर्व अधिकारी और उत्तराखंड के पहले खेल मंत्री रहे। निशानेबाजी की शुरुआती ट्रेनिंग भी उन्होंने अपने पिता से ही ली थी।
महज 12 साल की उम्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी। 1988 में अहमदाबाद में आयोजित राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतकर उन्होंने सबका ध्यान खींचा।
कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में रचा इतिहास
जसपाल राणा का नाम भारत के सबसे सफल कॉमनवेल्थ गेम्स खिलाड़ियों में गिना जाता है। उन्होंने अपने करियर में कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण, 4 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल हैं।
साल 2002 के मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने छह पदक जीतकर नया इतिहास बनाया। वहीं 2006 दोहा एशियन गेम्स में तीन स्वर्ण और एक रजत पदक अपने नाम किया।
25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में 590 अंक बनाकर उन्होंने विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी की थी।
खिलाड़ी से सफल कोच तक का सफर
खेल करियर के बाद उन्होंने कोचिंग के क्षेत्र में भी बड़ी पहचान बनाई। उन्होंने कई युवा निशानेबाजों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर के कोच के रूप में भी उनकी भूमिका बेहद अहम रही।
देहरादून स्थित उनकी अकादमी से निकले कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का नाम रोशन किया।
हमेशा याद रहेंगे जसपाल राणा
जसपाल राणा केवल एक सफल खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि भारतीय शूटिंग की नई पीढ़ी को दिशा देने वाले मार्गदर्शक भी थे। उनकी उपलब्धियां और योगदान भारतीय खेल इतिहास में हमेशा याद किए जाएंगे।