रायपुर। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से रायपुर जिला छत्तीसगढ़ के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र दक्षिण कोसल का हिस्सा माना जाता था और इसका संबंध मौर्य साम्राज्य से भी जोड़ा जाता है। अपनी भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति के कारण रायपुर क्षेत्र लंबे समय तक कई शक्तिशाली राजवंशों के शासन का केंद्र रहा। शहर के दक्षिणी हिस्से में आज भी पुराने किले और ऐतिहासिक अवशेष इसके गौरवशाली अतीत की कहानी बताते हैं। आज रायपुर प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में एक है। लेकिन इतिहास के पन्ने में इस शहर का अपना एक प्रमुख स्थान है। यहां तमाम पर्यटक स्थल और ऐतिहासिक भवन इस शहर में मौजूद हैं।
प्राचीन राजवंशों का प्रभाव
इतिहासकारों के अनुसार, रायपुर क्षेत्र में 9वीं शताब्दी के आसपास नगर के रूप में विकास के प्रमाण मिलते हैं। इससे पहले यहां सातवाहन शासकों का प्रभाव था, जिन्होंने दूसरी और तीसरी शताब्दी तक इस क्षेत्र पर शासन किया। इसके बाद चौथी शताब्दी ईस्वी में गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने इस क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया। आगे चलकर यह क्षेत्र सरभपुरी राजाओं के अधीन आया।
कुछ समय तक नल वंश के शासकों का भी इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा। इसके बाद सोमवंशी राजाओं ने यहां अपना शासन स्थापित किया और सिरपुर (श्रीपुर) को अपनी राजधानी बनाया। सोमवंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में महाशिवगुप्त बालार्जुन का नाम प्रमुख है। उनकी माता रानी वासता ने सिरपुर में प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कराया था, जो आज भी भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
कलचुरी शासन और रायपुर की…स्थापना
बाद के समय में तुम्माण के कलचुरी शासकों ने इस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उन्होंने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाया और लंबे समय तक छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्से पर शासन किया। रतनपुर, राजिम और खल्लारी से मिले शिलालेख कलचुरी राजाओं के शासन और इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। रायपुर शहर की स्थापना को लेकर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। एक मान्यता के अनुसार, कलचुरी वंश के राजा रामचंद्र ने रायपुर नगर का निर्माण कराया और इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया। वहीं दूसरी लोककथा के अनुसार, राजा रामचंद्र के पुत्र ब्रह्मदेव राय ने इस शहर की स्थापना की थी। कहा जाता है कि उनके नाम पर ही इस नगर का नाम “रायपुर” पड़ा।
मध्यकाल से आधुनिक काल तक
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मदेव राय के समय लगभग 15वीं शताब्दी में रायपुर का विकास हुआ। इसी काल में हाजरा नायक द्वारा खारून नदी के किनारे हाटकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज भी धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
समय के साथ कलचुरी शासन कमजोर हुआ और क्षेत्र भोंसले राजाओं के अधीन चला गया। रघुजी तृतीय की मृत्यु के बाद ब्रिटिश शासन ने नागपुर के भोंसले राज्य से इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले लिया। वर्ष 1854 में रायपुर को छत्तीसगढ़ क्षेत्र का प्रशासनिक मुख्यालय बनाया गया। आजादी के बाद रायपुर जिला मध्य प्रांत और बरार क्षेत्र का हिस्सा रहा। बाद में यह छत्तीसगढ़ राज्य का प्रमुख केंद्र बना और वर्तमान में अपनी ऐतिहासिक विरासत, पुरातात्विक महत्व और आधुनिक विकास के कारण विशेष पहचान रखता है।
